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कमन ग्रास खेती कर दूसरों के लिए नजीर बने संजय
Updated Sun, 10 Jun 2018 12:04 AM IST
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खास खबर:
लैमन ग्रास खेती कर दूसरों को नजीर बने संजय
क्रासर....
जंगल किनारे मुफीद साबित हो रही खेती
एकड़ में 70 से 80 हजार रुपये तक होती है आदमनी
09 पीबीटीपी 14
मुनिराज सिंह
पीलीभीत। गेहूं, धान और गन्ना का उचित मूल्य न मिलने और जंगल से सटे क्षेत्र में वन्यजीवों के बढ़ते हमलों को देखते हुए पूरनपुर के ढक्का चांट निवासी संजय सिंह ने लैमनग्रास की खेती शुरू की है। खुद इसकी खेती करने के साथ वह दूसरों को भी प्रेरित कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस घास को कोई पशु नहीं खाता, जिससे वन्यजीवों के पीछे खेतों तक बाघ की पहुंचने की आशंका भी खत्म हो जाती है।
मूल रूप से पूरनपुर के निवासी संजय सिंह प्रगति शील किसान हैं। हमेशा कुछ हटकर करने को प्रयासरत रहते हैं। करीब आठ साल पूर्व लखनऊ में सीमैप (सेंट्रल इंस्टीटयूट ऑफ मेडिसन एवं एंड एरोमेटिक प्लांट) के एक कार्यक्रम में सुगंधित एवं औषधीय खेती की मिली। इसके बाद उन्होंने स्वयं इस खेती को करने का संकल्प लिया। प्रारंभ में उन्होंने अपने ढक्का चांट स्थित अपने फार्म पर छोटे स्तर पर लैमनग्रास के कुछ पौधे लगाकर प्रयोग शुरू किया, लेकिन बेहतर परिणाम को देखते हुए उन्होंने वृहद स्तर पर खेती करने लगे। आज वह खुद 10 एकड़ में लैमनग्राम उगा रहे हैं। साथ ही उनसे प्रेरणा लेकर गांव के सुपद कुमार, रघुनाथ, सौरभ, नवीन, शांतिदेवी सहित करीब एक दर्जन किसान भी लैमनग्रास उगा रहे हैं। गांव में लगभग 20 एकड़ में खेती हो रही है।
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एक एकड़ में आती है 50 हजार की लागत
संजय सिंह ने बताया कि लैमनग्रास उगाने के लिए इसकी गांठें लगाई जाती हैं, जो पहले से उगाई जा रही घास से निकली जा सकती हैं। सीमैप अथवा अन्य संस्थाओं से खरीदने पर यह दो रुपये प्रति गांठ मिलती है। एक एकड़ में 20 हजार स्लिप्सण(गांठ) लगती हैं। इसकी लगवाई, सिंचाई एवं गुड़ाई मिलाकर लगभग 50 हजार रुपये तक खर्च आता है। जुलाई में पौध लगाने के बाद पहली कटिंग अक्तूबर, दूसरी मार्च और तीसरी जून में होती है। तीनों कटिंग में कुल मिलाकर 7-8 तेल निकलता है जो बाजार में एक हजार रुपये प्रति किलो बिकता है। पहले साल लागत निकल जाती है। बाकी छह साल तक इसी पौध की कटिंग कर तेल निकलता रहा है। इसके अलावा पौधों से स्लिप्स (गांठें) निकालकर भी बेची जा सकती हैं।
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बिक्री में नहीं होती दिक्कत, खुद लगाया प्लांट
किसी नए उत्पाद अथवा खेती में सबसे बड़ी समस्या उसकी बिक्री में आती है। इसके लिए संजय सिंह ने देशभर की कई कंपनियों से संपर्क कर रखा है। उन्होंने अपने फार्म पर तेल निकालने का प्लांट लगा रखा है। साथ ही क्षेत्र के किसानों का तेल खरीदने के लिए खुद की कंपनी भी रजिस्टर्ड करा ली है। यदि किसान चाहे तो वह मौके पर तेल खरीद भी लेते हैं।
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जंगल किनारे मुफीद है लैमनग्राम की खेती
पीलीभीत जनपद में खेती का बड़ा भाग टाइगर रिजर्व से सटे क्षेत्र में है, जिसमें आए दिन बाघ एवं वन्यजीवों के हमले की घटनाएं हो रही हैं। इससे बचने के लिए तार फेसिंग का चलन बढ़ा है, जो अधिक कारगर साबित नहीं हो रहा है। कृषि वैज्ञानिक, वनविभाग एवं जनप्रतिनिधि किसानों से बार बार परंपरागत खेती को छोड़ औषधीय एवं सुगंधित पौधे की खेती की अपील कर रहे हैं। ऐसे में लैमनग्रास की खेती काफी मुफीद साबित हो सकती है। लैमनग्रास को न तो कोई जीव खाता है और न ही इससे कोई अन्य नुकसान है।
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जिले में लैमनग्रास की खेती एवं उसके उत्पाद की व्यवस्था एक अच्छी पहल है। इससे किसानों को गन्ना, गेहूं, धान की लगातार फसल लेने से होने वाले नुकसान से बचाव होगा और आमदनी भी अच्छी होगी।
डॉ. एसएस ढाका, कृषि वैज्ञानिक, केवीके
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खास खबर:
लैमन ग्रास खेती कर दूसरों को नजीर बने संजय
क्रासर....
