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एसटीएफ से कराई जाए पूरे मामले की जांच
अमर उजाला ब्यूरो पीलीभीत।
Updated Fri, 20 Apr 2018 12:03 AM IST
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बाघ की मौत का मामला:
वन संरक्षक ने भेजा पत्र, स्टॉफ भी मांगा
टाइगर रिजर्व में बाघ की मौत के मामले कम नहीं हो सके हैं। इसको लेकर कहीं न कहीं जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से बरती जा रही लापरवाही अहम वजह बनी हुई है। महोफ रेंज में बृहस्पतिवार को बाघ का शव मिलने के बाद खुद वनसंरक्षक ने बड़ी साफगोई के साथ लापरवाही स्वीकारते दिखाई दिए। उन्होंने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए सरकार से एसटीएफ या फिर किसी अन्य विशेष जांच एजेंसी से मामले की जांच कराने की मांग की है। वन संरक्षक ने इसके लिए पत्र प्रदेश सरकार को भेजा है। इसके अलावा रिक्त चल रहे पदों पर स्टॉफ की तैनाती कराने की भी मांग की है।
जिले के जंगल में बाघ की मौत का यह पहला मामला नहीं है। पिछले छह सालों में करीब सोलह मामले सामने आ चुके हैं। जिसमें 15 बाघ के शव मिले, तो एक तेंदुए का। अभी हाल ही में 25 मार्च को गर्दन पर चोट का निशान लगा बाघ देखा गया था। उसकी तलाश के काफी प्रयास किए गए, लेकिन वह नहीं मिला। चार दिन बाद ही 29 मार्च को शारदा सागर डैम के पास एक बाघ का शव मिला। इसके अलावा 11 अप्रैल को भी एक शावक का शव पड़ा मिला था। अब प्रकाश में आए इन सात लोगों से महकमा पूर्व में हुई घटनाओं को लेकर भी जानकारी जुटाएगा। वहीं वन संरक्षक पीपी सिंह ने मामले को गंभीर बताते हुए जांच एसटीएफ से कराने की मांग की है। इसके अलावा स्टाफ की कमी को पूरा करने के लिए भी पत्राचार किया है। जिसमें एसडीओ के रिक्त चल रहे तीन में से कम से कम दो पदों पर जल्द तैनाती करने की मांग की है। उन्होंने यह भी बताया कि बाघों की निगरानी के लिए टाइगर वॉचर गांव-गांव बनाए जाएंगे। जिनको मोबाइल भी मुहैया कराए जाएंगे।
जंगल में मिले खून की कराई जाएगी जांच
बाघ के शव के पास जंगल के भीतर खून पड़ा मिला था। इसके कई सेपिंल वन विभाग के अधिकारियों ने जमा किए हैं। जिनकी जांच कराई जाएगी। डीएफओ कैलाश प्रकाश ने बताया कि जंगल में मिला खून बाघ का है या फिर बाघ के हमले में घायल हुए तीन लोगों का। इसको लेकर स्थिति स्पष्ट करने के लिए डीएनए टेस्ट कराया जाएगा। इससे काफी मदद मिलेगी।
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एक आरोपी के पिता का है पुराना रिकार्ड
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार बाघ की मौत के आरोपी सगे भाई श्रीकृष्ण और रुपलाल के पिता गंगाराम का पुराना अपराधिक रिकार्ड है। करीब आठ साल पहले उन पर शिकार के आरोप में कार्रवाई की जा चुकी है।
गुपचुप रही कार्रवाई, दूरी बनाते रहे अफसर
महोफ रेंज बाघ का शव मिलने के मामले में वन विभाग की कार्रवाई काफी गुपचुप तरीक से पूरी की गई। बाघ के शव को आईबीआरआई बरेली भेज दिया गया। इसके बाद भी दिन भर अधिकारी इस मामले में चुप्पी साधे रहे। हर कोई खुद का पल्ला झाड़कर एक दूसरे पर टालमटोल करता रहा। हालांकि शाम करीब पांच बजे प्रेसवार्ता में इसको लेकर स्थिति स्पष्ट की गई।
नहीं मिल सका टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स
टाइगर रिजर्व की सुरक्षा को लेकर उठाए जाने वाले कदम सिर्फ बयानबाजी तक सीमित हैं। धरातल पर कोई काम लंबे समय बाद भी पूरा नहीं हो सका है। खास बात यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स तैनात करने की बात कही थी। यह कहा गया कि इसको लेकर जल्द ही कार्रवाई को पूरा कर लिया जाएगा, लेकिन यह सब कागजों में ही सिमट कर रह गया है। चर्चाएं तो यहां तक रही कि स्थानीय अफसरों ने इसको लेकर खुद ही गंभीरता ही नहीं दिखाई। बताते हैं कि इसकी डिमांड भी नहीं भेजी जा सकी है। इसके पीछे भी अफसरों की मंशा पर तमाम सवाल खड़े किए जा चुके हैं।
तो वर्कआउट तक पहुंचना हो जाता मुश्किल
वन विभाग की कहानी से एक बात स्पष्ट है कि अगर बाघ के हमले में कथित शिकारी घायल नहीं हुए होते तो बाघ की मौत के वर्कआउट तक पहुंचना इतना आसान नहीं होता। बाघ के शव तक अधिकारी तब पहुंचे हैं, जब घायलों से बातचीत करने के बाद उन्होंने महोफ के जंगल के भीतर कांबिंग कर घटनास्थल की तलाश शुरू की।
