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बागी पर आंख मूंदकर विश्वास और कमजोर रणनीति ने सपा को पछाड़ा

Wed, 30 Jun 2021 01:09 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Wed, 30 Jun 2021 01:09 AM IST
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Zila Panchayat adhyaksha BJP defeat SP
पीलीभीत। सफलता पाने के लिए खुद में आत्मविश्वास होना बेहतर है, मगर जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास अक्सर नुकसान का सबब बनता है। जिला पंचायत अध्यक्ष पद की राजनीति में समाजवादी पार्टी का हाल भी कुछ इसी तरह रहा। कुर्सी पर काबिज होने की दौड़ में बागी पर आंख मूंदकर विश्वास करना और कमजोर रणनीति सियासी खींचतान में सपा को एक पल में चुनाव की तारीख से पहले ही पछाड़ गई। घोषित किए गए प्रत्याशी के अचानक भाजपा में वापसी करने के बाद सपाइयों के हाथ खाली रह गए हैं।
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जनपद में जिला पंचायत सदस्य के 34 पद हैं। चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने बड़े-बड़े दावे करते हुए प्रत्याशी उतारे। मगर जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर काबिज होने के लिए जरूरी 18 का जादुई आंकड़ा कोई नहीं छू सका था। भाजपा, सपा और बसपा को छह-छह सीटों पर विजय मिली, जबकि कांग्रेस एक सीट पर जीत दर्ज कराकर इस लड़ाई से ही बाहर हो गई थी। बाद में बसपा ने भी अध्यक्ष पद पर चुनाव से हाथ खींच लिए थे। सीधी टक्कर भाजपा और सपा के बीच हो गई थी। भाजपा से निवर्तमान जिला महामंत्री गुरुभाग सिंह की पत्नी डॉ. दलजीत कौर का घोषित होना लगभग तय हो चुका था। सपा को जीतकर आए अपने सदस्यों में मजबूत चेहरे की तलाश थी। भाजपा से दावेदारी कर रहे स्वामी प्रवक्तानंद को तोड़कर सपा अपने पाले में ले आई उन्हें अपना प्रत्याशी भी घोषित कर नामांकन करा दिया था। यहां तक तो सपा की राजनीति बेहतर मानी जाती रही। भाजपाइयों के लिए भी चिंतन का विषय बना। मगर इसके बाद आगे की रणनीति बनाने पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। बागी बनकर आए स्वामी प्रवक्तानंद पर आंख मूंदकर विश्वास करते चले गए। यही वजह रही कि उनके नामांकन के साथ में किसी डमी प्रत्याशी का नामांकन नहीं कराया। अब चर्चा हो रही है कि अगर ऐसा किया गया होता तो शायद अभी बाजी पूरी तरह से हाथ से न जाती। ऐसा नहीं कि सपा के पास दिग्गजों की कमी रही। पूर्व राज्यमंत्री हेमराज वर्मा, सपा जिलाध्यक्ष जगदेव सिंह जग्गा, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष बुद्धसेन वर्मा जैसे उसके पास थे। रणनीति पर सवाल इस बात से भी उठाए जा रहे हैं कि अंत तक सपा को अपने प्रत्याशी के बगावत कर जाने का आभास तक नहीं हुआ। वह कब उनकी गिरफ्त से निकलकर भाजपा के पाले में चले गए। इसकी जानकारी मंगलवार सुबह तब हो सकी, जब नाम वापसी की पूरी तैयारी की जा चुकी थी।
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एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने की तैयारी में दिग्गज
जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव विधानसभा के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा था। पिछले कुछ दिनों में हुई उथल-पुथल से चुनाव प्रतिष्ठा का भी बन चुका था। स्वामी प्रवक्तानंद को तोड़कर लाने के बाद कई नेता अपनी पीठ थपथपाने में जुट गए थे। मगर अब भाजपा में हुई वापसी के बाद गुटबाजी भी बढ़ गई है। एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने की तैयारी भीतरखाने चल रही है। कुुछ नेता तो अभी से अपने पक्ष में पैरवी करने के लिए राजधानी लखनऊ निकल गए हैं, ताकि कहीं संगठन के बड़े नेताओं की ओर से उन पर गाज न गिरा दी जाए।
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ऐसा नहीं है कि आंख मूंदकर विश्वास किया गया और रणनीति कमजोर रही। स्वामी प्रवक्तानंद भाजपा में खुद को ठगा महसूस कर रहे थे। सपा ने उन्हें अपना प्रत्याशी बनाकर सम्मान दिया था। अब वह क्यों चले गए, ये तो उनके भाजपा के चंगुल से आजाद होने के बाद ही पता लगेगा। फिलहाल आगे जीत हमारी ही होनी है। भाजपा प्रत्याशी की जाति पर लगाई आपत्ति को लेकर कोर्ट जाएंगे। फिर नामांकन भी निरस्त होगा और फर्जी प्रमाणपत्र बनाकर जिताने वाले भी जेल जाएंगे। - हेमराज वर्मा, सपा के पूर्व मंत्री
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