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दावत-ए- इस्लामीः लेनदेन की तह तक जाने के लिए बैंक खाते की छानबीन
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पीलीभीत। जिलेभर में गुल्लक रखकर दावत-ए-इस्लामी संगठन लोगों से चंदा एकत्रित करता था। चंदे की रकम जिस बैंक खाते में यहां से भेजी जाती थी वह आगरा का है। खाता नंबर पुलिस के खुफिया तंत्र को मिल गया है। अब उस खाते में लेनदेन का ब्योरा खंगाला जा रहा है।
बैंक खातों से चंदे की रकम के लेनदेन के तथ्य खुफिया तंत्र की जांच में सामने आ रहे हैं, लेकिन अभी तक अधिकारी इस विषय में कुछ भी कहने से बच रहे है। अधिकारियों का कहना है कि जब तक कोई निष्कर्ष सामने न आ जाए तब तक कुछ भी कहना उचित नहीं है। इस बीच जानकारी सामने आई है कि दावत-ए-इस्लामी के चंदे की फीडिंग एप के माध्यम से की जाती थी।
गुल्लक में ताला लगा रहता था और ताले को वही खोलता था जो दावत-ए-इस्लामी का एप चलाता था। एप के जरिये पल-पल जानकारी संगठन के आकाओं को मिलती रहती थी। चंदा इकट्ठा करने के बाद कौन बैंक में जमा करता था, कहां से कितना चंदा आता था। इस पर अभी कोई जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है लेकिन बैंक खाते में 41 लाख रुपये जमा होने की बात कही जा रही है। कुछ गुल्लकों में पासवर्ड होने की बात भी कही गई है।
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हालांकि इसके बारे में एक अधिकारी ने बताया कि गुल्लक तो बिना पासवर्ड के खुलती और बंद होती हैं लेकिन जब रुपये निकाले जाते थे तब उसकी फीडिंग मोबाइल के माध्यम से की जाती थी। एप वही चला पाता था, जिसे पासवर्ड मिला हो।
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बैंक खातों से चंदे की रकम के लेनदेन के तथ्य खुफिया तंत्र की जांच में सामने आ रहे हैं, लेकिन अभी तक अधिकारी इस विषय में कुछ भी कहने से बच रहे है। अधिकारियों का कहना है कि जब तक कोई निष्कर्ष सामने न आ जाए तब तक कुछ भी कहना उचित नहीं है। इस बीच जानकारी सामने आई है कि दावत-ए-इस्लामी के चंदे की फीडिंग एप के माध्यम से की जाती थी।
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गुल्लक में ताला लगा रहता था और ताले को वही खोलता था जो दावत-ए-इस्लामी का एप चलाता था। एप के जरिये पल-पल जानकारी संगठन के आकाओं को मिलती रहती थी। चंदा इकट्ठा करने के बाद कौन बैंक में जमा करता था, कहां से कितना चंदा आता था। इस पर अभी कोई जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है लेकिन बैंक खाते में 41 लाख रुपये जमा होने की बात कही जा रही है। कुछ गुल्लकों में पासवर्ड होने की बात भी कही गई है।
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हालांकि इसके बारे में एक अधिकारी ने बताया कि गुल्लक तो बिना पासवर्ड के खुलती और बंद होती हैं लेकिन जब रुपये निकाले जाते थे तब उसकी फीडिंग मोबाइल के माध्यम से की जाती थी। एप वही चला पाता था, जिसे पासवर्ड मिला हो।