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किसानों के लिए वरदान साबित होगी अरहर की रिचा प्रजाति
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सहारनपुर। गुणवत्ता युुक्त और बढ़िया उत्पादन देने वाली अरहर की रिचा प्रजाति जनपद के किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है। कृषि विज्ञान केंद्र में हुआ इसका ट्रायल सफल रहा है। इस प्रजाति की खासियत यह है कि एक बार बुआई करके इससे वर्ष में दो बार उत्पादन लिया जाता है। इसका औसत उत्पादन 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
जनपद में दलहनी फसलों में आमतौर पर उर्द, मूंग और मसूर की खेती होती है। लेकिन अरहर की खेती काफी कम होती है। अरहर की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र ने कई प्रजातियों का ट्रायल किया है। इसमें अरहर की रिचा-2000 प्रजाति का ट्रायल बढ़िया उत्पादन देने वाला साबित हुआ है। मध्यप्रदेश के सिहोर जिले के प्रगतिशील किसान राजकुमार राठौर ने सलेक्शन के माध्यम से इस प्रजाति को इजाद किया है। इसके लिए उन्हें नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने भी सम्मानित किया था। इसकी बुआई 15 जून से 15 जुलाई के बीच लाइन से लाइन और पौधे से पौधे की दूरी तीन फुट के हिसाब से बिजाई की जाती है। इसकी बुुआई में तीन किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बीज लगता है। इसके पौधों को दो फुट का हो जाने पर इसकी ऊपरी चोटी को काट देना चाहिए। इसमें फसल आने पर पहली बार नवंबर-दिसंबर माह में फली गुच्छों की कटाई करते हैं। इसकी दूसरी कटाई मार्च-अप्रैल में होती है। इसका औसत उत्पादन 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होता है। कृषि विज्ञान केंद्र प्रभारी डाक्टर आईके कुशवाहा ने बताया कि अरहर की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र परिसर के तकनीकी पार्क में रिचा 2000 प्रजाति का ट्रायल किया गया है। मध्यप्रदेेश में पैदा होने वाली इस प्रजाति का जनपद में किया गया ट्रायल सफल रहा है। एक बार बुआई कर वर्ष में दो बार उत्पादन देने वाली अरहर की यह प्रजाति जिले के किसानों के लिए वरदान साबित होगी। इसकी औसत उत्पादन क्षमता 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। अरहर की खेती में अन्य फसलों की तुलना में लागत भी कम आती है। इसलिए यह प्रजाति किसानों के लिए फायदेमंद रहेगी।
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जनपद में दलहनी फसलों में आमतौर पर उर्द, मूंग और मसूर की खेती होती है। लेकिन अरहर की खेती काफी कम होती है। अरहर की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र ने कई प्रजातियों का ट्रायल किया है। इसमें अरहर की रिचा-2000 प्रजाति का ट्रायल बढ़िया उत्पादन देने वाला साबित हुआ है। मध्यप्रदेश के सिहोर जिले के प्रगतिशील किसान राजकुमार राठौर ने सलेक्शन के माध्यम से इस प्रजाति को इजाद किया है। इसके लिए उन्हें नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने भी सम्मानित किया था। इसकी बुआई 15 जून से 15 जुलाई के बीच लाइन से लाइन और पौधे से पौधे की दूरी तीन फुट के हिसाब से बिजाई की जाती है। इसकी बुुआई में तीन किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बीज लगता है। इसके पौधों को दो फुट का हो जाने पर इसकी ऊपरी चोटी को काट देना चाहिए। इसमें फसल आने पर पहली बार नवंबर-दिसंबर माह में फली गुच्छों की कटाई करते हैं। इसकी दूसरी कटाई मार्च-अप्रैल में होती है। इसका औसत उत्पादन 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होता है। कृषि विज्ञान केंद्र प्रभारी डाक्टर आईके कुशवाहा ने बताया कि अरहर की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र परिसर के तकनीकी पार्क में रिचा 2000 प्रजाति का ट्रायल किया गया है। मध्यप्रदेेश में पैदा होने वाली इस प्रजाति का जनपद में किया गया ट्रायल सफल रहा है। एक बार बुआई कर वर्ष में दो बार उत्पादन देने वाली अरहर की यह प्रजाति जिले के किसानों के लिए वरदान साबित होगी। इसकी औसत उत्पादन क्षमता 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। अरहर की खेती में अन्य फसलों की तुलना में लागत भी कम आती है। इसलिए यह प्रजाति किसानों के लिए फायदेमंद रहेगी।
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