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अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस विशेषः संयमित जीवनशैली और खानपान के दम पर बुजुर्गों ने युवाओं को दिखाया सेहत का आइना
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नरेंद्र मोहन सक्सेना
- फोटो : PILIBHIT
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पीलीभीत। आधुनिक जीवनशैली और अनियमित दिनचर्या से जहां आज अधिकांश युवा तनाव और अवसाद से ग्रसित हैं। वहीं तमाम बुजुर्ग ऐसे हैं जिनकी उम्र 60 साल या उसके पार हो चुकी है। मगर, वह युवाओं जैसे फुर्तीले दिखते हैं। ऐसे बुजुर्ग समाज में बाकी लोगों के लिए मिसाल कायम कर रहे हैं। 70 से लेकर 80 साल तक के बुजुर्गों में हौसला और जज्बा एक युवा की तरह दिखता है। इनकी दिनचर्या जानकर कोई भी हैरान रह सकता है।
बुढ़ापा जीवन का एक ऐसा पड़ाव है, जहां तमाम बीमारियां आकर घेर लेती हैं। शरीर शिथिल पड़ने लगता है। शरीर की कार्यक्षमता जवानी के दिनों जैसी नहीं रह जाती। 60 साल के बाद अधिकांश व्यक्ति स्वयं केे बुजुर्ग समझने लगते हैं। मगर, अब भी तमाम बुजुर्ग व्यवस्थित दिनचर्या और खानपान से अपने शरीर की कार्यक्षमता बेहतर बनाए हुए हैं। वह काम और शारीरिक चुस्ती फुर्ती में युवाओं को भी मात दे रहे हैं।
80 साल की उम्र में युवा जोश से लबरेज राजेंद्र सिंह
शहर की अशोक कॉलोनी निवासी 80 वर्षीय राजेंद्र सिंह छाबड़ा पिछले कई साल से अपनी हिम्मत ओर जज्बे के साथ जवान बने हुए हैं। 47 के दशक में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान वह सात साल की उम्र में पिता का हाथ थामे पीलीभीत आए थे। यहां आकर उन्होंने मेहनत से कभी मुंह नहीं मोड़ा। मर्चेंट नेवी में जाने का सपना भी पूरा किया, मगर पिता की मृत्यु के बाद उन्हें परिवार संभालना पड़ा। अपने सपने को सीने में दबाकर जीविकोपार्जन के लिए कई व्यवसाय किए। उनका कहना है कि पिता का सपना था कि बच्चों को पढ़ाई के लिए दूसरे जनपद में न जाना पड़े। इसके लिए उन्होंने शहर में ज्ञान इंटरनेशनल स्कूल की स्थापना की। वह सुबह साढ़े पांच बजे उठकर व्यायाम करते हैं। बगीचे की देखभाल नियमित करते हैं। पौत्र रिशित की पढ़ाई में मदद करना नहीं भूलते। कहते हैं कि नियमित व्यायाम और संयमित खानपान अच्छी सेहत का राज है।
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75 की उम्र में भी फिट हैं रमेश चंद्र आहुजा
भारत-पाकिस्तान विभाजन को अपनी आंखों से देखने वाले 75 वर्षीय रमेश चंद्र आहुजा इस उम्र में भी अपने अधिकांश कार्य स्वयं ही करते हैं। विभाजन के बाद तमाम मुश्किल हालात झेलकर अपने परिवार के साथ पहले जालंधर रहे। उसके बाद बरेली में रहने के बाद पीलीभीत को अपनी कर्मस्थली बनाया। पढ़ाई करने के बाद यहीं रहकर कारोबार शुरू कर दिया। उनका कहना है कि यह ईश्वर की कृपा है कि आजकल जहां 60-65 की उम्र में लोग तमाम बीमारियों के शिकार हो जाते हैं, वहीं वह हमेशा स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहे। प्रतिदिन रात दस बजे सोना और सुबह तीन बजे उठना उनकी दिनचर्या में शामिल है। 55 साल तक मार्निंग वॉक की। मगर, आजकल कोरोना के चलते घर में ही हल्का फुल्का व्यायाम कर लेते हैं। उनका कहना है कि युवाओं को भी अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना चाहिए। जीवन में तरक्की के लिए स्वस्थ शरीर का होना भी जरूरी है।
73 बसंत देख चुके हैं नरेंद्र मोहन युवाओं को करते हैं प्रेरित
सेवानिवृत प्रधानाचार्य नरेंद्र मोहन सक्सेना कहते हैं कि आजकल जिस उम्र में युवा मौजमस्ती में खुद को व्यस्त रखते हैं, उस उम्र में उन्हें कड़े संघर्ष के दौर से गुजरना पड़ा। निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले नरेंद्र मोहन सक्सेना जीवन के 73 बसंत देखने के बाद भी सुबह और शाम नियमित रूप से टहलना और व्यायाम करना नहीं भूलते। उन्होंने बताया कि शिक्षा क्षेत्र से उनका खासा लगाव है। इसीलिए वर्ष 2008 में सेवानिवृत होने के बाद भी वह एक निजी इंस्टीट्यूट में प्रबंधक पद पर कार्यरत हैं। आजकल के युवाओं को फिट रहने के लिए वह कहते हैं कि जीवन में प्रतिदिन कुछ वक्त शरीर और मन को देना चाहिए। यह करने से आपकी सोच सकारात्मक होगी। शरीर भी स्वस्थ रहेगा।
