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बिना टेंडर, एक ही फर्म पर तीन साल से एलपी का ठेका
Updated Fri, 21 Sep 2018 11:53 PM IST
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21पीबीटीपी-8
बिना टेंडर एक ही फर्म पर तीन साल से एलपी का ठेका
जिला अस्पताल में चल रहा खेल, बंदरबांट का अंदेशा
पहले बने रहे अंजान, अब अफसर टेंडर कराने का दे रहे हवाला
अमर उजाला ब्यूरो
पीलीभीत। जिला अस्पताल में मरीजों को दवाएं मुहैया कराने के लिए की जा रही लोकल परचेज (एलपी) में खेल जारी है। अफसरों की साठगांठ के चलते बीते तीन साल से बिना टेंडर एक ही फर्म को इसका ठेका दिया जा रहा है। खास बात ये है कि यह खेल अधिकारियों के संज्ञान मे होने के बाद भी रोका नहीं जा सका है। अब इसको लेकर शोर मचने पर अधिकारी खुद का बचाव करने में जुट गए हैं। जल्द टेंडर प्रक्रिया के जरिये ठेका कराने की बात कही जा रही है। फिलहाल पूरा मामला कही न कही बड़े स्तर पर बंदरबांट की ओर इशारा कर रहा है।
सरकारी अस्पतालों मेें पहुंचने वाले मरीजों को शत प्रतिशत निशुल्क दवा उपलब्ध कराई जा सके, इसके लिए हर सरकारी अस्पताल में लोकल परचेज की व्यवस्था रहती है। इसके तहत उन दवाओं को लोकल स्तर पर खरीद कर मरीज को निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है जोकि अस्पताल के स्टाक में नहीं है। इसके लिए हर साल टेंडर डालकर एक मेडिकल स्टोर को इसका ठेका दिया जाता है। एलपी के दौरान खरीदी जाने वाली दवाएं यहीं से ली जाती हैं जिनका भुगतान स्वास्थ्य विभाग करता है न कि मरीज। हालांकि शासन की इस मंशा पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी लंबे समय से पलीता लगाते चले आ रहे हैं। अधिकांश मरीजों को तो शायद इस व्यवस्था की जानकारी भी नहीं होती। उनको तो बस अस्पताल के कर्मचारियों की ओर से एक पर्ची पर दवा का नाम लिख दिया जाता है जिसको वह बाहर से खरीद कर ले आते है। इधर, बिल लगाकर एलपी के लिए आने वाले बजट का बंदरबांट आसानी से कर लिया जाता है। इस खेल को अधिकारी छिपाने में जुटे रहते हैं। यही वजह है कि न तो कभी यह बताया जाता है कि ठेका किसको दिया गया, न ही कभी एलपी में खर्च रकम और किन मरीजों को इसका लाभ दिया गया, इसकी जानकारी दी जाती है। अधिकारी पूछने पर कोई न कोई बहाना बना टाल जाते हैं। एलपी को लेकर चल रहे खेल में अब एक और बात निकलकर सामने आई है। पिछले तीन साल से ये ठेका एक ही फर्म को दे रखा है। इसके लिए कोई टेंडर भी नहीं किए गए। सिर्फ तीन साल पुराने ठेके को ही रिन्यूवल किया जाता रहा है। स्वास्थ्य महकमे के जिम्मेदारों की मानें तो तीन साल पूर्व टेंडर में किसी अन्य फर्म के भाग नहीं लेने के कारण पहली फर्म से ही दवाओं की आपूर्ति की जा रही है। सीएमओ कार्यालय में तैनात एक लिपिक का कहना है कि ई-टेंडर पर दवा आपूर्ति के लिए टेंडर निकाला जाता है। पहले भी निकाला गया था, लेकिन मात्र एक फर्म के आने से नहीं हो सका और पुरानी फर्म से ही दवाओं की आपूर्ति की जा रही है।
वर्जन
दवा आपूर्ति का ठेका सीएमओ स्तर से होता है। पिछले दिनों जानकारी मिलने पर दवाओं की आपूर्ति नियम के तहत कराने के लिए टेंडर निकाले जाने के संबंध में बात की गई थी। शीघ्र ही टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। - डा. रतनपाल सिंह सुमन, सीएमएस
