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बच गई जिले के 51 अमरनाथ यात्रियों की जान
Updated Wed, 12 Jul 2017 12:31 AM IST
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बच गई जिले के 51 अमरनाथ यात्रियों की जान
सहारनपुर। अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकी हमले में मरने वाले ज्यादातर श्रद्धालु गुजरात के थे। इनकी मौत से गुजरात में मातम मन रहा है। मगर यदि सहारनपुर के श्रद्घालु पीछे न छूट गए होते तो आतंकियों का निशाना सहारनपुर के 51 श्रद्धालुओं को लेकर लौट रही बस ही हो सकती थी। दरअसल, सहारनपुर के श्रद्धालुओं की बस से ठीक अगली बस पर ही आतंकवादियों ने हमला किया। कुछ ही दूरी से गोलियां चलने की आवाज सुनकर चालक ने बस को पीछे ही रोक लिया। इससे श्रद्धालुओं की जान बस सकी। आतंकी हमले का शिकार होने से बचे श्रद्धालु जिंदगी बचने के लिए बाबा बर्फानी का हाथ सिर पर होना मान रहे हैं।
सहारनपुर के बड़गांव से 51 यात्रियों का जत्था ऋषिपाल राणा के नेतृत्व में बाबा अमरनाथ की यात्रा करने के लिए पांच जुलाई को रवाना हुआ था। ऋषिपाल राणा ने फोन पर बताया कि दस जुलाई की शाम वह अमरनाथ यात्रा पूरी कर लौट रहे थे। उन्होंने बालटाल से प्राइवेट बस किराए पर की थी। सबसे आगे की बस सहारनपुर के यात्रियों की ही थी। इसमें सभी लोग चढ़ लिए थे। मगर विनोद, मुकेश, टीनू, संजय शर्मा, नाथीराम और दो महिलाएं पीछे ही रह गईं। इन यात्रियों केे इंतजार में बस थोड़ी देरी से चली। बस के लेट होने की वजह से पीछे खड़ी गुजरात के यात्रियों से भरी प्राइवेट बस का चालक अपनी बस आगे ले आया और उनसे पहले चल दिया। उसके करीब दस मिनट बाद सहारनपुर के यात्रियों से भरी बस चली। रात करीब आठ बजे आगे चल रही बस पर आतंकियों ने हमला बोल दिया। गोलियों की आवाज सुनकर सहारनपुर के यात्रियों की बस चला रहा चालक अलर्ट हो गया और उसने बस पीछे ही रोक ली। मगर पीछे चल रही तीसरे नंबर की बस आगे निकल गई। घटना के बाद सहारनपुर के यात्रियों ने कई घंटे दहशत में बिताए। वह किसी तरह सफर कर जम्मू आए। ऋषिपाल का कहना है कि यदि उनके साथ पीछे न छूटे होते तो पहले नंबर पर चलने वाली बस उन्हीं की थी और आज गुजरात नहीं, बल्कि यूपी के सहारनपुर के यात्री आतंकियों की गोली का निशाना बनते। बताया कि बाबा बर्फानी का हाथ सिर पर होने की वजह से उनकी जान बच सकी।
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बस चालक करते हैं मनमानी
ऋषिपाल के साथ ही अशोक, जनेश और दिनेश ने बताया कि बालटाल से निकलने वाली बसें सेना की देखरेख में निकलती हैं। मगर कुछ यात्रियों की जल्दबाजी और कुछ प्राइवेट बस चालकों की मनमानी की वजह से कई बार बसें सेना की देखरेख में नहीं चलती। दस जुलाई को जिस बस पर हमला हुआ, वह शाम छह बजे के बाद निकली थी, जबकि सेना छह बजे के बाद किसी बस को निकलने नहीं देती है।
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हादसे के बाद लगातार बजते रहे फोन
अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकी हमले की खबरें कुछ देर बाद ही न्यूज चैनलों पर चलने लगी थीं। ऐसे में सहारनपुर के वह परिवार दहशत में आ गए, जिनके परिजन यात्रा पर गए हैं। ऋषिपाल और अशोक ने बताया कि घटना के करीब आधा घंटे बाद उनके घरों से फोन आना शुरू हो गए थे। परिजनों के साथ ही मित्रों और शुभचिंतकों ने भी फोन कर हाल जाना। कई लोगों की रातभर अपने परिजनों से बात होती रही।
