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जिले में कहर बरपाता रहा है दिमागी बुखार

Mon, 14 Aug 2017 12:32 AM IST
Updated Mon, 14 Aug 2017 12:32 AM IST
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जिले में कहर बरपाता रहा है दिमागी बुखार
जिले में कहर बरपाता रहा है दिमागी बुखार
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सहारनपुर। बरसाती मौसम में जैपेनीज इनसेफ्लाइटिस (जेई ) यानी दिमागी बुखार जहां हर साल गोरखपुर में जिंदगियां छीनता रहा हैं, वहीं वेस्ट यूपी के सहारनपुर में भी कई साल तक इस बीमारी ने बच्चों, किशोरों समेत अन्य लोगों पर कहर बरपाया है। पिछले पंद्रह सालों में दो हजार से अधिक मौतें हो चुकी हैं। इतने वर्षों में कराए गए कई सर्वेक्षणों और विशेषज्ञों के सुझावों के बाद विशेष टीकाकरण सहित अन्य प्रयासों से कुछ राहत मिल पाई है।
सहारनपुर में अगस्त तक अक्टूबर तक का समय सबसे संवदेनशील रहा है। इस अवधि में दिमागी बुखार से हर साल 150 से 300 रोगी दम तोड़ते थे। यमुना से सटे 100 से अधिक गांवों में अधिक रोगी इसके शिकार होते रहे। मरने वाले मरीजों में नवजात से पांच साल तक के बच्चों के साथ ही 15 साल तक के किशोर अधिक रहे।
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सेवानिवृत्त विशेषज्ञ डा. पीके जैन के अनुसार वर्ष 2002 के बाद और वर्ष 2010 से पहले तक बरसात में गंदगी के बीच वायरसों के हमले, कसौंदी की जहरीली फलियों के खाने सहित अन्य कारणों को जेई से मौतों का जिम्मेदार माना गया। जिले में सरसावा, नकुड़, गंगोह और देवबंद ब्लॉकों में सबसे अधिक रोगी रहे। राष्ट्रीय संचारी रोग संस्थान नई दिल्ली, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरलॉजी पुणे समेत अन्य जिलों के वैज्ञानिकों के परीक्षणों के बाद ही सहारनपुर, गोरखपुर समेत अन्य जिलों में विशेष टीकाकरण अभियान शुरू किया गया। इसी का असर रहा कि वर्ष 2010 के बाद से जेई से होने वाली मौतों में कमी आई।
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जितने शोध, उतने ही दावे
- सहारनपुर में इस बीमारी को लेकर अलग-अलग शोध किए गए, हर शोध के निष्कर्ष भी अलग ही रहे। सबसे पहले बताया गया कि धान के खेतों में पलने वाले मच्छरों ने बगुले को काटा और उसके बाद बच्चों को काटने से वायरस बच्चों में पहुंचा। उसके बाद एक थ्योरी आई कि सूअर बाड़ों से इसका वायरस फैला। मच्छर ने सूअर को काटा और उसके बाद बच्चों को काटा, जिससे वायरस बच्चों में पहुंचा। इसके बाद एक शोध आया कि अगस्त से अक्टूबर तक कसौंदी की जहरीली फलियों से बच्चों को दिमागी बुखार से मौतों का कारण माना गया। जेई को बाद में एईएस यानी एक्यूट एनिमोएफिसिएंसी सिंड्रोम का नाम भी दिया गया। इसमें मलेरिया बुखार के बिगड़े रूप के कारण लीवर और गुर्दों पर दुष्प्रभाव से मौतों को जिम्मेदार बताया गया। शोध होते रहे, लेकिन किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे। इसे अब स्वास्थ्य विभाग की कामयाबी कहे या ईश्वर की कृपा, फिलहाल सहारनपुर में बीमारी पर लगाम लगी है।
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यह है बीमारी के लक्षण
सिर दर्द के साथ बुखार को छोड़कर हल्के संक्रमण में और कोई प्रत्यक्ष लक्षण नहीं होता है। गंभीर प्रकार के संक्रमण में सिरदर्द, तेज बुखार, गर्दन में अकड़न, घबराहट, कोमा में चले जाना, कंपकंपीं, कभी-कभी ऐंठन और मस्तिष्क निष्क्रिय होता है।
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ऐसे लगी थी बीमारी पर लगाम
करीब दस साल तक मौतों का सिलसिले के बाद स्वास्थ्य विभाग ने 229 गांवों में सर्वे कराकर 20 हजार स्लाइड तैयार की थी। इसमें 2500 रोगियों को भी चिन्हित किया गया था। हालांकि इस दौरान भी झोलाझापों के संपर्क में रहने के कारण कई मरीजों की मौत हुई। मगर, स्वास्थ्य विभाग ने टीकाकरण का अभियान चलाया और हर वर्ष यह अभियान अब भी जारी है।

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खादर इलाकों में था कहर
सहारनपुर के यमुना किनारे स्थित गांवों में बुखार से मौतों का सिलसिला वर्ष 2010 तक चला था। मगर, इसके बाद सामूहिक टीकाकरण और स्वास्थ्य विभाग की संवेदनशीलता के चलते इस बीमारी पर अंकुश पाया गया। हर वर्ष स्वास्थ्य विभाग संवेदनशील गांवों में सर्वे कर विशेष अभियान चलाता है।
बीएस सोढ़ी, सीएमओ
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