जंगल किनारे मुफीद साबित हो रही खेती
एकड़ में 70 से 80 हजार रुपये तक होती है आदमनी
09 पीबीटीपी 14
मुनिराज सिंह
पीलीभीत। गेहूं, धान और गन्ना का उचित मूल्य न मिलने और जंगल से सटे क्षेत्र में वन्यजीवों के बढ़ते हमलों को देखते हुए पूरनपुर के ढक्का चांट निवासी संजय सिंह ने लैमनग्रास की खेती शुरू की है। खुद इसकी खेती करने के साथ वह दूसरों को भी प्रेरित कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस घास को कोई पशु नहीं खाता, जिससे वन्यजीवों के पीछे खेतों तक बाघ की पहुंचने की आशंका भी खत्म हो जाती है।
मूल रूप से पूरनपुर के निवासी संजय सिंह प्रगति शील किसान हैं। हमेशा कुछ हटकर करने को प्रयासरत रहते हैं। करीब आठ साल पूर्व लखनऊ में सीमैप (सेंट्रल इंस्टीटयूट ऑफ मेडिसन एवं एंड एरोमेटिक प्लांट) के एक कार्यक्रम में सुगंधित एवं औषधीय खेती की मिली। इसके बाद उन्होंने स्वयं इस खेती को करने का संकल्प लिया। प्रारंभ में उन्होंने अपने ढक्का चांट स्थित अपने फार्म पर छोटे स्तर पर लैमनग्रास के कुछ पौधे लगाकर प्रयोग शुरू किया, लेकिन बेहतर परिणाम को देखते हुए उन्होंने वृहद स्तर पर खेती करने लगे। आज वह खुद 10 एकड़ में लैमनग्राम उगा रहे हैं। साथ ही उनसे प्रेरणा लेकर गांव के सुपद कुमार, रघुनाथ, सौरभ, नवीन, शांतिदेवी सहित करीब एक दर्जन किसान भी लैमनग्रास उगा रहे हैं। गांव में लगभग 20 एकड़ में खेती हो रही है।
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एक एकड़ में आती है 50 हजार की लागत
संजय सिंह ने बताया कि लैमनग्रास उगाने के लिए इसकी गांठें लगाई जाती हैं, जो पहले से उगाई जा रही घास से निकली जा सकती हैं। सीमैप अथवा अन्य संस्थाओं से खरीदने पर यह दो रुपये प्रति गांठ मिलती है। एक एकड़ में 20 हजार स्लिप्सण(गांठ) लगती हैं। इसकी लगवाई, सिंचाई एवं गुड़ाई मिलाकर लगभग 50 हजार रुपये तक खर्च आता है। जुलाई में पौध लगाने के बाद पहली कटिंग अक्तूबर, दूसरी मार्च और तीसरी जून में होती है। तीनों कटिंग में कुल मिलाकर 7-8 तेल निकलता है जो बाजार में एक हजार रुपये प्रति किलो बिकता है। पहले साल लागत निकल जाती है। बाकी छह साल तक इसी पौध की कटिंग कर तेल निकलता रहा है। इसके अलावा पौधों से स्लिप्स (गांठें) निकालकर भी बेची जा सकती हैं।
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बिक्री में नहीं होती दिक्कत, खुद लगाया प्लांट
किसी नए उत्पाद अथवा खेती में सबसे बड़ी समस्या उसकी बिक्री में आती है। इसके लिए संजय सिंह ने देशभर की कई कंपनियों से संपर्क कर रखा है। उन्होंने अपने फार्म पर तेल निकालने का प्लांट लगा रखा है। साथ ही क्षेत्र के किसानों का तेल खरीदने के लिए खुद की कंपनी भी रजिस्टर्ड करा ली है। यदि किसान चाहे तो वह मौके पर तेल खरीद भी लेते हैं।
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जंगल किनारे मुफीद है लैमनग्राम की खेती
पीलीभीत जनपद में खेती का बड़ा भाग टाइगर रिजर्व से सटे क्षेत्र में है, जिसमें आए दिन बाघ एवं वन्यजीवों के हमले की घटनाएं हो रही हैं। इससे बचने के लिए तार फेसिंग का चलन बढ़ा है, जो अधिक कारगर साबित नहीं हो रहा है। कृषि वैज्ञानिक, वनविभाग एवं जनप्रतिनिधि किसानों से बार बार परंपरागत खेती को छोड़ औषधीय एवं सुगंधित पौधे की खेती की अपील कर रहे हैं। ऐसे में लैमनग्रास की खेती काफी मुफीद साबित हो सकती है। लैमनग्रास को न तो कोई जीव खाता है और न ही इससे कोई अन्य नुकसान है।
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जिले में लैमनग्रास की खेती एवं उसके उत्पाद की व्यवस्था एक अच्छी पहल है। इससे किसानों को गन्ना, गेहूं, धान की लगातार फसल लेने से होने वाले नुकसान से बचाव होगा और आमदनी भी अच्छी होगी।
डॉ. एसएस ढाका, कृषि वैज्ञानिक, केवीके