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बुढ़ापा जीवन का एक ऐसा पड़ाव है, जहां तमाम बीमारियां आकर घेर लेती हैं। शरीर शिथिल पड़ने लगता है। शरीर की कार्यक्षमता जवानी के दिनों जैसी नहीं रह जाती। 60 साल के बाद अधिकांश व्यक्ति स्वयं केे बुजुर्ग समझने लगते हैं। मगर, अब भी तमाम बुजुर्ग व्यवस्थित दिनचर्या और खानपान से अपने शरीर की कार्यक्षमता बेहतर बनाए हुए हैं। वह काम और शारीरिक चुस्ती फुर्ती में युवाओं को भी मात दे रहे हैं।
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80 साल की उम्र में युवा जोश से लबरेज राजेंद्र सिंह
शहर की अशोक कॉलोनी निवासी 80 वर्षीय राजेंद्र सिंह छाबड़ा पिछले कई साल से अपनी हिम्मत ओर जज्बे के साथ जवान बने हुए हैं। 47 के दशक में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान वह सात साल की उम्र में पिता का हाथ थामे पीलीभीत आए थे। यहां आकर उन्होंने मेहनत से कभी मुंह नहीं मोड़ा। मर्चेंट नेवी में जाने का सपना भी पूरा किया, मगर पिता की मृत्यु के बाद उन्हें परिवार संभालना पड़ा। अपने सपने को सीने में दबाकर जीविकोपार्जन के लिए कई व्यवसाय किए। उनका कहना है कि पिता का सपना था कि बच्चों को पढ़ाई के लिए दूसरे जनपद में न जाना पड़े। इसके लिए उन्होंने शहर में ज्ञान इंटरनेशनल स्कूल की स्थापना की। वह सुबह साढ़े पांच बजे उठकर व्यायाम करते हैं। बगीचे की देखभाल नियमित करते हैं। पौत्र रिशित की पढ़ाई में मदद करना नहीं भूलते। कहते हैं कि नियमित व्यायाम और संयमित खानपान अच्छी सेहत का राज है।
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75 की उम्र में भी फिट हैं रमेश चंद्र आहुजा
भारत-पाकिस्तान विभाजन को अपनी आंखों से देखने वाले 75 वर्षीय रमेश चंद्र आहुजा इस उम्र में भी अपने अधिकांश कार्य स्वयं ही करते हैं। विभाजन के बाद तमाम मुश्किल हालात झेलकर अपने परिवार के साथ पहले जालंधर रहे। उसके बाद बरेली में रहने के बाद पीलीभीत को अपनी कर्मस्थली बनाया। पढ़ाई करने के बाद यहीं रहकर कारोबार शुरू कर दिया। उनका कहना है कि यह ईश्वर की कृपा है कि आजकल जहां 60-65 की उम्र में लोग तमाम बीमारियों के शिकार हो जाते हैं, वहीं वह हमेशा स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहे। प्रतिदिन रात दस बजे सोना और सुबह तीन बजे उठना उनकी दिनचर्या में शामिल है। 55 साल तक मार्निंग वॉक की। मगर, आजकल कोरोना के चलते घर में ही हल्का फुल्का व्यायाम कर लेते हैं। उनका कहना है कि युवाओं को भी अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना चाहिए। जीवन में तरक्की के लिए स्वस्थ शरीर का होना भी जरूरी है।
73 बसंत देख चुके हैं नरेंद्र मोहन युवाओं को करते हैं प्रेरित
सेवानिवृत प्रधानाचार्य नरेंद्र मोहन सक्सेना कहते हैं कि आजकल जिस उम्र में युवा मौजमस्ती में खुद को व्यस्त रखते हैं, उस उम्र में उन्हें कड़े संघर्ष के दौर से गुजरना पड़ा। निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले नरेंद्र मोहन सक्सेना जीवन के 73 बसंत देखने के बाद भी सुबह और शाम नियमित रूप से टहलना और व्यायाम करना नहीं भूलते। उन्होंने बताया कि शिक्षा क्षेत्र से उनका खासा लगाव है। इसीलिए वर्ष 2008 में सेवानिवृत होने के बाद भी वह एक निजी इंस्टीट्यूट में प्रबंधक पद पर कार्यरत हैं। आजकल के युवाओं को फिट रहने के लिए वह कहते हैं कि जीवन में प्रतिदिन कुछ वक्त शरीर और मन को देना चाहिए। यह करने से आपकी सोच सकारात्मक होगी। शरीर भी स्वस्थ रहेगा।

रमेश चंद्र आहूजा- फोटो : PILIBHIT

राजेंद्र सिंह छाबड़ा- फोटो : PILIBHIT