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Pilibhit News: पीटीआर में बाघ बढ़े, निगरानी के लिए अमला घटा, सुरक्षा पर संकट

Mon, 28 Sep 2026 02:27 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 28 Sep 2026 02:27 AM IST
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Tiger numbers rise in PTR, but monitoring staff shrinks; security at risk.
पीलीभीत टाइगर रिजर्व के चूका बीच का गेट। संवाद
- पीटीआर में 224 पदों में 124 खाली, वन रक्षक के 47 पद रिक्त, जंगल की सुरक्षा और मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ 100 कर्मियों पर
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संवाद न्यूज एजेंसी
पीलीभीत। पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) में बाघों की सुरक्षा के लिए सबसे जरूरी फील्ड स्टाफ ही पर्याप्त नहीं है। मार्च 2026 तक के विभागीय आंकड़ों के अनुसार, स्वीकृत 224 पदों के मुकाबले महज 100 कर्मचारी तैनात हैं। 124 पद रिक्त हैं। वन क्षेत्र की निगरानी, गश्त और वन्यजीवों की सुरक्षा में सीधे भूमिका निभाने वाले वन रक्षकों की स्थिति सबसे चिंताजनक है। 64 स्वीकृत पदों में सिर्फ 17 वन रक्षक कार्यरत हैं, जबकि 47 पद खाली हैं।
पीटीआर में बाघों की सख्या बढ़ गई है। उनकी गतिविधियों पर नजर रखने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए लगातार निगरानी जरूरी है। जंगल से आबादी की ओर बाघों की आवाजाही होने पर सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचना, ग्रामीणों को सतर्क करना, भीड़ को नियंत्रित करना और जरूरत पड़ने पर रेस्क्यू अभियान चलाना वन विभाग की जिम्मेदारी होती है। सीमित मानव बल में इन सभी कार्यों को संभालना विभाग के सामने बड़ी चुनौती है।
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फॉरेस्टर के 21 और चालकों के 12 पद खाली
फॉरेस्टर के 56 स्वीकृत पदों में 35 कर्मचारी कार्यरत हैं और 21 पद रिक्त हैं। रेंजर के नौ पदों में छह व उप रेंजर के आठ में पांच कर्मचारी तैनात हैं। वाहन चालकों की भी कमी है। 15 पदों के सापेक्ष केवल तीन चालक उपलब्ध हैं, जबकि 12 पद खाली हैं। इससे गश्ती दलों की आवाजाही और वन क्षेत्र में त्वरित पहुंच की व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका रहती है।
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प्रशासनिक अधिकारी के दो, प्रधान सहायक, एएसओ, स्टेनो, ड्राफ्टमैन, सर्वेयर और ट्रैक्टर मैकेनिक के एक-एक पद पर कोई कर्मचारी नहीं है। कई अन्य सहायक श्रेणी के पद भी रिक्त हैं। कुल मिलाकर स्वीकृत पदों का आधे से भी कम मानव बल उपलब्ध होने से मौजूदा कर्मियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी है।
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11 साल में 20 बाघ आबादी से किए गए रेस्क्यू
पीटीआर के अभिलेखों के अनुसार, जून 2014 से जून 2025 तक 29 बार बाघ और तेंदुए जंगल की सीमा से निकलकर आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचे। इनमें 20 बाघ और नौ तेंदुए शामिल रहे। रेस्क्यू अभियान चलाकर इन्हें सुरक्षित पकड़ा गया। कुछ को जंगल में छोड़ा गया, जबकि अन्य को दुधवा टाइगर रिजर्व, नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान लखनऊ और वन्यजीव पुनर्वास केंद्र कानपुर भेजा गया।
आबादी में बाघ की मौजूदगी की सूचना मिलने के बाद हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। ऐसे मामलों में प्रशिक्षित फील्ड अमले की उपलब्धता सीधे तौर पर रेस्क्यू और सुरक्षा अभियान की गति से जुड़ी रहती है।
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12 साल में बाघ हमलों में 60 लोगों की मौत
वर्ष 2014 से 2026 तक जिले में बाघ के हमलों में 60 लोगों की मौत दर्ज की गई है। वर्ष 2017 में सर्वाधिक 17 लोगों की जान गई। वर्ष 2020 और 2024 में आठ-आठ मौतें हुईं। ऐसे आंकड़ों के बीच जंगल और आबादी की सीमा पर निगरानी व्यवस्था को मजबूत रखना महत्वपूर्ण है।

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शासन को भेजी जा रही रिक्त पदों की जानकारी
डीएफओ मनीष सिंह के अनुसार, रिक्त पदों को भरने के लिए शासन स्तर पर समय-समय पर मांग भेजी जाती रही है। उपलब्ध स्टाफ के माध्यम से वन एवं वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के प्रयास जारी हैं। ग्रामीणों को लगातार जागरूक किया जा रहा है और इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं।
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