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पर्यावरण का हो रहा ‘चीरहरण’
Pilibhit
Updated Thu, 05 Jun 2014 05:33 AM IST
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पीलीभीत। मार्निंग वॉक पर हवा की ताजगी, पेड़ों की हरियाली पर कलरव करते पक्षियों की मीठी आवाज, नदियों के जल की शुद्धता न जाने कहां गायब हो गई। हमारी लापरवाही के कारण आज प्रदूषित जल, सड़ांध फैलाते कूड़ा करकट के ढेर, अस्पतालों और कारखानों से निकलने वाला कचरा, वाहनों से निकलता जहरीला धुआं, पॉलीथिन का बढ़ता इस्तेमाल और लगातार कम होती हरियाली वातावरण में जहर जो घोल रहे हैं। अगर यूं ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचता रहा तो वह वक्त ज्यादा दूर नहीं है जब सांस लेने के लिए शुद्ध हवा भी न मिलेगी।
ऐसा नहीं कि जिले में पर्यावरण संसाधनों में कोई कमी हो। हां, इतना जरूर है कि इन संसाधनों के रखरखाव में कमी का फायदा हरियाली के दुश्मन उठा रहे हैं। आधुनिकता की दौड़ और मुनाफे की बढ़ती ललक से खेती में भी रसायनों का प्रयोग बढ़ रहा है। जिससे हवा दूषित होने के साथ खाद्यान्न भी जहरीला हो रहा है। नदियां प्रदूषण से भरी पड़ी हैं। मझोला डिस्टलरी बंद होने से तीन साल तक खकरा नदी प्रदूषण से मुक्त रही, लेकिन डिस्टलरी के पुन: चलने से खकरा में प्रदूषण फिर बढ़ गया है। इससे पिछले दिनों बड़ी संख्या में मछलियां भी मर गई थीं। इसके अलावा नदियों व पोखरों से अवैध खनन भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
पर्यावरण के प्रति लापरवाह होने के परिणाम स्वरूप हृदयघात, दमा, एलर्जी, ब्रेन हेमरेज के रोगियों की संख्या बढ़ रही है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर तथाकथित संगठन गोष्ठियों में चर्चाएं करते हैं। बात इससे आगे नहीं बढ़ पाती। यदाकदा पौधरोपड़ अभियान चलते हैं मगर पौधों की देखभाल नहीं हो पाती। जिसकी वजह से सैकड़ों पौधे जवान होने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। पर्यावरण को बचाने के लिए जब तक हर नागरिक स्वयं की जिम्मेदारी नहीं समझेगा तब तक इस पर अंकुश लगना मुश्किल है। आइए विश्व पर्यावरण दिवस पर हम सभी पर्यावरण बचाने का संकल्प लें और वातावरण को स्वच्छ रखें।
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ऐसा नहीं कि जिले में पर्यावरण संसाधनों में कोई कमी हो। हां, इतना जरूर है कि इन संसाधनों के रखरखाव में कमी का फायदा हरियाली के दुश्मन उठा रहे हैं। आधुनिकता की दौड़ और मुनाफे की बढ़ती ललक से खेती में भी रसायनों का प्रयोग बढ़ रहा है। जिससे हवा दूषित होने के साथ खाद्यान्न भी जहरीला हो रहा है। नदियां प्रदूषण से भरी पड़ी हैं। मझोला डिस्टलरी बंद होने से तीन साल तक खकरा नदी प्रदूषण से मुक्त रही, लेकिन डिस्टलरी के पुन: चलने से खकरा में प्रदूषण फिर बढ़ गया है। इससे पिछले दिनों बड़ी संख्या में मछलियां भी मर गई थीं। इसके अलावा नदियों व पोखरों से अवैध खनन भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
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पर्यावरण के प्रति लापरवाह होने के परिणाम स्वरूप हृदयघात, दमा, एलर्जी, ब्रेन हेमरेज के रोगियों की संख्या बढ़ रही है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर तथाकथित संगठन गोष्ठियों में चर्चाएं करते हैं। बात इससे आगे नहीं बढ़ पाती। यदाकदा पौधरोपड़ अभियान चलते हैं मगर पौधों की देखभाल नहीं हो पाती। जिसकी वजह से सैकड़ों पौधे जवान होने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। पर्यावरण को बचाने के लिए जब तक हर नागरिक स्वयं की जिम्मेदारी नहीं समझेगा तब तक इस पर अंकुश लगना मुश्किल है। आइए विश्व पर्यावरण दिवस पर हम सभी पर्यावरण बचाने का संकल्प लें और वातावरण को स्वच्छ रखें।
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