बसपा के गढ़ से दलितों को एकजुट करने उतरेंगी मायावती

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Updated Thu, 20 Jul 2017 12:07 AM IST

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बसपा के गढ़ से दलितों को एकजुट करने उतर सकती हैं मायावती
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सहारनपुर। शब्बीरपुर हिंसा में मजबूती से उभरी भीम आर्मी ने सत्ता से बेदखल बसपा और उसकी मुखिया मायावती की छटपटाहट तेज कर दी है। उनके मजबूत गढ़ में भीम आर्मी का अभ्युदय और दलितों में उसके प्रति सहानुभूति ने भी पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को चौकस कर दिया है। इसलिए बसपा मुखिया दलितों के ठोस वोट बैंक को बिखरने न देने के लिए संघर्ष के रास्ते पर चलने की तैयारी में हैं। सहारनपुर मुद्दे पर उनका राज्यसभा से इस्तीफा इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। आगे चलकर मायावती अपने इस गढ़ से कोई आंदोलन का श्रीगणेश करें तो आश्चर्य नहीं होगा। क्योंकि उन्हें पता है कि पश्चिम की हवा पूरब तक पहुंच जाती है और अगर भीम आर्मी की हवा पूरब की ओर बही तो इसका सीधा नुकसान बसपा को होगा। यही कारण है कि सहारनपुर हिंसा मामले में बसपा सुप्रीमो ने राज्यसभा में तीखे तेवर दिखाकर दलितों को सशक्त रहनुमाई का संदेश देकर अपनी पैठ को मजबूत करने की पूरी कोशिश की है। यह भी माना जा रहा है कि सहारनपुर की सियासत में महागठबंधन की पटकथा भी लिखी जा सकती है।
लोकसभा और विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद बसपा हर हाल में अपने बेस वोट को वापस लाने के लिए छटपटा रही है। यही कारण है कि सहारनपुर में शब्बीरपुर कांड में राजपूत-दलित संघर्ष को देश की सत्ता तक से जोड़ने से बसपा प्रमुख गुरेज नहीं कर रही हैं। शब्बीरपुर हिंसा के बाद सामने आई भीम आर्मी दलितों की सहानुभूति जुटाने में कामयाब हो गई। दलितों के नायक के रुप में भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद रावण का चेहरा आया तो पश्चिमी यूपी ही नहीं देशभर से उसके समर्थन में समाज के लोग सामने आए। ऐसे में बसपा को दलित खिसकता हुआ नजर आने लगा। यही कारण है कि 23 मई को बसपा मुखिया सड़क मार्ग से सहारनपुर के शब्बीरपुर पहुंचीं। चूंकि दलित सहारनपुर में हमेशा से एकजुट रहा है, मगर लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव में इस वोट बैंक में जबरदस्त सेंधमारी हुई। इसका नतीजा यह रहा कि बसपा अपनी सियासी जमीन भी नहीं बचा पाई। उधर, कांग्रेस और सपा गठबंधन पर भी मुस्लिमों ने जबरदस्त आस्था दिखाई। बावजूद इसके पूरे प्रदेश में हिन्दुत्व की लहर के बीच भाजपा ने बंपर जीत के साथ सरकार बनाई। आलम यह रहा कि बसपा का बेहद मजबूत गढ़ सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली में तो पार्टी खाता तक नहीं खोल पाई। सहारनपुर में वर्ष 2007 में पांच, 2012 में चार विधायक बसपा के रहे थे। ऐसे ही मुजफ्फरनगर में तीन सीटों पर बसपा ने जीत हासिल की थी। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, कैराना लोकसभा पर बसपा ने जीत हासिल कर ली थी। मगर, वर्ष2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में विरोधियों पटखनी देते हुए भाजपा ने जबरदस्त बढ़त बनाई। राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद दलित समाज की सहानुभूति फिर से बसपा प्रमुख के साथ आ सकती है और बिखरा हुआ वोट बैंक भी एकजुट हो सकता है। मायावती के इस्तीफे के दांव के बाद नए सियासी समीकरणों पर सबकी नजर है। उधर, कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष इमरान मसूद कहते हैं कि इस्तीफा देकर बहनजी ने ठीक किया और अब सभी को भाजपा के खिलाफ एकजुट होना चाहिए।


भीम आर्मी मजबूत हुई तो नुकसान बसपा को
सहारनपुर हिंसा के बाद भले ही बसपा ने भीम आर्मी से पल्ला झाड़ लिया है, मगर दलित मतों को एकजुट करने के लिए बसपा अंदरखाने भीम आर्मी को शह देती रही है। यही कारण है कि शब्बीरपुर हिंसा के ठीक बाद रविदास छात्रावास में भीम आर्मी की पंचायत में पूर्व विधायक रविन्द्र मोल्हू पहुंचे थे। नौ मई को हुई हिंसा में भीम आर्मी के साथ पूर्व विधायक भी नामजद हुए। मगर, भीम आर्मी और उसके संस्थापक की बढ़ती महत्वाकांक्षा व देशभर से मिल रहे समर्थन ने बसपा की चिंता बढ़ा दी। कारण, बसपा के समानांतर ही दलित संगठन पार्टी को नुकसान पहुंचाएगा। यही कारण है कि बसपा सुप्रीमो मायावती के इस्तीफे के पीछे भीम आर्मी की बढ़ती लोकप्रियता को कम करना भी कारण माना जा रहा है।

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