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48 दिन, चार पिंजरे... अफसर और वनकर्मियों की फौज...नतीजा शून्य
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पीलीभीत। सामाजिक वानिकी ने अमरिया इलाके में हमलावर दो तेंदुओं को पकड़ने के लिए ऑपरेशन तेंदुआ चलाया। जबसे यह अभियान चला, अब तक 48 दिन बीत चुके हैं। दोनों तेंदुए पकड़ने के लिए प्रभावित इलाके में चार पिंजरे लगाए गए मगर डेढ़ महीने बाद एक तेंदुआ भी नहीं पकड़ा जा सका। तेंदुए लगातार पालतू जानवरों को अपना निवाला बना रहे हैं। आस-पास के ग्रामीण इस बात से दहशत में हैं कि हिंसक हो चुका हमला करके किसी की भी जान ले सकता है।
करीब 73000 हेक्टेयर में फैले टाइगर रिजर्व में वर्तमान में 65 से अधिक बाघ और बड़ी संख्या में हिंसक और अहिंसक वन्यजीव विचरण करते हैं। वहीं, दस से अधिक बाघ जंगल छोड़कर पिछले आठ साल से अमरिया के आबादी क्षेत्र में डेरा जमाए हुए हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका के चलते वन महकमे द्वारा आबादी क्षेत्र से बाघों को हटाने और बाहर के किसी जंगल में शिफ्ट करने के प्रयास शुरू किए गए, मगर अभी तक उन प्रयासों को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। इधर, आबादी क्षेत्र में बाघों की चहलकदमी के बीच ही महीने भर पहले दो तेंदुओं ने ग्रामीण इलाकों में पहुंचकर दहशत फैला दी थी। उनमें एक तेंदुआ तो अब तक 15 से अधिक पालतू कुत्तों को अपना निवाला बना चुका है। इसे लेकर क्षेत्रवासियों में खासा आक्रोश है। एक बार तो ग्रामीणों ने लापरवाही भरे रवैये से गुस्सा होकर वनकर्मियों के खेतों में ही घुसने पर ही पाबंदी लगा दी थी। क्षेत्रवासियों के आक्रोश को भांपकर टाइगर रिजर्व और वन एवं वन्यजीव प्रभाग के अफसरों ने ग्रामीणों के साथ बैठक कर मामला सुलझाऔर तेंदुए को पकड़ने के लिए अभियान चलाने का आश्वासन दिया।
48 दिन में भी कई घटनाओं को अंजाम दे चुका तेंदुआ
अमरिया क्षेत्र में 25 अगस्त से आपरेशन तेंदुआ की शुरुआत की गई। वन एवं वन्यजीव प्रभाग के अफसरों की देखरेख में तेंदुआ प्रभावित इलाके में चार स्थानों पर चार पिंजरे भी लगाए गए। 25 अगस्त से लेकर 17 सितंबर तक की अवधि में तेंदुए ने कई पालतू कुत्तों को अपना निवाला बनाया। उनमें कई विदेशी नस्ल के भी कुत्ते थे। पांच सितंबर को तेंदुए ने गांव तुमडिय़ा के एक घर में घुसकर एक महिला को मारने की कोशिश की। 17 सितंबर को वन अफसरों ने तेंदुए के उत्तराखंड चले जाने की बात कही। इसके बाद 29 सितंबर को तेंदुआ फिर अमरिया के गजरौलाकलां में पहुंच गया।
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अधिकांश मामलों में टाइगर ट्रैकर ही करते हैं सामना
ऑपरेशन तेंदुआ सामाजिक वानिकी एसडीओ हेमंत कुमार सेठ के निर्देशन में चलाने के निर्देश दिए गए थे। उस अभियान में वन एवं वन्यजीव प्रभाग के लगभग सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को लगाया गया था। क्षेत्रवासियों का कहना है कि अधिकांश तौर पर देर शाम या रात में होने वाली घटनाओं की सूचना देने पर टाइगर ट्रैकर चेतन, राजीव, कैलाश ही पहुंचते हैं। फिर अगले दिन वन अधिकारी और अन्य वनकर्मी मौके पर पहुंचकर मौका मुआयना करके मात्र रस्म अदायगी करते हैं। सामाजिक वानिकी की लापरवाही का ही नतीजा है कि 48 दिन बीतने के बाद भी दोनों तेंदुए वन महकमे को चकमा दे गए। चार पिंजरे भी लगाना बेकार गया। अगर यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
