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Saharanpur News: मस्जिद के 150 साल पुरानी होने का दावा
Fri, 17 Jul 2026 01:27 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर
Updated Fri, 17 Jul 2026 01:27 AM IST
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सहारनपुर। कलक्ट्रेट मस्जिद प्रकरण में सुनवाई के दौरान विपक्षी पक्ष ने दावा किया था कि मस्जिद का पंजीकरण वक्फ बोर्ड में 1956 से चला आ रहा है, जबकि मस्जिद करीब 150 वर्ष पुरानी है। संपत्ति वक्फ की है, जिसे इस्तेमाल करने का अधिकार मस्जिद के पास है। हालांकि विपक्षी पक्ष इस संबंध में नगर निगम बिल, बिजली के बिल आदि ही प्रस्तुत कर सके। इसके अलावा कोई ठोस दस्तावेज नहीं दिखा सके। इसे अदालत ने उच्च न्यायालय के आदेशों का हवाला देते हुए खारिज कर दिया।
सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में सुनवाई के दौरान विपक्षी पक्ष की ओर से मस्जिद के संबंध में नगर पालिका, नगर निगम के कर निर्धारण, किरायानामा, बिजली का बिल प्रस्तुत किया है। बताया कि मौजूदा खसरा नंबर में मस्जिद है, जो अंग्रेजी शासनकाल से स्थापित है। इस संबंध में एक जनवरी 1911 को मस्जिद के लिए तत्कालीन मुतवल्ली शहजाद हुसैन ने बिजली कनेक्शन भी लिया था। वहीं, मुतवल्ली तनवीर अहमद, अब्दुल सलाम, विरेश कुमार आदि के शपथ पत्र दाखिल किए गए। उधर, सुनवाई के दौरान राजस्व निरीक्षक पाल सिंह ने बयान दिया। बताया कि विवादित संपत्ति का जमींदारा खात्मा नहीं हुआ है। जमीन हदूद (सीमा) वाली भूमि है। खसरा नंबर 539 की एक आकृति बनी है। इसका कोई भी विभाजन नहीं हुआ है। संपत्ति कचहरी कलक्ट्रेट परिसर के रूप में दर्ज है। यह कहना कि मस्जिद 150 वर्षों से कायम है, सरासर गलत है।
राजस्व विभाग की ओर से अधिवक्ताओं ने जिरह की। गवाहों ने जिरह के दौरान कहा कि उन्होंने मुतवल्ली के कहने पर बयान दिए हैं। विवाद आदि की जानकारी उन्हें नहीं है। राजस्व अधिवक्ता ने दलील में कहा कि विपक्षियों ने मौलवी या मुतवल्ली संबंधी कोई भी प्रमाणपत्र नहीं दिया है। कहा कि विश्राम स्थल कलक्ट्रेट कर्मचारियों के प्रयोग के लिए बना था। इस पर विपक्षी ने अवैध कब्जा कर धार्मिक ढांचे के रूप में निर्माण कर रखा है। संपूर्ण परिसर 28-4-4 रकबा 5.780 हेक्टेयर कलक्ट्रेट कचहरी दर्ज है। किसी भी धार्मिक स्थल की एंट्री राजस्व अभिलेखों में दर्ज नहीं है। दलील दी कि उच्च न्यायालय इलाहाबाद की विधि व्यवस्था के मुताबिक स्थानीय निकाय का कर निर्धारण स्वत्व का कागज नहीं है। स्पष्ट है कि इससे स्वामित्व का निर्धारण नहीं हो सकता। अदालत ने गवाहों को सुनने, पत्रावलियों पर आए साक्ष्यों एवं तथ्यों का परीक्षण करने के बाद फैसला सुनाया।
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किराये पर दे दी थी बिल्डिंग, वसूलते थे किराया
मस्जिद में कमरे आदि बने हैं। साथ ही मस्जिद के एक हिस्से को डाक विभाग को भी किराये पर दे दिया गया था। मस्जिद में बने कमरे भी किराये पर दिए गए हैं। सुनवाई के दौरान राजस्व अधिवक्ता अजय त्यागी आदि ने इस पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने इस अवैध बताया।
बाहरी लोगों के प्रवेश पर लगी थी रोक
पिछले साल सुनवाई के दौरान जिला प्रशासन ने इस मस्जिद में बाहरी लोगों के नमाज अदा करने पर रोक लगा दी थी। प्रशासन की तरफ से बताया गया था कि मामला अदालत में विचाराधीन है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह प्रतिबंध लगाया गया है।
बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक ने उठाया था मुद्दा
बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी ने बताया कि इस संबंध में आरटीआई भी लगाई थी। आरटीआई में उन्होंने पूछा था कि सरकारी भूमि पर मस्जिद का निर्माण कैसा हुआ, लेकिन आरटीआई में जवाब नहीं मिल। इसके बाद मुख्यमंत्री को शिकायत भेजी गई। बताया कि अदालत ने सभी दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों को देखते हुए फैसला सुनाया है।
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सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में सुनवाई के दौरान विपक्षी पक्ष की ओर से मस्जिद के संबंध में नगर पालिका, नगर निगम के कर निर्धारण, किरायानामा, बिजली का बिल प्रस्तुत किया है। बताया कि मौजूदा खसरा नंबर में मस्जिद है, जो अंग्रेजी शासनकाल से स्थापित है। इस संबंध में एक जनवरी 1911 को मस्जिद के लिए तत्कालीन मुतवल्ली शहजाद हुसैन ने बिजली कनेक्शन भी लिया था। वहीं, मुतवल्ली तनवीर अहमद, अब्दुल सलाम, विरेश कुमार आदि के शपथ पत्र दाखिल किए गए। उधर, सुनवाई के दौरान राजस्व निरीक्षक पाल सिंह ने बयान दिया। बताया कि विवादित संपत्ति का जमींदारा खात्मा नहीं हुआ है। जमीन हदूद (सीमा) वाली भूमि है। खसरा नंबर 539 की एक आकृति बनी है। इसका कोई भी विभाजन नहीं हुआ है। संपत्ति कचहरी कलक्ट्रेट परिसर के रूप में दर्ज है। यह कहना कि मस्जिद 150 वर्षों से कायम है, सरासर गलत है।
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राजस्व विभाग की ओर से अधिवक्ताओं ने जिरह की। गवाहों ने जिरह के दौरान कहा कि उन्होंने मुतवल्ली के कहने पर बयान दिए हैं। विवाद आदि की जानकारी उन्हें नहीं है। राजस्व अधिवक्ता ने दलील में कहा कि विपक्षियों ने मौलवी या मुतवल्ली संबंधी कोई भी प्रमाणपत्र नहीं दिया है। कहा कि विश्राम स्थल कलक्ट्रेट कर्मचारियों के प्रयोग के लिए बना था। इस पर विपक्षी ने अवैध कब्जा कर धार्मिक ढांचे के रूप में निर्माण कर रखा है। संपूर्ण परिसर 28-4-4 रकबा 5.780 हेक्टेयर कलक्ट्रेट कचहरी दर्ज है। किसी भी धार्मिक स्थल की एंट्री राजस्व अभिलेखों में दर्ज नहीं है। दलील दी कि उच्च न्यायालय इलाहाबाद की विधि व्यवस्था के मुताबिक स्थानीय निकाय का कर निर्धारण स्वत्व का कागज नहीं है। स्पष्ट है कि इससे स्वामित्व का निर्धारण नहीं हो सकता। अदालत ने गवाहों को सुनने, पत्रावलियों पर आए साक्ष्यों एवं तथ्यों का परीक्षण करने के बाद फैसला सुनाया।
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किराये पर दे दी थी बिल्डिंग, वसूलते थे किराया
मस्जिद में कमरे आदि बने हैं। साथ ही मस्जिद के एक हिस्से को डाक विभाग को भी किराये पर दे दिया गया था। मस्जिद में बने कमरे भी किराये पर दिए गए हैं। सुनवाई के दौरान राजस्व अधिवक्ता अजय त्यागी आदि ने इस पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने इस अवैध बताया।
बाहरी लोगों के प्रवेश पर लगी थी रोक
पिछले साल सुनवाई के दौरान जिला प्रशासन ने इस मस्जिद में बाहरी लोगों के नमाज अदा करने पर रोक लगा दी थी। प्रशासन की तरफ से बताया गया था कि मामला अदालत में विचाराधीन है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह प्रतिबंध लगाया गया है।
बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक ने उठाया था मुद्दा
बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी ने बताया कि इस संबंध में आरटीआई भी लगाई थी। आरटीआई में उन्होंने पूछा था कि सरकारी भूमि पर मस्जिद का निर्माण कैसा हुआ, लेकिन आरटीआई में जवाब नहीं मिल। इसके बाद मुख्यमंत्री को शिकायत भेजी गई। बताया कि अदालत ने सभी दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों को देखते हुए फैसला सुनाया है।