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वन संरक्षक ने भेजा पत्र, स्टॉफ भी मांगा
टाइगर रिजर्व में बाघ की मौत के मामले कम नहीं हो सके हैं। इसको लेकर कहीं न कहीं जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से बरती जा रही लापरवाही अहम वजह बनी हुई है। महोफ रेंज में बृहस्पतिवार को बाघ का शव मिलने के बाद खुद वनसंरक्षक ने बड़ी साफगोई के साथ लापरवाही स्वीकारते दिखाई दिए। उन्होंने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए सरकार से एसटीएफ या फिर किसी अन्य विशेष जांच एजेंसी से मामले की जांच कराने की मांग की है। वन संरक्षक ने इसके लिए पत्र प्रदेश सरकार को भेजा है। इसके अलावा रिक्त चल रहे पदों पर स्टॉफ की तैनाती कराने की भी मांग की है।
जिले के जंगल में बाघ की मौत का यह पहला मामला नहीं है। पिछले छह सालों में करीब सोलह मामले सामने आ चुके हैं। जिसमें 15 बाघ के शव मिले, तो एक तेंदुए का। अभी हाल ही में 25 मार्च को गर्दन पर चोट का निशान लगा बाघ देखा गया था। उसकी तलाश के काफी प्रयास किए गए, लेकिन वह नहीं मिला। चार दिन बाद ही 29 मार्च को शारदा सागर डैम के पास एक बाघ का शव मिला। इसके अलावा 11 अप्रैल को भी एक शावक का शव पड़ा मिला था। अब प्रकाश में आए इन सात लोगों से महकमा पूर्व में हुई घटनाओं को लेकर भी जानकारी जुटाएगा। वहीं वन संरक्षक पीपी सिंह ने मामले को गंभीर बताते हुए जांच एसटीएफ से कराने की मांग की है। इसके अलावा स्टाफ की कमी को पूरा करने के लिए भी पत्राचार किया है। जिसमें एसडीओ के रिक्त चल रहे तीन में से कम से कम दो पदों पर जल्द तैनाती करने की मांग की है। उन्होंने यह भी बताया कि बाघों की निगरानी के लिए टाइगर वॉचर गांव-गांव बनाए जाएंगे। जिनको मोबाइल भी मुहैया कराए जाएंगे।
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जंगल में मिले खून की कराई जाएगी जांच
बाघ के शव के पास जंगल के भीतर खून पड़ा मिला था। इसके कई सेपिंल वन विभाग के अधिकारियों ने जमा किए हैं। जिनकी जांच कराई जाएगी। डीएफओ कैलाश प्रकाश ने बताया कि जंगल में मिला खून बाघ का है या फिर बाघ के हमले में घायल हुए तीन लोगों का। इसको लेकर स्थिति स्पष्ट करने के लिए डीएनए टेस्ट कराया जाएगा। इससे काफी मदद मिलेगी।
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एक आरोपी के पिता का है पुराना रिकार्ड
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार बाघ की मौत के आरोपी सगे भाई श्रीकृष्ण और रुपलाल के पिता गंगाराम का पुराना अपराधिक रिकार्ड है। करीब आठ साल पहले उन पर शिकार के आरोप में कार्रवाई की जा चुकी है।
गुपचुप रही कार्रवाई, दूरी बनाते रहे अफसर
महोफ रेंज बाघ का शव मिलने के मामले में वन विभाग की कार्रवाई काफी गुपचुप तरीक से पूरी की गई। बाघ के शव को आईबीआरआई बरेली भेज दिया गया। इसके बाद भी दिन भर अधिकारी इस मामले में चुप्पी साधे रहे। हर कोई खुद का पल्ला झाड़कर एक दूसरे पर टालमटोल करता रहा। हालांकि शाम करीब पांच बजे प्रेसवार्ता में इसको लेकर स्थिति स्पष्ट की गई।
नहीं मिल सका टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स
टाइगर रिजर्व की सुरक्षा को लेकर उठाए जाने वाले कदम सिर्फ बयानबाजी तक सीमित हैं। धरातल पर कोई काम लंबे समय बाद भी पूरा नहीं हो सका है। खास बात यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स तैनात करने की बात कही थी। यह कहा गया कि इसको लेकर जल्द ही कार्रवाई को पूरा कर लिया जाएगा, लेकिन यह सब कागजों में ही सिमट कर रह गया है। चर्चाएं तो यहां तक रही कि स्थानीय अफसरों ने इसको लेकर खुद ही गंभीरता ही नहीं दिखाई। बताते हैं कि इसकी डिमांड भी नहीं भेजी जा सकी है। इसके पीछे भी अफसरों की मंशा पर तमाम सवाल खड़े किए जा चुके हैं।
तो वर्कआउट तक पहुंचना हो जाता मुश्किल
वन विभाग की कहानी से एक बात स्पष्ट है कि अगर बाघ के हमले में कथित शिकारी घायल नहीं हुए होते तो बाघ की मौत के वर्कआउट तक पहुंचना इतना आसान नहीं होता। बाघ के शव तक अधिकारी तब पहुंचे हैं, जब घायलों से बातचीत करने के बाद उन्होंने महोफ के जंगल के भीतर कांबिंग कर घटनास्थल की तलाश शुरू की।