‘अमरिया इलाके में तेंदुए की मौजूदगी बनी हुई है। तेंदुए को पकड़ने के प्रयास चल रहे हैं। वन कर्मियों को इसकी जिम्मेदारी दी गई है। कुछ लोग टाइगर ट्रैकर को ही सूचना देते हैं तो वही मौके पर पहुंचते हैं। बाकी अन्य कर्मी भी तेंदुए को पकड़ने में लगे हैं।’
- संजीव कुमार, डीएफओ, वन एवं वन्यजीव प्रभाग
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करीब 73000 हेक्टेयर में फैले टाइगर रिजर्व में वर्तमान में 65 से अधिक बाघ और बड़ी संख्या में हिंसक और अहिंसक वन्यजीव विचरण करते हैं। वहीं, दस से अधिक बाघ जंगल छोड़कर पिछले आठ साल से अमरिया के आबादी क्षेत्र में डेरा जमाए हुए हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका के चलते वन महकमे द्वारा आबादी क्षेत्र से बाघों को हटाने और बाहर के किसी जंगल में शिफ्ट करने के प्रयास शुरू किए गए, मगर अभी तक उन प्रयासों को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। इधर, आबादी क्षेत्र में बाघों की चहलकदमी के बीच ही महीने भर पहले दो तेंदुओं ने ग्रामीण इलाकों में पहुंचकर दहशत फैला दी थी। उनमें एक तेंदुआ तो अब तक 15 से अधिक पालतू कुत्तों को अपना निवाला बना चुका है। इसे लेकर क्षेत्रवासियों में खासा आक्रोश है। एक बार तो ग्रामीणों ने लापरवाही भरे रवैये से गुस्सा होकर वनकर्मियों के खेतों में ही घुसने पर ही पाबंदी लगा दी थी। क्षेत्रवासियों के आक्रोश को भांपकर टाइगर रिजर्व और वन एवं वन्यजीव प्रभाग के अफसरों ने ग्रामीणों के साथ बैठक कर मामला सुलझाऔर तेंदुए को पकड़ने के लिए अभियान चलाने का आश्वासन दिया।
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48 दिन में भी कई घटनाओं को अंजाम दे चुका तेंदुआ
अमरिया क्षेत्र में 25 अगस्त से आपरेशन तेंदुआ की शुरुआत की गई। वन एवं वन्यजीव प्रभाग के अफसरों की देखरेख में तेंदुआ प्रभावित इलाके में चार स्थानों पर चार पिंजरे भी लगाए गए। 25 अगस्त से लेकर 17 सितंबर तक की अवधि में तेंदुए ने कई पालतू कुत्तों को अपना निवाला बनाया। उनमें कई विदेशी नस्ल के भी कुत्ते थे। पांच सितंबर को तेंदुए ने गांव तुमडिय़ा के एक घर में घुसकर एक महिला को मारने की कोशिश की। 17 सितंबर को वन अफसरों ने तेंदुए के उत्तराखंड चले जाने की बात कही। इसके बाद 29 सितंबर को तेंदुआ फिर अमरिया के गजरौलाकलां में पहुंच गया।
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अधिकांश मामलों में टाइगर ट्रैकर ही करते हैं सामना
ऑपरेशन तेंदुआ सामाजिक वानिकी एसडीओ हेमंत कुमार सेठ के निर्देशन में चलाने के निर्देश दिए गए थे। उस अभियान में वन एवं वन्यजीव प्रभाग के लगभग सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को लगाया गया था। क्षेत्रवासियों का कहना है कि अधिकांश तौर पर देर शाम या रात में होने वाली घटनाओं की सूचना देने पर टाइगर ट्रैकर चेतन, राजीव, कैलाश ही पहुंचते हैं। फिर अगले दिन वन अधिकारी और अन्य वनकर्मी मौके पर पहुंचकर मौका मुआयना करके मात्र रस्म अदायगी करते हैं। सामाजिक वानिकी की लापरवाही का ही नतीजा है कि 48 दिन बीतने के बाद भी दोनों तेंदुए वन महकमे को चकमा दे गए। चार पिंजरे भी लगाना बेकार गया। अगर यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
‘अमरिया इलाके में तेंदुए की मौजूदगी बनी हुई है। तेंदुए को पकड़ने के प्रयास चल रहे हैं। वन कर्मियों को इसकी जिम्मेदारी दी गई है। कुछ लोग टाइगर ट्रैकर को ही सूचना देते हैं तो वही मौके पर पहुंचते हैं। बाकी अन्य कर्मी भी तेंदुए को पकड़ने में लगे हैं।’
- संजीव कुमार, डीएफओ, वन एवं वन्यजीव प्रभाग