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भवसागर से पार उतरने का साधन है भजन
Updated Mon, 16 Jul 2018 12:46 AM IST
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भवसागर से पार उतरने का साधन है भजन
रामपुर मनिहारान। सोहम पीठाधीश्वर स्वामी सत्यानंद जी महाराज ने कहा कि भवसागर से पार उतरने का एक मात्र साधन भगवान का भजन करना है। रविवार को संत सम्मेलन के दूसरे दिन अपने प्रचवन में सत्यानंद महाराज ने कहा कि भजन में बाधक तत्व में सांसारिकता, अहंकार और ममता की भावना है। उन्होंने कहा कि इसी भावना के अधीन होने से धृतराष्ट्र के एक सौ पुत्र महाभारत के युद्ध में मारे गए थे। अर्जुन को भी ममता के दोष ने मोहित कर लिया था भगवान श्रीकृष्ण ने जब उन्हें गीता उपदेश सुनाया उसके बाद उनकी ममता का मोह दूर हुआ।
स्वामी प्रीतमदास जी महाराज ने कहा कि मोक्ष का अर्थ है जीवन मरण के बंधन से मुक्त हो जाना। उन्होंने कहा कि विद्या के साथ संस्कार भी जरूरी है। अविद्या बंधन में बांधती है जबकि विद्या बंधन मुक्त करती है। स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति के यहां आने से अविद्या ने यहां प्रवेश किया। पाश्चात्य संस्कृति क्या है परमात्मा ने हमें जैसा रूप दिया है। वह सही है मगर आज ब्यूटी पार्लर में जाकर सुंदरता का दिखावा किया जाता है जो मन में विकार पैदा करता है। विराट संत सम्मेलन में स्वामी गोपालानंद जी महाराज, स्वामी नारायणनंद जी महाराज ने भजनों से ऐसा वातावरण बना दिया कि श्रद्वालु तालियां के साथ झूम उठे। इस दौरान चौधरी धनेंद्र पंवार, कांशीराम, संजय कुमार, डा. अनुज सैनी, ललित कुमार आदि का सहयोग रहा।
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रामपुर मनिहारान। सोहम पीठाधीश्वर स्वामी सत्यानंद जी महाराज ने कहा कि भवसागर से पार उतरने का एक मात्र साधन भगवान का भजन करना है। रविवार को संत सम्मेलन के दूसरे दिन अपने प्रचवन में सत्यानंद महाराज ने कहा कि भजन में बाधक तत्व में सांसारिकता, अहंकार और ममता की भावना है। उन्होंने कहा कि इसी भावना के अधीन होने से धृतराष्ट्र के एक सौ पुत्र महाभारत के युद्ध में मारे गए थे। अर्जुन को भी ममता के दोष ने मोहित कर लिया था भगवान श्रीकृष्ण ने जब उन्हें गीता उपदेश सुनाया उसके बाद उनकी ममता का मोह दूर हुआ।
स्वामी प्रीतमदास जी महाराज ने कहा कि मोक्ष का अर्थ है जीवन मरण के बंधन से मुक्त हो जाना। उन्होंने कहा कि विद्या के साथ संस्कार भी जरूरी है। अविद्या बंधन में बांधती है जबकि विद्या बंधन मुक्त करती है। स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति के यहां आने से अविद्या ने यहां प्रवेश किया। पाश्चात्य संस्कृति क्या है परमात्मा ने हमें जैसा रूप दिया है। वह सही है मगर आज ब्यूटी पार्लर में जाकर सुंदरता का दिखावा किया जाता है जो मन में विकार पैदा करता है। विराट संत सम्मेलन में स्वामी गोपालानंद जी महाराज, स्वामी नारायणनंद जी महाराज ने भजनों से ऐसा वातावरण बना दिया कि श्रद्वालु तालियां के साथ झूम उठे। इस दौरान चौधरी धनेंद्र पंवार, कांशीराम, संजय कुमार, डा. अनुज सैनी, ललित कुमार आदि का सहयोग रहा।
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