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बिना टेंडर एक ही फर्म पर तीन साल से एलपी का ठेका
जिला अस्पताल में चल रहा खेल, बंदरबांट का अंदेशा
पहले बने रहे अंजान, अब अफसर टेंडर कराने का दे रहे हवाला
अमर उजाला ब्यूरो
पीलीभीत। जिला अस्पताल में मरीजों को दवाएं मुहैया कराने के लिए की जा रही लोकल परचेज (एलपी) में खेल जारी है। अफसरों की साठगांठ के चलते बीते तीन साल से बिना टेंडर एक ही फर्म को इसका ठेका दिया जा रहा है। खास बात ये है कि यह खेल अधिकारियों के संज्ञान मे होने के बाद भी रोका नहीं जा सका है। अब इसको लेकर शोर मचने पर अधिकारी खुद का बचाव करने में जुट गए हैं। जल्द टेंडर प्रक्रिया के जरिये ठेका कराने की बात कही जा रही है। फिलहाल पूरा मामला कही न कही बड़े स्तर पर बंदरबांट की ओर इशारा कर रहा है।
सरकारी अस्पतालों मेें पहुंचने वाले मरीजों को शत प्रतिशत निशुल्क दवा उपलब्ध कराई जा सके, इसके लिए हर सरकारी अस्पताल में लोकल परचेज की व्यवस्था रहती है। इसके तहत उन दवाओं को लोकल स्तर पर खरीद कर मरीज को निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है जोकि अस्पताल के स्टाक में नहीं है। इसके लिए हर साल टेंडर डालकर एक मेडिकल स्टोर को इसका ठेका दिया जाता है। एलपी के दौरान खरीदी जाने वाली दवाएं यहीं से ली जाती हैं जिनका भुगतान स्वास्थ्य विभाग करता है न कि मरीज। हालांकि शासन की इस मंशा पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी लंबे समय से पलीता लगाते चले आ रहे हैं। अधिकांश मरीजों को तो शायद इस व्यवस्था की जानकारी भी नहीं होती। उनको तो बस अस्पताल के कर्मचारियों की ओर से एक पर्ची पर दवा का नाम लिख दिया जाता है जिसको वह बाहर से खरीद कर ले आते है। इधर, बिल लगाकर एलपी के लिए आने वाले बजट का बंदरबांट आसानी से कर लिया जाता है। इस खेल को अधिकारी छिपाने में जुटे रहते हैं। यही वजह है कि न तो कभी यह बताया जाता है कि ठेका किसको दिया गया, न ही कभी एलपी में खर्च रकम और किन मरीजों को इसका लाभ दिया गया, इसकी जानकारी दी जाती है। अधिकारी पूछने पर कोई न कोई बहाना बना टाल जाते हैं। एलपी को लेकर चल रहे खेल में अब एक और बात निकलकर सामने आई है। पिछले तीन साल से ये ठेका एक ही फर्म को दे रखा है। इसके लिए कोई टेंडर भी नहीं किए गए। सिर्फ तीन साल पुराने ठेके को ही रिन्यूवल किया जाता रहा है। स्वास्थ्य महकमे के जिम्मेदारों की मानें तो तीन साल पूर्व टेंडर में किसी अन्य फर्म के भाग नहीं लेने के कारण पहली फर्म से ही दवाओं की आपूर्ति की जा रही है। सीएमओ कार्यालय में तैनात एक लिपिक का कहना है कि ई-टेंडर पर दवा आपूर्ति के लिए टेंडर निकाला जाता है। पहले भी निकाला गया था, लेकिन मात्र एक फर्म के आने से नहीं हो सका और पुरानी फर्म से ही दवाओं की आपूर्ति की जा रही है।
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दवा आपूर्ति का ठेका सीएमओ स्तर से होता है। पिछले दिनों जानकारी मिलने पर दवाओं की आपूर्ति नियम के तहत कराने के लिए टेंडर निकाले जाने के संबंध में बात की गई थी। शीघ्र ही टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। - डा. रतनपाल सिंह सुमन, सीएमएस
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