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सकट चतुर्थी: संतान की दीर्घायु की कामना को लेकर महिलाओं ने धारण किया व्रत
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रामपुर। सकट चतुर्थी पर महिलाओं ने अपनी संतान की दीर्घायु की कामना को लेकर व्रत धारण किया। चंद्रमा को अर्ध्य देने के बाद भगवान गणेश की पूजा अर्चना कर आरती उतारी। विवाहिताओं ने ज्येष्ठ जनों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया।
शुक्रवार को सुबह से ही माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर माताओं सकट चतुर्थी पर्व की तैयारयां शुुुरु हो गईं थीं। महिलाओं ने स्नान आदि कर निर्जल व्रत धारण कर लिया था। निर्जल व्रत धारण कर मंदिरों में पूजा अर्चना की। शाम होते ही घरों में तैयारियां शुुरु हो गई थीं। घरों में तिलकूट के साथ पकवान भी बनाए गए। दिनभर व्रत धारण करने के बाद शाम को चंद्र दर्शन होने पर व्रतधारण करने वाली महिलाओं ने चंद्रमा को अर्ध्य दिया। इसके बाद भगवान गणेश और माता पार्वती की पूजा अर्चना की गई। घर की बड़ी-बुजुर्ग महिलाओं ने प्रचलित कथा सुनाई। भगवान गणेश के अपने पिता महादेव को प्रवेश न करने देने पर उनका सिर काटने और फिर माता पार्वती के आग्रह किए जाने पर हाथी का सिर लाकर जीवनदान देने की कथा सुनाई। इसके बाद माताओं ने थाल में गुड़ और तिल से प्रतिबिंब बनाकर अपने बालकों से कुश (घास) व चांदी की पायल से उसका गला अलग करवाया। इसके बाद प्रसाद का वितरण किया गया। इसके बाद महिलाओं ने संतान की आरती उतारी और उन्हेें भोजन कराने के साथ व्रत का पारण किया।
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शुक्रवार को सुबह से ही माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर माताओं सकट चतुर्थी पर्व की तैयारयां शुुुरु हो गईं थीं। महिलाओं ने स्नान आदि कर निर्जल व्रत धारण कर लिया था। निर्जल व्रत धारण कर मंदिरों में पूजा अर्चना की। शाम होते ही घरों में तैयारियां शुुरु हो गई थीं। घरों में तिलकूट के साथ पकवान भी बनाए गए। दिनभर व्रत धारण करने के बाद शाम को चंद्र दर्शन होने पर व्रतधारण करने वाली महिलाओं ने चंद्रमा को अर्ध्य दिया। इसके बाद भगवान गणेश और माता पार्वती की पूजा अर्चना की गई। घर की बड़ी-बुजुर्ग महिलाओं ने प्रचलित कथा सुनाई। भगवान गणेश के अपने पिता महादेव को प्रवेश न करने देने पर उनका सिर काटने और फिर माता पार्वती के आग्रह किए जाने पर हाथी का सिर लाकर जीवनदान देने की कथा सुनाई। इसके बाद माताओं ने थाल में गुड़ और तिल से प्रतिबिंब बनाकर अपने बालकों से कुश (घास) व चांदी की पायल से उसका गला अलग करवाया। इसके बाद प्रसाद का वितरण किया गया। इसके बाद महिलाओं ने संतान की आरती उतारी और उन्हेें भोजन कराने के साथ व्रत का पारण किया।
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