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जब मेरी शायरी दरबारी थी, सब शेर झूूठे थे बस मक्कारी
ब्यूूराे/रामपुर
Updated Fri, 20 Nov 2015 11:29 PM IST
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आपसी एकता और रिश्तों की मजबूती को बयां करती गजलों की एक शाम में पूरा शहर डूब गया। शायरों ने शायरी की क्या पढ़ी लोगों की जुबां से दाद थमने का नाम नहीं ले रही थी। हिंद भाईचारा समिति की ओर से आयोजित किए गए मुशायरे में शायरों ने शहर का दिल जीत लिया।
इस दौरान राहत इंदौरी ने अपने शब्दों से जवाब दिया कि सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़े ही है। रंगोली मंडप में आयोजित मुशायरे का आगाज प्रोफेसर हसन निजामी, समी उल्ला खां, धनजंय पाठक, गुलजार देहलवी और सुभाष नंदा ने शमां रोशन कर किया।
इसके बाद जिया इनायती ने नात पढ़कर मुशायरे को शुरू करने लिए शायरों को दावत-ए-सुखन दी। मुशायरे में सरताज शाहजहांपुरी ने कलाम पेश करते हुए कहा कि जब मेरी शायरी दरबारी थी, सब शेर झूूठे थे बस मक्कारी थी। उन दिनों मौत से बहुत डर लगता था, जब मुझे जीने की बीमारी थी।
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अना देहलवी ने कलाम पेश करते हुए कहा कि लब्ज कागज पर सजाने की सोचना छोड़ दे, उर्दू को मिटाने वाले यह सोचना छोड़ दे। कौन तहजीब ए गजल है ये बता दूं यहां कई रंग के फूल खुलते हैं। इसके साथ ही पेश की गई गजल कागज की हवेली बारिश का जमाना है, आवाज भी जख्मी है और गीत भी गाना है पर शामाईन ने जमकर दाद दी।
इरफान दानिश ने रिश्तों के महत्व को कुछ यूं समझाने की कोशिश की कि खुले आंगन का भी अलग ही मजा है, बहुत पछताओगे दीवार करके। तालिब रामपुरी ने अपने ही शहर में मुशायरे में शिरकत को कुछ यूं बयां किया कि यूं तो बरसों से छूटे हैं मगर बताना जरूरी है दिल मेरा रामपुर है।
हम अपने शहर में मेहमान बनकर आए हैं तो अपनी आंखों में भी आंसू उफन आए हैं। डा. नसीम निकहत की गजल चलो हर जिम्मेदारी का फसाना खत्म होता है, हमारे जिंदा रहने का बहाना खत्म होता है। हमारे बाद भी चलती रहेगी जिंदगी, किसी के बाद कब जमाना खत्म होता है को भी शामाईन की खूब दाद मिली।
इकबाल अशअर ने मां की ममता को बयां करते हुए कहा कि कागज पर गिरी बूंद तो एक तस्वीर उभर आई, मुद्दतों बाद मां के आंचल में मुझे सुकुं की नीद आई। चरन सिंह बशर ने कलाम पेश करते हुए कहा कि न तेरा है न मेरा है न यहां का है न वहां का है, न जमीं का है न आसमां का है यह नबी तुम्हारा न मेरा सारे जहां का है।
राहत इंदौरी ने मुल्क पर अपने नाम का ठप्पा लगाने वालों को इन शब्दों से जबाव दिया कि सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़े ही है। लगेगी आग तो आएंगे कई घर जद में, यहां सिर्फ हमारा मकां थोड़े ही है। इस दौरान मशूहर शायर ताहिर फराज ने भी कार्यक्रम में शिरकत की।
