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जागरुकता की कमी से मुस्लिम महिलाओं की आवाज दारुलकजा तक नहीं पहुंच रही: उजमा
Updated Wed, 04 Apr 2018 12:16 AM IST
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देवबंद (सहारनपुर)। मुस्लिम महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें हर तरह से मजबूत करने की मुहिम चला रही ऑल इंडिया मजलिस मुशाविरत की उपाध्यक्ष उजमा नाहिद इकरा ने केंद्र सरकार द्वारा लोकसभा में पारित किए गए तीन तलाक बिल को गलत बताते हुए कहा कि महिलाओं को अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए आगे आना चाहिए। महिलाएं जागरूक होंगी तभी उन्हें बराबरी का हक मिल सकेगा।
मंगलवार को दारुल उलूम चौक स्थित अपने आवास पर पत्रकारों से वार्ता करते हुए उजमा नाहिद ने कहा कि सोसायटी में महिलाओं की मौजूदगी न होने से बहुत सारी समस्याएं पैदा हो रही हैं। जागरूक न होने की वजह से मुस्लिम महिलाएं अपनी आवाज दारुलकजा तक नहीं पहुंचा पा रही हैं, अगर कोई महिला खुला लेने के लिए दारुलकजा पहुंच भी जाती हैं तो वह सही ढंग से अपनी बात नहीं रख पाती, जबकि सुप्रीम कोर्ट भी दारुलकजा को खाप पंचायतों की तरह बता चुका है। उन्होंने कहा कि करीब ढाई वर्ष पूर्व केंद्र सरकार ने एक साथ तीन तलाक पर पाबंदी की मांग की थी, लेकिन आज तक इस मामले में किसी तरह का कोई हल पेश नहीं किया गया। जबकि तरीका ये था कि हमें हल बताना चाहिए था। ऐसा करने से उन सभी लोगों के मुंह बंद हो जाते जो इस पर सवाल उठा रहे थे। उजमा नाहिद ने बताया कि लॉ कमीशन की ओर से उन्हें नोटिस मिला है जिसमें 6 अप्रैल तक उन्हें यूनिफार्म सिविल कोड से संबंधित राय पेश करने का समय दिया गया है। जबकि लॉ कमीशन ने जिन बुनियादों पर सवाल उठाया था उसका सीधा जवाब था कि अचानक आर्टिकल 44 पर क्यों आए। जबकि उससे पहले रोटी, कपड़ा और मकान कानूनी हक थे मुसलमानों के । उसकी बात किए बगैर आपने आर्टिकल 44 की बात क्यों की। उजमा नाहिद ने कहा कि ऐसे तमाम मामले हैं जिन पर सही समय पर जवाब देना जरूरी था, लेकिन जवाब न देने से यह मामले ओर ज्यादा उलझ गए। जहां तक मुस्लिम महिलाओं का मसला है तो औरतों को हर क्षेत्र में एक्टिव होना चाहिए और उन्हें हर क्षेत्र के बारे में जानकारी होनी चाहिए। ऐसा होने से उनके सामने कोई भी समस्या पैदा नहीं होगी।
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मंगलवार को दारुल उलूम चौक स्थित अपने आवास पर पत्रकारों से वार्ता करते हुए उजमा नाहिद ने कहा कि सोसायटी में महिलाओं की मौजूदगी न होने से बहुत सारी समस्याएं पैदा हो रही हैं। जागरूक न होने की वजह से मुस्लिम महिलाएं अपनी आवाज दारुलकजा तक नहीं पहुंचा पा रही हैं, अगर कोई महिला खुला लेने के लिए दारुलकजा पहुंच भी जाती हैं तो वह सही ढंग से अपनी बात नहीं रख पाती, जबकि सुप्रीम कोर्ट भी दारुलकजा को खाप पंचायतों की तरह बता चुका है। उन्होंने कहा कि करीब ढाई वर्ष पूर्व केंद्र सरकार ने एक साथ तीन तलाक पर पाबंदी की मांग की थी, लेकिन आज तक इस मामले में किसी तरह का कोई हल पेश नहीं किया गया। जबकि तरीका ये था कि हमें हल बताना चाहिए था। ऐसा करने से उन सभी लोगों के मुंह बंद हो जाते जो इस पर सवाल उठा रहे थे। उजमा नाहिद ने बताया कि लॉ कमीशन की ओर से उन्हें नोटिस मिला है जिसमें 6 अप्रैल तक उन्हें यूनिफार्म सिविल कोड से संबंधित राय पेश करने का समय दिया गया है। जबकि लॉ कमीशन ने जिन बुनियादों पर सवाल उठाया था उसका सीधा जवाब था कि अचानक आर्टिकल 44 पर क्यों आए। जबकि उससे पहले रोटी, कपड़ा और मकान कानूनी हक थे मुसलमानों के । उसकी बात किए बगैर आपने आर्टिकल 44 की बात क्यों की। उजमा नाहिद ने कहा कि ऐसे तमाम मामले हैं जिन पर सही समय पर जवाब देना जरूरी था, लेकिन जवाब न देने से यह मामले ओर ज्यादा उलझ गए। जहां तक मुस्लिम महिलाओं का मसला है तो औरतों को हर क्षेत्र में एक्टिव होना चाहिए और उन्हें हर क्षेत्र के बारे में जानकारी होनी चाहिए। ऐसा होने से उनके सामने कोई भी समस्या पैदा नहीं होगी।
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