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Rampur News: नवाबों का दरबार नहीं पर शहर की आबोहवा में घुली हैं रवायतें

Tue, 29 Sep 2026 01:56 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, रामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, रामपुर Updated Tue, 29 Sep 2026 01:56 AM IST
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It may not be the court of the Nawabs, yet traditions are woven into the very air of the city.
रामपुर। शहर की गलियों से गुजरते समय कई बार लगता है कि वक्त यहां ठहर सा गया है। कहीं पुराने दरवाजे और दीवारें नवाबी वास्तुकला की कहानी बयां करते हैं तो कहीं किसी बुजुर्ग की जुबां पर उर्दू के पुराने अल्फाज की मिठास सुनाई देती है। किसी घर के दस्तरख्वान पर आज भी पुरानी रसोई की खुशबू है तो किसी कारीगर के हाथ में जरी-जरदोजी की वही बारीकी। नवाबों का दरबार नहीं रहा लेकिन उनकी कई रवायतें आज भी शहर की आबोहवा में घुली हैं। कई परंपराएं ऐसी भी हैं, जिनका नाम अब सिर्फ बुजुर्गों की यादों में रह गया है।
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ऐतिहासिक शहर रामपुर की रियासत पर करीब ढाई सौ साल तक नवाबों ने शासन किया। इस दाैरान उन्होंने अपने कामकाज से शहर को तमाम ऐसे ऐतिहासिक स्थल दिए जो आज भी विश्व प्रसिद्ध हैं। खानपान से लेकर संगीत तक के किरदारों को उन्होंने खास तवज्जो दी। बुजुर्गों के अनुसार, नवाब के दरबार में संगीत की लहरियों की गूंज आज भी वह महसूस कर सकते हैं। दशकों पहले नवाबी दौर खत्म हो चुका है लेकिन यहां की रवायतें आज भी कहीं न कहीं जिंदा नजर आती हैं। रामपुर के खानपान से जुड़ी दस्तरखान हो या फिर उर्दू शायरी से जुड़ा इतिहास रहा हो। रामपुर की पुरानी रसोई से जुड़ी हस्तलिखित किताबें और व्यंजन लगभग लुप्त हो चुके हैं। समय के साथ बहुत कुछ बदल गया। कभी नवाबी महफिलों और दरबारों का हिस्सा रही कई रस्में अब लोगों की यादों में ही रह गईं हैं। पुराने खानसामों के हाथों के कई व्यंजन घरों से गायब हो चुके हैं। दास्तानगोई, महफिलों की बैठकी और खास अंदाज की मेहमान नवाजी जैसी परंपराएं भी पहले की तरह अब नजर नहीं आतीं।
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इन इलाकों में नवाबी रवायतें अभी कायम
दशकों बाद भी रामपुर के कई इलाकों में आज भी नवाबी रवायतें कायम हैं। अगर आपको इससे रूबरू होना है तो शहर के महल सराय, पान दरीबा, कटरा जलालउद्दीन, सराफा बाजार, बाजार नसरुल्ला खां, चाकू बाजार, पुरानी तहसील, मदरसा कोहना, लाल मस्जिद, बजरिया मुल्ला जरीफ, अखाड़ा सोहराब खां, पुराना गंज, मंगल की बाजार, पांच कब्रे, बिलासपुर गेट, दोमहला रोड, पीर की पैठ, घेर नज्जू खां आदि इलाकों से गुजर सकते हैं।
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दस्तरख्वान पर अब भी बचा है पुराने स्वाद का असर
रामपुर की नवाबी पहचान में खानपान की खास जगह रही है। पुराने परिवारों में आज भी कुछ ऐसे व्यंजन बनाए जाते हैं जिनकी विधि पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ी है। इतिहासकार महेंद्र सक्सेना बताते हैं कि पहले किसी खास मौके पर बनने वाले व्यंजन सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि मेहमान नवाजी और सामाजिक रिश्तों का हिस्सा होते थे। बड़े दस्तरख्वान पर परिवार और मेहमान एक साथ बैठते थे। अब परिवार छोटे हुए तो बड़े दस्तरख्वान की परंपरा भी सीमित होती गई। कई व्यंजनों को बनाने में लगने वाला समय और मेहनत अधिक होने के कारण नई पीढ़ी ने उन्हें रोजमर्रा की रसोई से दूर कर दिया हलांकि शहर के होटलों पर इस तरह का स्वाद देने का प्रयास हो रहा है।

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पुराने गेट और गलियां सुनाती हैं बीते दौर की कहानी
रामपुर के पुराने हिस्सों में घूमते हुए नवाबी दौर की स्थापत्य शैली की झलक मिलती है। पुराने दरवाजे, हवेलियां और गलियां शहर के इतिहास की गवाही देते हैं। कई जगहों पर समय की मार से इनकी हालत बदली है, लेकिन नाम और पहचान अब भी कायम है। इन गलियों से गुजरने वाले लोगों में बहुत कम ऐसे हैं जो इन इमारतों से जुड़ी पूरी कहानी जानते हों।
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महफिलें खत्म हुईं, यादें बाकी
नवाबी दौर में शायरी, संगीत और साहित्य से जुड़ी महफिलें शहर की सांस्कृतिक जिंदगी का अहम हिस्सा थीं। शायरों, कलाकारों और विद्वानों को संरक्षण मिलता था। आज मुशायरे और साहित्यिक आयोजन होते हैं, लेकिन पुराने दौर की नियमित महफिलों जैसा वातावरण अब कम दिखाई देता है। यही बदलाव रामपुर की विरासत की सबसे बड़ी कहानी है। परंपराएं पूरी तरह खत्म नहीं हुईं लेकिन उनका मूल स्वरूप जरूर बदल गया।
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