समिति द्वारा उन्हें सम्मानित भी किया गया। इसके साथ ही समिति द्वारा अजहर इनायती, असद अहमद निजामी, गुलजार, सुभाष नंदा, धनंजय पाठक आदि को भी सम्मानित किया गया। इस दौरान उजैर नौमानी, आसिफ अली खां, दानिश, असलम हसन खां, जुगेेश अरोरा कुक्कू, अमित, वसीम आलम, शैलेंद्र शर्मा, तारिक अब्दुल्ला मौजूद रहे।
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इस दौरान राहत इंदौरी ने अपने शब्दों से जवाब दिया कि सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़े ही है। रंगोली मंडप में आयोजित मुशायरे का आगाज प्रोफेसर हसन निजामी, समी उल्ला खां, धनजंय पाठक, गुलजार देहलवी और सुभाष नंदा ने शमां रोशन कर किया।
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इसके बाद जिया इनायती ने नात पढ़कर मुशायरे को शुरू करने लिए शायरों को दावत-ए-सुखन दी। मुशायरे में सरताज शाहजहांपुरी ने कलाम पेश करते हुए कहा कि जब मेरी शायरी दरबारी थी, सब शेर झूूठे थे बस मक्कारी थी। उन दिनों मौत से बहुत डर लगता था, जब मुझे जीने की बीमारी थी।
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अना देहलवी ने कलाम पेश करते हुए कहा कि लब्ज कागज पर सजाने की सोचना छोड़ दे, उर्दू को मिटाने वाले यह सोचना छोड़ दे। कौन तहजीब ए गजल है ये बता दूं यहां कई रंग के फूल खुलते हैं। इसके साथ ही पेश की गई गजल कागज की हवेली बारिश का जमाना है, आवाज भी जख्मी है और गीत भी गाना है पर शामाईन ने जमकर दाद दी।
इरफान दानिश ने रिश्तों के महत्व को कुछ यूं समझाने की कोशिश की कि खुले आंगन का भी अलग ही मजा है, बहुत पछताओगे दीवार करके। तालिब रामपुरी ने अपने ही शहर में मुशायरे में शिरकत को कुछ यूं बयां किया कि यूं तो बरसों से छूटे हैं मगर बताना जरूरी है दिल मेरा रामपुर है।
हम अपने शहर में मेहमान बनकर आए हैं तो अपनी आंखों में भी आंसू उफन आए हैं। डा. नसीम निकहत की गजल चलो हर जिम्मेदारी का फसाना खत्म होता है, हमारे जिंदा रहने का बहाना खत्म होता है। हमारे बाद भी चलती रहेगी जिंदगी, किसी के बाद कब जमाना खत्म होता है को भी शामाईन की खूब दाद मिली।
इकबाल अशअर ने मां की ममता को बयां करते हुए कहा कि कागज पर गिरी बूंद तो एक तस्वीर उभर आई, मुद्दतों बाद मां के आंचल में मुझे सुकुं की नीद आई। चरन सिंह बशर ने कलाम पेश करते हुए कहा कि न तेरा है न मेरा है न यहां का है न वहां का है, न जमीं का है न आसमां का है यह नबी तुम्हारा न मेरा सारे जहां का है।
राहत इंदौरी ने मुल्क पर अपने नाम का ठप्पा लगाने वालों को इन शब्दों से जबाव दिया कि सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़े ही है। लगेगी आग तो आएंगे कई घर जद में, यहां सिर्फ हमारा मकां थोड़े ही है। इस दौरान मशूहर शायर ताहिर फराज ने भी कार्यक्रम में शिरकत की।
समिति द्वारा उन्हें सम्मानित भी किया गया। इसके साथ ही समिति द्वारा अजहर इनायती, असद अहमद निजामी, गुलजार, सुभाष नंदा, धनंजय पाठक आदि को भी सम्मानित किया गया। इस दौरान उजैर नौमानी, आसिफ अली खां, दानिश, असलम हसन खां, जुगेेश अरोरा कुक्कू, अमित, वसीम आलम, शैलेंद्र शर्मा, तारिक अब्दुल्ला मौजूद रहे।