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सावधानी बरतें, पशुओं को खुरपका मुंहपका रोग से बचाएं
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पीलीभीत। बारिश में खुरपका और मुंह पका रोग पशुओं में तेजी से फैलता है। संक्रामक होने से यह रोग आसानी से एक पशु से दूसरे में पहुंच जाता है। उपचार न मिलने पर इससे पशु की मौत भी हो जाती है। जागरूकता और सावधानियां बरतकर किसान अपने पशुओं को इस बीमारी से बचा सकते हैं।
पशु चिकित्सक बताते हैं कि इस बीमारी को खरेडू, मुंहपका, खुरपका, चपका, खुरपा आदि नाम से जाना जाता हैं। यह बीमारी गाय, भैंस, भेड़, बकरी, ऊंट, सुअर आदि में होती है। इस बीमारी के वाइरस कई प्रकार के होते हैं। यह रोग खासकर ओएसी व एशिया-1 प्रकार के वाइरस से होता है। वातावरण में नमी रहने पर वाइरस चार माह तक जीवित रह सकते हैं। गर्मी ये वाइरस बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं। पशु के रक्त में पहुंचने के बाद ये वाइरस करीब पांच दिनों में बीमारी के लक्षण उत्पन्न करते हैं।
बीमारी के लक्षण
- रोग के विषाणु बीमार पशु की लार, मुंह, खुर व थनों में बड़े फफोलों में पाए जाते हैं। रोगग्रस्त पशु को 104 से 106 डिग्री तक बुखार हो जाता है। पशु खाना पीना बंद कर देता है। मुंह से लार बहने लगती है। पशु के मुंह के अंदर, खुरों के बीच और कभी-कभी थनों पर छाले पड़ जाते हैं, जो बाद में घाव का रूप ले लेते हैं। पशु कमजोर हो जाता है।
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उपचार
- इस रोग का कोई निश्चित उपचार नहीं है, लेकिन संक्रमण रोकने के लिए पशु चिकित्सक की सलाह पर एंटीबायोटिक टीके लगाए जाते हैं। मुंह व खुरों के घावों को फिटकरी या पोटाश के पानी से धोते हैं। मुंह में बोरो गिलसरीन और खुरों में किसी एंटीसेप्टिक लोशन या क्रीम का प्रयोग किया जा सकता है।
जुलाई, अगस्त और सितंबर में मौसम में बदलाव रहता है। इन दिनों में पशुओं में ये बीमारी बढ़ती है। टीकाकरण के साथ ही पशुपालकों को इसके प्रति जागरूक किया जा रहा है। -डॉ. आरपी सिंह, डिप्टी सीवीओ
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पशु चिकित्सक बताते हैं कि इस बीमारी को खरेडू, मुंहपका, खुरपका, चपका, खुरपा आदि नाम से जाना जाता हैं। यह बीमारी गाय, भैंस, भेड़, बकरी, ऊंट, सुअर आदि में होती है। इस बीमारी के वाइरस कई प्रकार के होते हैं। यह रोग खासकर ओएसी व एशिया-1 प्रकार के वाइरस से होता है। वातावरण में नमी रहने पर वाइरस चार माह तक जीवित रह सकते हैं। गर्मी ये वाइरस बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं। पशु के रक्त में पहुंचने के बाद ये वाइरस करीब पांच दिनों में बीमारी के लक्षण उत्पन्न करते हैं।
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बीमारी के लक्षण
- रोग के विषाणु बीमार पशु की लार, मुंह, खुर व थनों में बड़े फफोलों में पाए जाते हैं। रोगग्रस्त पशु को 104 से 106 डिग्री तक बुखार हो जाता है। पशु खाना पीना बंद कर देता है। मुंह से लार बहने लगती है। पशु के मुंह के अंदर, खुरों के बीच और कभी-कभी थनों पर छाले पड़ जाते हैं, जो बाद में घाव का रूप ले लेते हैं। पशु कमजोर हो जाता है।
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उपचार
- इस रोग का कोई निश्चित उपचार नहीं है, लेकिन संक्रमण रोकने के लिए पशु चिकित्सक की सलाह पर एंटीबायोटिक टीके लगाए जाते हैं। मुंह व खुरों के घावों को फिटकरी या पोटाश के पानी से धोते हैं। मुंह में बोरो गिलसरीन और खुरों में किसी एंटीसेप्टिक लोशन या क्रीम का प्रयोग किया जा सकता है।
जुलाई, अगस्त और सितंबर में मौसम में बदलाव रहता है। इन दिनों में पशुओं में ये बीमारी बढ़ती है। टीकाकरण के साथ ही पशुपालकों को इसके प्रति जागरूक किया जा रहा है। -डॉ. आरपी सिंह, डिप्टी सीवीओ