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मां को मुखाग्नि देकर नजीर बन गई डॉ. अर्पणा
सुनील यादव पीलीभीत।
Updated Tue, 05 Jul 2016 11:39 PM IST
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संस्कृति
- फोटो : अरम उजाला
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बोली, यह परपंरा का विरोध नहीं, मेरी मां की अंतिम इच्छा थी
भारतीय संस्कृति में किसी की मृत्यु होने पर मुखाग्रि मृतक का बेटा, भाई, भतीजा, पति या पिता ही देता है। एक मां-बेटी, बहन-पत्नी किसी का तारण कर सकती है या नहीं। इसको लेकर कई तर्क वितर्क है लेकिन शहर की बल्लभनगर कालोनी के उपाध्याय परिवार का उदाहरण लें तो इस परिवार की अविवाहित बेटी ने बुधवार को अपनी मां को मुखाग्रि देकर पुरानी रुढ़िवादी परपंरा को मानने वालों को आइना दिखा दिया।
उपाधि कॉलेज के पूर्व प्रवक्ता डॉ. सिद्धेश्वर उपाध्याय का वर्ष 2012 में निधन हो चुका है। उनके परिवार में उनकी पत्नी सरोजनी उपाध्याय, विवाहित पुत्री डॉ. अर्चना उपाध्याय और एक अविवाहित पुत्री डॉ. अर्पणा उपाध्याय ही बचे थे। सोमवार शाम दोनों बहनों के हाथ से मां सरोजनी उपाध्याय का दामन भी छूट गया। चूंकि उपाध्याय फैमिली के कोई बेटा नहीं था। सो मां की डेढ़ दशक से देखभाल में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाली छोटी अविवाहित बेटी डॉ. अर्पणा और उनकी बड़ी बहन के आगे यक्ष प्रश्न आ खड़ा हुआ कि मां को मुखाग्रि कौन देगा? इस पर बड़ी बहिन डॉ. अर्चना ने बेझिझक अपनी मां की अंतिम इच्छा की बात बताते हुए छोटी बहिन द्वारा मां को मुखाग्नि देने की बात कही। मौजूद लोगों ने भी दोनों बहनों को मौन स्वीकृति दे दी। अपने जीवन के 40 बसंत पार कर चुकी छोटी बेटी ने भी मां के प्रति अपना फर्ज निभाते हुए मुक्ति धाम में मां की चिता को मुखाग्रि दी। मां को मुखाग्रि देने के बाद अर्पणा भी शहर भर के लिए एक नजीर साबित हुई।
अपने इस फैसले पर डॉ. अर्चना बताती है कि मां सरोजनी पिछले 15 साल से स्पाइनल प्राब्लम के चलते बिस्तर पर थी। सो छोटी बहन अर्पणा ने बेटी होने के बावजूद बेटा बनकर उनकी अब तक देखभाल की। इतना ही नहीं अपर्णा ने तो अपने पूरे जीवन को ही मां के लिए न्यौछावर कर दिया था। मां ने भी अर्पणा को ऐसा फर्ज निभाने को जिम्मा दिया जो हर किसी ने नसीब में नहीं होता है। मुखाग्रि देने वाली अर्पणा से जब पूछा तो उन्होंने रुंधे गले से बताया कि मां की अंतिम इच्छा थी कि मैं ही उन्हें मुखाग्रि दूं। मैंने वहीं किया जो मेरी मां की इच्छा थी। अपना फर्ज निभाकर मुझे सुकून मिला, नहीं तो मेरी मां की आत्मा तड़पती रहती। बड़ी बहन डॉ. अर्चना कहती हैं कि इसे परपंरा का विरोध या फिर सामाजिक नियम कायदों का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए। जहां संतानहीन या पुत्रियां ही हों, वहां पुरुष नातेदारी की तलाश क्यों की जाए। यह ज्यादा बेहतर होगा कि नारी भी इस परपंरा का वाहक बने।
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भारतीय संस्कृति में किसी की मृत्यु होने पर मुखाग्रि मृतक का बेटा, भाई, भतीजा, पति या पिता ही देता है। एक मां-बेटी, बहन-पत्नी किसी का तारण कर सकती है या नहीं। इसको लेकर कई तर्क वितर्क है लेकिन शहर की बल्लभनगर कालोनी के उपाध्याय परिवार का उदाहरण लें तो इस परिवार की अविवाहित बेटी ने बुधवार को अपनी मां को मुखाग्रि देकर पुरानी रुढ़िवादी परपंरा को मानने वालों को आइना दिखा दिया।
उपाधि कॉलेज के पूर्व प्रवक्ता डॉ. सिद्धेश्वर उपाध्याय का वर्ष 2012 में निधन हो चुका है। उनके परिवार में उनकी पत्नी सरोजनी उपाध्याय, विवाहित पुत्री डॉ. अर्चना उपाध्याय और एक अविवाहित पुत्री डॉ. अर्पणा उपाध्याय ही बचे थे। सोमवार शाम दोनों बहनों के हाथ से मां सरोजनी उपाध्याय का दामन भी छूट गया। चूंकि उपाध्याय फैमिली के कोई बेटा नहीं था। सो मां की डेढ़ दशक से देखभाल में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाली छोटी अविवाहित बेटी डॉ. अर्पणा और उनकी बड़ी बहन के आगे यक्ष प्रश्न आ खड़ा हुआ कि मां को मुखाग्रि कौन देगा? इस पर बड़ी बहिन डॉ. अर्चना ने बेझिझक अपनी मां की अंतिम इच्छा की बात बताते हुए छोटी बहिन द्वारा मां को मुखाग्नि देने की बात कही। मौजूद लोगों ने भी दोनों बहनों को मौन स्वीकृति दे दी। अपने जीवन के 40 बसंत पार कर चुकी छोटी बेटी ने भी मां के प्रति अपना फर्ज निभाते हुए मुक्ति धाम में मां की चिता को मुखाग्रि दी। मां को मुखाग्रि देने के बाद अर्पणा भी शहर भर के लिए एक नजीर साबित हुई।
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अपने इस फैसले पर डॉ. अर्चना बताती है कि मां सरोजनी पिछले 15 साल से स्पाइनल प्राब्लम के चलते बिस्तर पर थी। सो छोटी बहन अर्पणा ने बेटी होने के बावजूद बेटा बनकर उनकी अब तक देखभाल की। इतना ही नहीं अपर्णा ने तो अपने पूरे जीवन को ही मां के लिए न्यौछावर कर दिया था। मां ने भी अर्पणा को ऐसा फर्ज निभाने को जिम्मा दिया जो हर किसी ने नसीब में नहीं होता है। मुखाग्रि देने वाली अर्पणा से जब पूछा तो उन्होंने रुंधे गले से बताया कि मां की अंतिम इच्छा थी कि मैं ही उन्हें मुखाग्रि दूं। मैंने वहीं किया जो मेरी मां की इच्छा थी। अपना फर्ज निभाकर मुझे सुकून मिला, नहीं तो मेरी मां की आत्मा तड़पती रहती। बड़ी बहन डॉ. अर्चना कहती हैं कि इसे परपंरा का विरोध या फिर सामाजिक नियम कायदों का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए। जहां संतानहीन या पुत्रियां ही हों, वहां पुरुष नातेदारी की तलाश क्यों की जाए। यह ज्यादा बेहतर होगा कि नारी भी इस परपंरा का वाहक बने।
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