{"_id":"5a09e8204f1c1bc1678bb4b0","slug":"171510598688-saharanpur-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"...मैं तजरबात के वो सबक छोड़ जाऊंगा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
...मैं तजरबात के वो सबक छोड़ जाऊंगा
Updated Tue, 14 Nov 2017 12:14 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देवबंद। रह-रह के लोग मुझको पढ़ेंगे वरक-वरक, मैं तजरबात के वो सबक छोड़ जाऊंगा। अपनी लेखनी और सादा मिजाजी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर मौलाना मोहम्मद असलम कासमी अपना तजरबा आने वाली नसलों के लिए छोड़कर दुनिया से हमेशा के लिए रुखसत हो गए। उन्होंने अपनी जिंदगी में बहुत सी पुस्तकें भी लिखीं। जो आने वाली नस्लों के लिए ऐसा सबक होंगी जिनके सहारे वह अच्छे और सच्चे इंसान बन सकेंगे।
वर्ष 1937 में देवबंद में जन्मे मौलाना असलम कासमी का इंतकाल देवबंद की जमात के लिए बड़े गम का दिन है। एक ऐसा नुकसान है जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो सकती। देवबंद के सबसे बड़े आलिम और दारुल उलूम के संस्थापक मौलाना कासिम नानौतवी के परपोते व कारी तैय्यब के दूसरे नंबर के बेटे मौलाना असलम कासमी की मौत इल्मी जगत के लिए एक बड़ा सदमा है। मौलाना असलम कासमी खानदान ही नहीं बल्कि कासमी बिरादरी व उलमा-ए-देवबंद के नामवर आलिम, मशहूर वक्ता और कलमकार थे। उनकी कई किताबें प्रकाशित हुईं। जो बेहद प्रसिद्ध हैं। इनमें बच्चों का कोर्स सिरत-ए-पाक, कासमी तकरीरें और सिरत-ए-हलबिया आदि पुस्तकें विशेष रुप से शामिल हैं।
इसके साथ ही मौलाना असलम शायरी का शौक भी रखते थे। लेकिन उनकी शायरी सिर्फ घर के आंगन तक ही सीमित थी। उनका शौक डायरी के पन्नों में ही सिमट कर रह गया। उन्होंने लगभग 100 से अधिक गजलें और नज्में लिखी हुई हैं। मौलाना असलम के दुनिया से चले जाने से एक ऐसा चराग गुल हो गया जिसकी रोशनी से एक दुनिया रोशन थी। दारुल उलूम का सौ साला जश्न मौलाना असलम कासमी की सलाहियतों का ऐसा सबूत बना जिसका रिकॉर्ड पूरे हिंदुस्तान में आज तक नहीं टूट सका। दारुल उलूम से फारसी और अरबी की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से स्नातक तक शिक्षा हासिल की। अंग्रेजी भाषा में महारत हासिल करने वाले मौलाना असलम कासमी ने वक्ता के रुप में इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और अमेरिका में दारुल उलूम का नेतृत्व किया। उनको जानने वाले कहते हैं कि दारुल उलूम और दारुल उलूम वक्फ की दीवारें कासमी खानदान के इस चश्मो चिराग को हमेशा तलाश करतीं रह
विज्ञापन
विज्ञापन
वर्ष 1937 में देवबंद में जन्मे मौलाना असलम कासमी का इंतकाल देवबंद की जमात के लिए बड़े गम का दिन है। एक ऐसा नुकसान है जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो सकती। देवबंद के सबसे बड़े आलिम और दारुल उलूम के संस्थापक मौलाना कासिम नानौतवी के परपोते व कारी तैय्यब के दूसरे नंबर के बेटे मौलाना असलम कासमी की मौत इल्मी जगत के लिए एक बड़ा सदमा है। मौलाना असलम कासमी खानदान ही नहीं बल्कि कासमी बिरादरी व उलमा-ए-देवबंद के नामवर आलिम, मशहूर वक्ता और कलमकार थे। उनकी कई किताबें प्रकाशित हुईं। जो बेहद प्रसिद्ध हैं। इनमें बच्चों का कोर्स सिरत-ए-पाक, कासमी तकरीरें और सिरत-ए-हलबिया आदि पुस्तकें विशेष रुप से शामिल हैं।
विज्ञापन
इसके साथ ही मौलाना असलम शायरी का शौक भी रखते थे। लेकिन उनकी शायरी सिर्फ घर के आंगन तक ही सीमित थी। उनका शौक डायरी के पन्नों में ही सिमट कर रह गया। उन्होंने लगभग 100 से अधिक गजलें और नज्में लिखी हुई हैं। मौलाना असलम के दुनिया से चले जाने से एक ऐसा चराग गुल हो गया जिसकी रोशनी से एक दुनिया रोशन थी। दारुल उलूम का सौ साला जश्न मौलाना असलम कासमी की सलाहियतों का ऐसा सबूत बना जिसका रिकॉर्ड पूरे हिंदुस्तान में आज तक नहीं टूट सका। दारुल उलूम से फारसी और अरबी की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से स्नातक तक शिक्षा हासिल की। अंग्रेजी भाषा में महारत हासिल करने वाले मौलाना असलम कासमी ने वक्ता के रुप में इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और अमेरिका में दारुल उलूम का नेतृत्व किया। उनको जानने वाले कहते हैं कि दारुल उलूम और दारुल उलूम वक्फ की दीवारें कासमी खानदान के इस चश्मो चिराग को हमेशा तलाश करतीं रह
विज्ञापन