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सहारनपुर। अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकी हमले में मरने वाले ज्यादातर श्रद्धालु गुजरात के थे। इनकी मौत से गुजरात में मातम मन रहा है। मगर यदि सहारनपुर के श्रद्घालु पीछे न छूट गए होते तो आतंकियों का निशाना सहारनपुर के 51 श्रद्धालुओं को लेकर लौट रही बस ही हो सकती थी। दरअसल, सहारनपुर के श्रद्धालुओं की बस से ठीक अगली बस पर ही आतंकवादियों ने हमला किया। कुछ ही दूरी से गोलियां चलने की आवाज सुनकर चालक ने बस को पीछे ही रोक लिया। इससे श्रद्धालुओं की जान बस सकी। आतंकी हमले का शिकार होने से बचे श्रद्धालु जिंदगी बचने के लिए बाबा बर्फानी का हाथ सिर पर होना मान रहे हैं।
सहारनपुर के बड़गांव से 51 यात्रियों का जत्था ऋषिपाल राणा के नेतृत्व में बाबा अमरनाथ की यात्रा करने के लिए पांच जुलाई को रवाना हुआ था। ऋषिपाल राणा ने फोन पर बताया कि दस जुलाई की शाम वह अमरनाथ यात्रा पूरी कर लौट रहे थे। उन्होंने बालटाल से प्राइवेट बस किराए पर की थी। सबसे आगे की बस सहारनपुर के यात्रियों की ही थी। इसमें सभी लोग चढ़ लिए थे। मगर विनोद, मुकेश, टीनू, संजय शर्मा, नाथीराम और दो महिलाएं पीछे ही रह गईं। इन यात्रियों केे इंतजार में बस थोड़ी देरी से चली। बस के लेट होने की वजह से पीछे खड़ी गुजरात के यात्रियों से भरी प्राइवेट बस का चालक अपनी बस आगे ले आया और उनसे पहले चल दिया। उसके करीब दस मिनट बाद सहारनपुर के यात्रियों से भरी बस चली। रात करीब आठ बजे आगे चल रही बस पर आतंकियों ने हमला बोल दिया। गोलियों की आवाज सुनकर सहारनपुर के यात्रियों की बस चला रहा चालक अलर्ट हो गया और उसने बस पीछे ही रोक ली। मगर पीछे चल रही तीसरे नंबर की बस आगे निकल गई। घटना के बाद सहारनपुर के यात्रियों ने कई घंटे दहशत में बिताए। वह किसी तरह सफर कर जम्मू आए। ऋषिपाल का कहना है कि यदि उनके साथ पीछे न छूटे होते तो पहले नंबर पर चलने वाली बस उन्हीं की थी और आज गुजरात नहीं, बल्कि यूपी के सहारनपुर के यात्री आतंकियों की गोली का निशाना बनते। बताया कि बाबा बर्फानी का हाथ सिर पर होने की वजह से उनकी जान बच सकी।
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बस चालक करते हैं मनमानी
ऋषिपाल के साथ ही अशोक, जनेश और दिनेश ने बताया कि बालटाल से निकलने वाली बसें सेना की देखरेख में निकलती हैं। मगर कुछ यात्रियों की जल्दबाजी और कुछ प्राइवेट बस चालकों की मनमानी की वजह से कई बार बसें सेना की देखरेख में नहीं चलती। दस जुलाई को जिस बस पर हमला हुआ, वह शाम छह बजे के बाद निकली थी, जबकि सेना छह बजे के बाद किसी बस को निकलने नहीं देती है।
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हादसे के बाद लगातार बजते रहे फोन
अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकी हमले की खबरें कुछ देर बाद ही न्यूज चैनलों पर चलने लगी थीं। ऐसे में सहारनपुर के वह परिवार दहशत में आ गए, जिनके परिजन यात्रा पर गए हैं। ऋषिपाल और अशोक ने बताया कि घटना के करीब आधा घंटे बाद उनके घरों से फोन आना शुरू हो गए थे। परिजनों के साथ ही मित्रों और शुभचिंतकों ने भी फोन कर हाल जाना। कई लोगों की रातभर अपने परिजनों से बात होती रही।