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कांग्रेस के रहनुमाई से भीम आर्मी में फाड़
Updated Sat, 10 Jun 2017 01:03 AM IST
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कांग्रेस के रहनुमाई से भीम आर्मी में फाड़
सहारनपुर। दलितों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई भीम आर्मी अब कांग्रेस के रहनुमाई को कत्तई भी बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। यही कारण है कि भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर के परिजनों के कांग्रेसी नेता के घर जाने के बाद संगठन में भी विद्रोह शुरू हो गया है। समर्थक इस बात से खासे नाराज हैं कि राजनीति से दूरी बनाने का दावा करने वाले आखिर सियासी हाथों का सहारा क्यों ले रहे हैं। कई गांवों में भीम आर्मी से जुड़े लोगों ने बैठक कर इस बात पर खासी नाराजगी जताई और राजनीतिक शह के चलते आगे किसी भी आंदोलन का हिस्सा बनने से इनकार भी कर दिया।
दरअसल, पांच मई को शब्बीरपुर हिंसा के बाद दलित उत्पीड़न के लिए खिलाफ सक्रिय हुई भीम आर्मी ने नौ मई को अचानक विवादों के घेरे मेें आ गई। पूरे जिले में जगह-जगह हिंसा के बाद उसके संस्थापक सहित कई अन्य लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट भी दर्ज हुई। हिंसा के चलते सीधे तौर पर राजनीतिक दलों ने इससे पल्ला झाड़ लिया। दलितों की रहनुमाई के बावजूद बसपा ने इस संगठन से पल्ला झाड़ लिया। इतना ही नहीं बसपा को इस बात की आशंका थी कि इस संगठन का उपयोग दूसरे राजनीतिक दल दलितों के मतों में सेंधमारी के लिए कर सकते हैं। यही कारण है कि नौ मई की हिंसा के बाद सुर्खियों में आई भीम आर्मी से दलितों की सहानुभूति समाप्त करने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती भी शब्बीरपुर गांव पहुंची।
हालांकि इस बीच कांग्रेस दलित मतों में सेंधमारी का आसान रास्ता देख भीम आर्मी के समर्थन में खड़ी हो गई। कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष इमरान मसूद खुलकर भीम आर्मी और संस्थापक चंद्रशेखर का समर्थन भी कर रहे हैँ। हालांकि इसके पीछे उनकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है। चंद्रशेखर की गिरफ्तारी के बाद मां और भाई पूर्व विधायक इमरान मसूद के आवास पर पहुंचे तो यह बात दलितों को खटकने लगी है। बृहस्पतिवार को वहां चंद्रशेखर के भाई की सियासी भाषा भी भीम आर्मी के समर्थकों को नागवार गुजर रही है। यही कारण है कि इसके बाद गांवों में भीम आर्मी से जुड़े लोगों ने बैठकें कर आपत्ति जताई और भीम आर्मी से पल्ला भी झाड़ लिया है। इस पूरे घटनाक्रम से एक बात तो साफ होने लगी है कि चंद्रशेखर के जेल जाने के बाद नेतृत्वविहीन हुई भीम आर्मी सियासी हाथों में जाने से कमजोर हो जाएगी। उससे जुड़े लोग भी यह बात भांपने लगे हैं और यही कारण है कि राजनीतिक हस्तक्षेप को वे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं।
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सहारनपुर। दलितों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई भीम आर्मी अब कांग्रेस के रहनुमाई को कत्तई भी बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। यही कारण है कि भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर के परिजनों के कांग्रेसी नेता के घर जाने के बाद संगठन में भी विद्रोह शुरू हो गया है। समर्थक इस बात से खासे नाराज हैं कि राजनीति से दूरी बनाने का दावा करने वाले आखिर सियासी हाथों का सहारा क्यों ले रहे हैं। कई गांवों में भीम आर्मी से जुड़े लोगों ने बैठक कर इस बात पर खासी नाराजगी जताई और राजनीतिक शह के चलते आगे किसी भी आंदोलन का हिस्सा बनने से इनकार भी कर दिया।
दरअसल, पांच मई को शब्बीरपुर हिंसा के बाद दलित उत्पीड़न के लिए खिलाफ सक्रिय हुई भीम आर्मी ने नौ मई को अचानक विवादों के घेरे मेें आ गई। पूरे जिले में जगह-जगह हिंसा के बाद उसके संस्थापक सहित कई अन्य लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट भी दर्ज हुई। हिंसा के चलते सीधे तौर पर राजनीतिक दलों ने इससे पल्ला झाड़ लिया। दलितों की रहनुमाई के बावजूद बसपा ने इस संगठन से पल्ला झाड़ लिया। इतना ही नहीं बसपा को इस बात की आशंका थी कि इस संगठन का उपयोग दूसरे राजनीतिक दल दलितों के मतों में सेंधमारी के लिए कर सकते हैं। यही कारण है कि नौ मई की हिंसा के बाद सुर्खियों में आई भीम आर्मी से दलितों की सहानुभूति समाप्त करने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती भी शब्बीरपुर गांव पहुंची।
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हालांकि इस बीच कांग्रेस दलित मतों में सेंधमारी का आसान रास्ता देख भीम आर्मी के समर्थन में खड़ी हो गई। कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष इमरान मसूद खुलकर भीम आर्मी और संस्थापक चंद्रशेखर का समर्थन भी कर रहे हैँ। हालांकि इसके पीछे उनकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है। चंद्रशेखर की गिरफ्तारी के बाद मां और भाई पूर्व विधायक इमरान मसूद के आवास पर पहुंचे तो यह बात दलितों को खटकने लगी है। बृहस्पतिवार को वहां चंद्रशेखर के भाई की सियासी भाषा भी भीम आर्मी के समर्थकों को नागवार गुजर रही है। यही कारण है कि इसके बाद गांवों में भीम आर्मी से जुड़े लोगों ने बैठकें कर आपत्ति जताई और भीम आर्मी से पल्ला भी झाड़ लिया है। इस पूरे घटनाक्रम से एक बात तो साफ होने लगी है कि चंद्रशेखर के जेल जाने के बाद नेतृत्वविहीन हुई भीम आर्मी सियासी हाथों में जाने से कमजोर हो जाएगी। उससे जुड़े लोग भी यह बात भांपने लगे हैं और यही कारण है कि राजनीतिक हस्तक्षेप को वे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं।
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