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देल पूजा में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,पीलीभीत
Updated Sat, 14 Apr 2018 08:10 PM IST
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del pooja
तराई के बंगाली बाहुल्य सेल्हा व गभिया सहराई में शनिवार को भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए देल (चंडोक) पूजा का आयोजन किया गया। खजूर के पेड़ पर चढ़कर होने वाली पूजा को देखने के लिए बड़ी तादाद में श्रद्धालु मौजूद रहे।
क्षेत्र के बंगाली बाहुल्य इलाके में हर साल चैत्र मास में देल पूजा का आयोजन किया जाता है। मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति मनौती मांगता है तो उसकी मनौती पूरी होने के बाद उसे ही देल पूजा का सारा खर्च वहन करना होता है। बताते हैं कि देल पूजा से जुड़े लोग पूरे चैत्र माह सन्यासियों जैसा जीवन व्यतीत करते हैं। सात्विक भोजन करने के साथ नंगे पैर ही रहते हैं। इस बार सेल्हा गांव में देल पूजा का आयोजन किया गया। शनिवार को हुई देल पूजा के तहत खजूर के पेड़ के नीचे सन्यासियों के बीच पुरोहित ने विधि विधान से पूजा का शुभारंभ किया। इस बीच गांव के सन्यासी (शिवभक्त) खजूर के पेड़ पर चढ़े। चूंकि खजूर के पेड़ पर चढना ही खासा जोखिम भरा कार्य होता है। इस बीच सन्यासियों ने पेड़ के ऊपरी सिरे पर पहुंचकर चारों ओर परिक्रमा की। परंपरा के अनुसार उन्होंने खजूर के फल को तोड़कर नीचे फेंका। जिसे प्रसाद के रुप में पाने को श्रद्धालुओं की भीड़ दौड़ पड़ी। वहीं पेड़ के चारों ओर जमीन पर बैठे सन्यासियों ने पेड़ पर चढ़े सन्यासियों के सकुशल नीचे उतरने की भगवान शिव से आराधना करते देखे गए। बाद में एक-एक कर सन्यासी पेड़ से उतरे। शनिवार शाम को एक सार्वजनिक स्थान पर पूजा का कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम स्थल पर परपंरानुसार शिवलिंग पर फूल रखा गया। मान्यता है कि जब तक फूल शिवलिंग से नीचे नहीं गिर जाता, पूजा पूरी नहीं मानी जाती। इस बीच श्रद्धालुुओं ने जमीन में लेटकर व परिक्रमा कर पूजा अर्चन की। कुछ समय बाद फूल गिरते ही श्रद्धालु खुशी से झूम उठे। बंगाली बुुजुर्गों के मुताबिक यह पूजा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए की जाती है। श्रद्धालु मनोकामना पूरी होने पर इस पूजा का आयोजन करते हैं। इधर सेल्हा के अलावा गभिया सहराई में भी देल पूजा का आयोजन किया गया। जिसमें बड़ी तादाद में श्रद्धालुओं ने भाग किया।
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क्षेत्र के बंगाली बाहुल्य इलाके में हर साल चैत्र मास में देल पूजा का आयोजन किया जाता है। मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति मनौती मांगता है तो उसकी मनौती पूरी होने के बाद उसे ही देल पूजा का सारा खर्च वहन करना होता है। बताते हैं कि देल पूजा से जुड़े लोग पूरे चैत्र माह सन्यासियों जैसा जीवन व्यतीत करते हैं। सात्विक भोजन करने के साथ नंगे पैर ही रहते हैं। इस बार सेल्हा गांव में देल पूजा का आयोजन किया गया। शनिवार को हुई देल पूजा के तहत खजूर के पेड़ के नीचे सन्यासियों के बीच पुरोहित ने विधि विधान से पूजा का शुभारंभ किया। इस बीच गांव के सन्यासी (शिवभक्त) खजूर के पेड़ पर चढ़े। चूंकि खजूर के पेड़ पर चढना ही खासा जोखिम भरा कार्य होता है। इस बीच सन्यासियों ने पेड़ के ऊपरी सिरे पर पहुंचकर चारों ओर परिक्रमा की। परंपरा के अनुसार उन्होंने खजूर के फल को तोड़कर नीचे फेंका। जिसे प्रसाद के रुप में पाने को श्रद्धालुओं की भीड़ दौड़ पड़ी। वहीं पेड़ के चारों ओर जमीन पर बैठे सन्यासियों ने पेड़ पर चढ़े सन्यासियों के सकुशल नीचे उतरने की भगवान शिव से आराधना करते देखे गए। बाद में एक-एक कर सन्यासी पेड़ से उतरे। शनिवार शाम को एक सार्वजनिक स्थान पर पूजा का कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम स्थल पर परपंरानुसार शिवलिंग पर फूल रखा गया। मान्यता है कि जब तक फूल शिवलिंग से नीचे नहीं गिर जाता, पूजा पूरी नहीं मानी जाती। इस बीच श्रद्धालुुओं ने जमीन में लेटकर व परिक्रमा कर पूजा अर्चन की। कुछ समय बाद फूल गिरते ही श्रद्धालु खुशी से झूम उठे। बंगाली बुुजुर्गों के मुताबिक यह पूजा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए की जाती है। श्रद्धालु मनोकामना पूरी होने पर इस पूजा का आयोजन करते हैं। इधर सेल्हा के अलावा गभिया सहराई में भी देल पूजा का आयोजन किया गया। जिसमें बड़ी तादाद में श्रद्धालुओं ने भाग किया।
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