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बाघों का कुनबा बढने की खुशी मनाएं या मानव-वन्यजीव संघर्ष का मातम
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पीलीभीत। टाइगर रिजर्व बनने के पांच साल पूरे कर चुका जिले का जंगल बंदोबस्त के लिहाज से आज भी बदहाल है। बात भले ही बाघ संरक्षण की होती हो, लेकिन धरातल और कागजों में इंतजाम अलग-अलग है। न तो बाघ सुरक्षित हैं और न जंगल से सटे इलाकों में लोग। स्टाफ की कमी के साथ संसाधन भी पूरे नहीं किए जा सके हैं। बाघों का कुनबा बढ़ने की खुशी तो मनाई जा रही है, लेकिन मानव वन्यजीव संघर्ष पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अधूरे बंदोबस्त के चलते कभी मानव तो कभी वन्यजीव अपनी जान गवां रहे हैं। यही वजह है कि एक साल में एक बाघ और एक बाघिन की पीट-पीटकर हत्या की जा चुकी है।
प्राकृतिक सुंदरता और बाघों के मामले में पूरे देश में मशहूर जिले के जंगल अब आबादी क्षेत्र में बाघों की चहलकदमी को लेकर चर्चा में हैं। इसकी रोकथाम के प्रयासों के बीच वन भूमि के उजाड़ने का सिलसिला भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है। अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले वर्षों में बाघों के हमले में 26 लोग जान गवां चुके हैं और बाघों की आबादी क्षेत्रों में चहलकदमी भी तेजी बढ़ रही है। यह अलग बात है कि जंगल का अनुकूल वातावरण होने के चलते टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या में इजाफा हो रहा है। वर्ष 2018 में हुई गणना में बाघों की संख्या 54 से अधिक सामने आई थी।
बाघों को बचाने के लिए बना था टाइगर प्रोजेक्ट
सरकार ने राष्ट्रीय पशु की संख्या घटने के बाद आए आंकड़ों को गंभीरता से लेते हुए एक अप्रैल 1973 को बाघों को बचाने के लिए प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की थी। जिसके बाद से केंद्रीय मंत्री व वन्यप्रेमी मेनका गांधी ने पीलीभीत जनपद में सेंच्युरी व टाइगर प्रोजेक्ट लागू कराने के प्रयास शुरू किए, लेकिन इसमेें तत्कालीन सपा सरकार के कार्यकाल में तेजी दिखाई दी और पांच साल पहले आनन फानन में यहां के जंगलों को टाइगर रिजर्व का दर्जा दे दिया गया। टाइगर रिजर्व बाघों के संरक्षण को लेकर बनाया गया, लेकिन पांच सालों में यहां बाघ संरक्षण की कवायद धरातल पर कम कागजों में ज्यादा दौड़ती दिख रही है।
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दावों के बीच बाघ और तेंदुए की होती रहीं मौतें
टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए अधिकारियों की ओर से प्रयास किए जाने के दावे होते रहे है। लेकिन पूर्व में विभिन्न कारणों से हो रही बाघ और तेंदुए की मौत पर अंकुश नहीं लग सका है। इसके साथ ही जंगल से बाहर निकल रहे वन्यजीवों की रोकथाम न होने से स्थिति और बिगड़ रही है। यही वजह है कि एक साल के भीतर एक बाघ और एक बाघिन की पीट पीटकर हत्या कर दी गई तो वर्ष 2016 से अब तक 24 लोग बाघों और अन्य वन्यजीवों के हमले से मारे जा चुके हैं।
बढ़ने के बजाए सिकुड़ रहा बाघों का दायरा
वन विशेषज्ञों के मुताबिक बाघ का अपना एक एरिया होता था। उस इलाके में नर बाघ, दूसरे बाघ को बर्दाश्त नहीं करता था और आपसी संघर्ष होता था। विशेषज्ञ बताते हैं कि पहले एक बाघ का कार्यक्षेत्र 20 वर्ग किलोमीटर होता था, लेकिन अब संख्या बढ़ी, क्षेत्र सिकुड़ा तो जंगल से बाहर एक साथ तीन से चार बाघ भी देखे जा रहे हैं। उनकी सुरक्षा को लेकर फिलहाल प्रयास धरातल पर नजर नहीं आ रहे है।
प्रस्तावों पर भी नहीं हो सका अमल
टाइगर रिजर्व बनने के बाद जंगल की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए प्रयास किए गए थे। इसके लिए वन और वन्यजीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए टाइगर रेस्क्यू सेंटर, जंगल सफारी, गैंडा परियोजना के प्रस्ताव बनाकर पूर्व वर्षों में शासन स्तर पर भेजे गए थे लेकिन लंबा समय बीतने के बाद एक भी प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिल सकी है।
फैक्ट फाइल
पांच रेंजो में फैला है टाइगर रिजर्व
रेंज के नाम क्षेत्रफल(हैक्टेयर में)
माला रेंज 16472.52
महोफ 14712.39
हरीपुर 11995.98
बराही 18339.94
दियोरिया 9766.82
वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ मानव वन्यजीव संघर्ष को रोकना प्राथमिकता है। इसके लिए संसाधनों के साथ स्टाफ की कमी को जल्द ही पूरा करने के प्रयास किए जाएंगे। चूंकि मैंने हाल ही में चार्ज लिया है, लेकिन जल्द ही स्थिति को समझकर व्यवस्थाओं में सुधार किए जाएंगे।
- नवीन खंडेलवाल, डीएफओ, पीलीभीत टाइगर रिजर्व
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प्राकृतिक सुंदरता और बाघों के मामले में पूरे देश में मशहूर जिले के जंगल अब आबादी क्षेत्र में बाघों की चहलकदमी को लेकर चर्चा में हैं। इसकी रोकथाम के प्रयासों के बीच वन भूमि के उजाड़ने का सिलसिला भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है। अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले वर्षों में बाघों के हमले में 26 लोग जान गवां चुके हैं और बाघों की आबादी क्षेत्रों में चहलकदमी भी तेजी बढ़ रही है। यह अलग बात है कि जंगल का अनुकूल वातावरण होने के चलते टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या में इजाफा हो रहा है। वर्ष 2018 में हुई गणना में बाघों की संख्या 54 से अधिक सामने आई थी।
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बाघों को बचाने के लिए बना था टाइगर प्रोजेक्ट
सरकार ने राष्ट्रीय पशु की संख्या घटने के बाद आए आंकड़ों को गंभीरता से लेते हुए एक अप्रैल 1973 को बाघों को बचाने के लिए प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की थी। जिसके बाद से केंद्रीय मंत्री व वन्यप्रेमी मेनका गांधी ने पीलीभीत जनपद में सेंच्युरी व टाइगर प्रोजेक्ट लागू कराने के प्रयास शुरू किए, लेकिन इसमेें तत्कालीन सपा सरकार के कार्यकाल में तेजी दिखाई दी और पांच साल पहले आनन फानन में यहां के जंगलों को टाइगर रिजर्व का दर्जा दे दिया गया। टाइगर रिजर्व बाघों के संरक्षण को लेकर बनाया गया, लेकिन पांच सालों में यहां बाघ संरक्षण की कवायद धरातल पर कम कागजों में ज्यादा दौड़ती दिख रही है।
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दावों के बीच बाघ और तेंदुए की होती रहीं मौतें
टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए अधिकारियों की ओर से प्रयास किए जाने के दावे होते रहे है। लेकिन पूर्व में विभिन्न कारणों से हो रही बाघ और तेंदुए की मौत पर अंकुश नहीं लग सका है। इसके साथ ही जंगल से बाहर निकल रहे वन्यजीवों की रोकथाम न होने से स्थिति और बिगड़ रही है। यही वजह है कि एक साल के भीतर एक बाघ और एक बाघिन की पीट पीटकर हत्या कर दी गई तो वर्ष 2016 से अब तक 24 लोग बाघों और अन्य वन्यजीवों के हमले से मारे जा चुके हैं।
बढ़ने के बजाए सिकुड़ रहा बाघों का दायरा
वन विशेषज्ञों के मुताबिक बाघ का अपना एक एरिया होता था। उस इलाके में नर बाघ, दूसरे बाघ को बर्दाश्त नहीं करता था और आपसी संघर्ष होता था। विशेषज्ञ बताते हैं कि पहले एक बाघ का कार्यक्षेत्र 20 वर्ग किलोमीटर होता था, लेकिन अब संख्या बढ़ी, क्षेत्र सिकुड़ा तो जंगल से बाहर एक साथ तीन से चार बाघ भी देखे जा रहे हैं। उनकी सुरक्षा को लेकर फिलहाल प्रयास धरातल पर नजर नहीं आ रहे है।
प्रस्तावों पर भी नहीं हो सका अमल
टाइगर रिजर्व बनने के बाद जंगल की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए प्रयास किए गए थे। इसके लिए वन और वन्यजीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए टाइगर रेस्क्यू सेंटर, जंगल सफारी, गैंडा परियोजना के प्रस्ताव बनाकर पूर्व वर्षों में शासन स्तर पर भेजे गए थे लेकिन लंबा समय बीतने के बाद एक भी प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिल सकी है।
फैक्ट फाइल
पांच रेंजो में फैला है टाइगर रिजर्व
रेंज के नाम क्षेत्रफल(हैक्टेयर में)
माला रेंज 16472.52
महोफ 14712.39
हरीपुर 11995.98
बराही 18339.94
दियोरिया 9766.82
वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ मानव वन्यजीव संघर्ष को रोकना प्राथमिकता है। इसके लिए संसाधनों के साथ स्टाफ की कमी को जल्द ही पूरा करने के प्रयास किए जाएंगे। चूंकि मैंने हाल ही में चार्ज लिया है, लेकिन जल्द ही स्थिति को समझकर व्यवस्थाओं में सुधार किए जाएंगे।
- नवीन खंडेलवाल, डीएफओ, पीलीभीत टाइगर रिजर्व