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शरीयत में महिलाओं के लिए पर्दे का हुक्म: उलमा
Updated Sun, 01 Oct 2017 01:43 AM IST
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शरीयत में महिलाओं के लिए पर्दे का हुक्म : उलमा
देवबंद(सहारनपुर)। आस्ट्रिया की सरकार ने बुर्का पहनने और सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा छुपाने वाली चीजों पर पाबंदी लगा दी है। इस मामले में मुसलमानों की सबसे बड़ी जमात जमीयत उलमा-ए-हिंद के कोषाध्यक्ष मौलाना हसीब सिद्दीकी ने कहा कि जिस मुल्क में रह रहे हैं वहां के कानून को मानना जरूरी है। जहां तक शरीयत की बात है तो उसमें महिलाओं के लिए पर्दे का हुक्म दिया गया है। जमीयत उलमा-ए-हिंद (मौलाना महमूद मदनी गुट) के कोषाध्यक्ष मौलाना हसीब सिद्दीकी ने कहा कि बुर्का पहनने और सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा छुपाने वाली चीजों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाए जाने का मामला उनके अपने मुल्क का है, लेकिन जहां तक इस्लाम और शरीयत का सवाल है तो इस्लाम धर्म में जिंदगी जीने का पूरा निजाम बनाया गया है। जिसमें महिलाओं के लिए काम तय किया गया है। महिलाएं घर में रहकर बच्चों की परवरिश करें, शौहर की खिदमत करें और घर के निजाम को चलाएं। इस्लाम ने यही निजाम-ए-जिंदगी औरतों के लिए दिया है। मौलाना हसीब ने कहा कि दूसरा निजाम यह है कि बहुत से औरतें शिक्षा हासिल करने के लिए यूनिवर्सिटी जाती हैं और वहां बेपर्दा घूमती हैं। वह चाहें तो वहां पर्दा करके जा सकती हैं, लेकिन अगर वहां पर पाबंदी है और उसके बगैर उनको तालीम नहीं मिल सकती तो यह उनकी मजबूरी और कानून है। उसको अगर वह मानतीं हैं तो यह उनका अपना मामला है, लेकिन अगर शरीयत की बात होगी तो उसमें निजाम-ए-जिंदगी बगैर पर्दे के नहीं है। पर्दा उसमें जरूरी करार दिया गया है। इसी तरह यदि किसी महिला का शौहर मर जाता है तो उसे इद्दत करनी पड़ती है। जो बाद में कहती है कि मैं नौकरी करती हूं, मुझे जाना पड़ेगा। मेरे घर का खर्च कैसे चलेगा। तो शरीयत यह कहती है कि अगर वाकई उसका जाना जरूरी है और उसका गुजर बसर का यही साधन है तो वह जाए और काम करके वापस चली आए।
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देवबंद(सहारनपुर)। आस्ट्रिया की सरकार ने बुर्का पहनने और सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा छुपाने वाली चीजों पर पाबंदी लगा दी है। इस मामले में मुसलमानों की सबसे बड़ी जमात जमीयत उलमा-ए-हिंद के कोषाध्यक्ष मौलाना हसीब सिद्दीकी ने कहा कि जिस मुल्क में रह रहे हैं वहां के कानून को मानना जरूरी है। जहां तक शरीयत की बात है तो उसमें महिलाओं के लिए पर्दे का हुक्म दिया गया है। जमीयत उलमा-ए-हिंद (मौलाना महमूद मदनी गुट) के कोषाध्यक्ष मौलाना हसीब सिद्दीकी ने कहा कि बुर्का पहनने और सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा छुपाने वाली चीजों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाए जाने का मामला उनके अपने मुल्क का है, लेकिन जहां तक इस्लाम और शरीयत का सवाल है तो इस्लाम धर्म में जिंदगी जीने का पूरा निजाम बनाया गया है। जिसमें महिलाओं के लिए काम तय किया गया है। महिलाएं घर में रहकर बच्चों की परवरिश करें, शौहर की खिदमत करें और घर के निजाम को चलाएं। इस्लाम ने यही निजाम-ए-जिंदगी औरतों के लिए दिया है। मौलाना हसीब ने कहा कि दूसरा निजाम यह है कि बहुत से औरतें शिक्षा हासिल करने के लिए यूनिवर्सिटी जाती हैं और वहां बेपर्दा घूमती हैं। वह चाहें तो वहां पर्दा करके जा सकती हैं, लेकिन अगर वहां पर पाबंदी है और उसके बगैर उनको तालीम नहीं मिल सकती तो यह उनकी मजबूरी और कानून है। उसको अगर वह मानतीं हैं तो यह उनका अपना मामला है, लेकिन अगर शरीयत की बात होगी तो उसमें निजाम-ए-जिंदगी बगैर पर्दे के नहीं है। पर्दा उसमें जरूरी करार दिया गया है। इसी तरह यदि किसी महिला का शौहर मर जाता है तो उसे इद्दत करनी पड़ती है। जो बाद में कहती है कि मैं नौकरी करती हूं, मुझे जाना पड़ेगा। मेरे घर का खर्च कैसे चलेगा। तो शरीयत यह कहती है कि अगर वाकई उसका जाना जरूरी है और उसका गुजर बसर का यही साधन है तो वह जाए और काम करके वापस चली आए।