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मिलावटखोर दुकानदार पर 24 साल चला मुकदमा, दोषी मिला तो 6 माह की हुई सजा
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रायबरेली। 24 साल तक चले मुकदमे के बाद आखिरकार मिलावटखोर दुकानदार को कोर्ट ने दोषी ठहराया। अपर न्यायिक मजिस्ट्रेट पूजा गुप्ता ने सेहत के लिए खतरनाक दालमोठ की बिक्री करने वाले दुकानदार जमुना प्रसाद को छह माह की सश्रम सजा सुनाई है।
दोषी पर 1500 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। न्यायालय ने कहा कि दालमोठ में खेसारी की मिलावट मिली थी। यह मानव प्रयोग के लिए खतरनाक पदार्थ है। खेसारी के लगातार प्रयोग से मनुष्य के तंत्रिका तंत्र पर घातक प्रभाव पड़ता है। वह लवकाग्रस्त हो सकता है।
10 जून 1994 को तत्कालीन खाद्य निरीक्षक एससी अवस्थी ने बछरावां क्षेत्र के रामपुर सुदौली गांव में जमुना प्रसाद की दुकान का निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान दुकान का लाइसेंस भी नहीं मिला था। खाद्य निरीक्षक ने दुकान से दालमोठ का नमूना सील कर जांच के लिए भेजा था। 16 जुलाई 1994 को आई जांच रिपोर्ट में दालमोठ में खेसारी की मिलावट मिली थी। इस पर दालमोठ को असुरक्षित घोषित कर दिया गया था।
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तत्कालीन खाद्य निरीक्षक ने न्यायालय में 14 अक्तूबर 1997 को मुकदमा दर्ज कराया था। मुकदमे की सुनवाई करते हुए अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम पूजा गुप्ता ने दुकानदार जमुना प्रसाद को खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम 1954 की धारा 7 (1, 2 व 5) के तहत किए गए अपराध का दोषी करार दिया। न्यायालय ने माना कि दालमोठ में खेसारी की मिलावट थी।
यह मानव प्रयोग के लिए खतरनाक पदार्थ है व मनुष्य के तंत्रिका तंत्र पर घातक प्रभाव डालती है। उसे लकवा भी हो सकता है। उन्होंने दोषी दुकानदार को छह माह का सश्रम कारावास की सजा सुनाई। साथ ही उस पर 1500 रुपये का अर्थदंड लगाया। एफएसडीए के अभिहित अधिकारी इंद्र बहादुर यादव का कहना है कि एफएसओ के माध्यम से मुकदमे में अच्छी पैरवी की गई, जिसके कारण असुरक्षित दालमोठ बेचने वाले को सजा मिली है।
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दोषी पर 1500 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। न्यायालय ने कहा कि दालमोठ में खेसारी की मिलावट मिली थी। यह मानव प्रयोग के लिए खतरनाक पदार्थ है। खेसारी के लगातार प्रयोग से मनुष्य के तंत्रिका तंत्र पर घातक प्रभाव पड़ता है। वह लवकाग्रस्त हो सकता है।
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10 जून 1994 को तत्कालीन खाद्य निरीक्षक एससी अवस्थी ने बछरावां क्षेत्र के रामपुर सुदौली गांव में जमुना प्रसाद की दुकान का निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान दुकान का लाइसेंस भी नहीं मिला था। खाद्य निरीक्षक ने दुकान से दालमोठ का नमूना सील कर जांच के लिए भेजा था। 16 जुलाई 1994 को आई जांच रिपोर्ट में दालमोठ में खेसारी की मिलावट मिली थी। इस पर दालमोठ को असुरक्षित घोषित कर दिया गया था।
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तत्कालीन खाद्य निरीक्षक ने न्यायालय में 14 अक्तूबर 1997 को मुकदमा दर्ज कराया था। मुकदमे की सुनवाई करते हुए अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम पूजा गुप्ता ने दुकानदार जमुना प्रसाद को खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम 1954 की धारा 7 (1, 2 व 5) के तहत किए गए अपराध का दोषी करार दिया। न्यायालय ने माना कि दालमोठ में खेसारी की मिलावट थी।
यह मानव प्रयोग के लिए खतरनाक पदार्थ है व मनुष्य के तंत्रिका तंत्र पर घातक प्रभाव डालती है। उसे लकवा भी हो सकता है। उन्होंने दोषी दुकानदार को छह माह का सश्रम कारावास की सजा सुनाई। साथ ही उस पर 1500 रुपये का अर्थदंड लगाया। एफएसडीए के अभिहित अधिकारी इंद्र बहादुर यादव का कहना है कि एफएसओ के माध्यम से मुकदमे में अच्छी पैरवी की गई, जिसके कारण असुरक्षित दालमोठ बेचने वाले को सजा मिली है।