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Pilibhit News: 200 वर्ष पुरानी है चौपई की परंपरा, लोकनृत्य कर फाग गाते हैं कलाकार

Mon, 25 Mar 2024 12:36 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 25 Mar 2024 12:36 AM IST
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The tradition of Chaupai is 200 years old, artists perform folk dance and sing Phaag.
बीसलपुर। गमी वाले घरों में पहुंचकर चौपई टोलियों के लोकनृत्य करते हुए फाग गाने की चौपई परंपरा करीब 200 वर्ष पुरानी है। चौपई टोलियों से जुड़े कलाकार होली से करीब एक सप्ताह पहले तैयारी शुरू कर देते हैं। होली पर इन घरों में जाकर चौपई कार्यक्रम से गमी दूर करते हैं।
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नगर के कुछ मोहल्लों और तहसील के अधिकतर गांवों में चौपई टोलियां बनी हैं। कुछ स्थानों पर महिला चौपई दल भी हैं। इस दल के कलाकार होली में गमी वाले घरों में जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। संबंधित घरों के लोग इन कलाकारों को मिठाई खिलाते हैं और इनाम देते हैं।
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माना जाता है कि चौपई के बाद संबंधित घरों की गमी दूर हो जाती और घरों में पूड़ी-पकवान बनने लगते हैं। जिन घरों में गमी की वजह से पर्व नहीं मनाया जा सकता, वे लोग इन कलाकारों को आमंत्रित करते हैं। इन टोलियों में सभी आयु वर्ग के 10 से 15 कलाकार होते हैं। कलाकार घर के दरवाजे पर ग्रामीण अंदाज में नृत्य करने के साथ गीत गाते हैं। बता दें कि कुछ वर्ष पहले तक चौपई प्रतियोगिता भी होती थी।
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कर्मचारी और सेवानिवृत्त कर्मी भी शामिल हैं चौपई दल में



अगर चौपई दल की बात करें तो उनमें कर्मचारी और सेवानिवृत्त कर्मी भी शामिल रहते हैं। गांव बरखेड़ा यासीन निवासी और उच्च प्राथमिक विद्यालय बैरा के प्रधानाध्यापक कृष्णपाल, खांडेपुर निवासी डाक कर्मी कुलेंद्र पाल, नवदिया भगत के सेवानिवृत्त राजकीय बेसिक शिक्षक तेजराम गंगवार, हाफिजनगर के सेवानिवृत्त राजकीय बेसिक शिक्षक रामदास, गांव चंद्रपुरा के सेवानिवृत्त डाक कर्मचारी जमुना प्रसाद और गांव परसिया के सेवानिवृत्त लोक निर्माण विभाग कर्मचारी कल्याण राय भी इन दलों में शामिल हैं।



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इन स्थानों पर हैं चौपई दल

खेड़ा, दुबे, दुर्गाप्रसाद, ग्यासपुर, हबीबुल्ला खां शुमाली आदि मोहल्लों के अलावा हाफिजनगर, अमरा करोड़, कासिमपुर, जसोली, खांडेपुर, चंदपुरा, गोवल, पतीपुरा, नवदिया भगत, नवदिया सितारगंज, रंपुरा, फतेपुर, नगररिया, मानपुर, टेहरी, रंभोजा, पिपरिया और साबेपुर समेत अधिकतर गांवों में चौपई दल हैं।



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वाद्य यंत्रों से लैस रहते कलाकार

चौपई दलों के कलाकार हारमोनियम, ढोलक, झांझ, घुंघरू, मजीरा आदि वाद्य यंत्रों लेकर चलते हैं। अधिकतर कलाकारों के हाथों में मोरछला होते हैं। कई कलाकार भगवान श्रीकृष्ण, लिली घोड़ी और जोकर का रूप धारण कर भी चलते है। कुछ कलाकार नृत्य करते हैं। करम लिखी सो हुई के रहिवा, हम गमी मिटाने आए हैं। हम शोक मिटाने आए हैं। हम शोक मिटाकर जाएंगे आदि गीत गाते हैं।

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15 वर्ष की उम्र से कर रहे काम

उच्च प्राथमिक विद्यालय बैरा के प्रधानाध्यापक हैं। 54 वर्ष के हैं। 15 वर्ष की आयु से अपने गांव के चौपई दल में ढोलक बजाने का काम करते आ रहे हैं। आज तक किसी भी वर्ष होली में प्रदर्शन नहीं छोड़ा। प्रत्येक वर्ष होली आने का बेसब्री से इंतजार करते हैं।


- कृष्णपाल, गांव बरखेड़ा यासीन



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शारीरिक कमजोरी के बावजूद करते हैं मंचन

उम्र 96 वर्ष हो गई है। मोहल्ले के चौपई दल में मजीरा बजाते हैं। पेशे से राजमिस्त्री है। पिछले कुछ वर्षों से शारीरिक कमजोरी के कारण राजमिस्त्री का कार्य तो छोड़ रखा है, लेकिन होली पर चौपई मंचन का कार्य नहीं छोड़ा।

- लेखराज राजपूत, मोहल्ला दुबे-बीसलपुर
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