फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Saharanpur News ›   Culture is incomplete without knowing mother tongue

हिंदी हैं हम : मातृभाषा को जाने बिना संस्कृति है अधूरी

Sat, 04 Sep 2021 11:57 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 04 Sep 2021 11:57 PM IST
विज्ञापन
Culture is incomplete without knowing mother tongue
-- आचार्या प्रतिष्ठा शर्मा - फोटो : SAHARANPUR
सहारनपुर। भाषा, संस्कृति से अलग नहीं है, जब तक हिंदी को ठीक से नहीं जानेंगे, संस्कृति को भी नहीं जान पाएंगे, इसलिए जरूरी है मातृभाषा का सम्मान करें, हिंदी बोलने और लिखने में गर्व महसूस करें, क्योंकि आज विदेशों में भी हिंदी के प्रति आकर्षण बढ़ा है। बस भारतीय नागरिकों को पश्चिमी सभ्यता से ज्यादा भारतीय संस्कृति और मातृभाषा के प्रति लगाव करना होगा। यह कहना है, मारीशस सहित कई देशों में संस्कृति, कला और भाषा के प्रचार के लिए दूतावास में संस्कृति दूत के रूप कार्यरत रहीं आचार्य प्रतिष्ठा शर्मा का।
विज्ञापन

आचार्य प्रतिष्ठा शर्मा सहारनपुर के बेरी बाग की रहने वाली हैं, उनके पिता योग गुरू पद्मश्री भारत भूषण हैं। अमर उजाला संवाददाता से फोन पर बातचीत में उन्होंने कहा कि विदेश में रहने वाले लोगों का हिंदी के प्रति बहुत आकर्षण है, जबकि भारत में रहने वाले अंग्रेजी बोलने और पश्चिमी सभ्यता को अपनाने में लगे हैं। उन्होंने बताया कि दुनिया भर में 32 से ज्यादा सांस्कृतिक केंद्र हैं, उन सभी में हिंदी की कक्षाएं चलती हैं। वहां एनआरआई के बच्चे और विदेशी लोगों के बच्चे भी हिंदी, संस्कृत के साथ ही योग, शास्त्रीय संगीत और शास्त्रीय नृत्य सीखते हैं।
विज्ञापन

मारीशस में सरकार का सबसे बड़ा सांस्कृतिक केंद्र है, वहां हिंदी के साथ ही संस्कृत भी शुरू हुई। वहां 2600 विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। इसमें शास्त्रीय संगीत और नृत्य आदि भी सीखते हैं। प्रतिष्ठा ने कहा जब हम शास्त्रीय विधा सिखाते हैं तो आसन और क्रियाओं के नाम हिंदी में ही बताते और सिखाते हैं, लेकिन नए योग आचार्य अंग्रेजी में योग और आसन के नाम बताने लगे, जिससे मातृभाषा को नुकसान पहुंचता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

मारीशस के विद्यालयों में पढ़ाई जा रही हिंदी
आचार्य प्रतिष्ठा शर्मा बताती हैं कि जब वह इंडोनेशिया में थे तो, तब बेटी कई देशों की भाषा बोलना सीख गई थी, लेकिन उसी दौरान उसने शुद्ध हिंदी बोलना सीखा। ऐसे ही इंडो नेशिया के विद्यार्थी विजी और न्यूमन में भी बहुत शुद्ध हिंदी बोलने लगे। उन्होंने बताया मारीशस और फिजी जैसे देशों में हिंदी को जीवित रखा है। मारीशस के विद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है, ज्यादातर लोग हिंदी बोलते हैं। उनकी हिंदी काफी शुद्ध है।

आचार्य प्रतिष्ठा का सफर
वह योग एवं कथक नृत्य गुरु, संस्कृति विशेषज्ञ व पूर्व संस्कृति राजनयिक रही हैं। 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन की संचालन समिति की सदस्य और मुख्य आयोजकों में रही हैं। मारीशस, इंडोनेशिया आदि देशों में संस्कृति, कला व भाषा के प्रचार के लिए दूतावास में संस्कृति दूत के रूप में कार्यरत रही हैं। मारीशस में स्थित संस्कृति केंद्र की निदेशक एवं प्रथम संस्कृति सचिव के रूप में कार्यरत रही हैं। सूरदास, तुलसीदास व आधुनिक कवियों की रचनाओं पर साहित्यिक नृत्य संरचनाएं करके जन जन में हिंदी के प्रति जागरूकता लाने में योगदान रहा है। योग, शास्त्रीय नृत्य व संस्कृति के प्रचारप्रसार के लिए अमेरिका, साउथ अफ्रीका, आइसलैंड, मारीशस, दोहा, यमन, जकार्ता, दुबई, बाली, मलेशिया, जापान, चीन आदि देशों में यात्रा की है।

-- आचार्या प्रतिष्ठा शर्मा

-- आचार्या प्रतिष्ठा शर्मा- फोटो : SAHARANPUR

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed