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ऐतिहासिक कोतवाली दरवाजा भी जमींदोज होने के कगार पर
Updated Wed, 01 Aug 2018 12:40 AM IST
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ऐतिहासिक कोतवाली दरवाजा भी जमींदोज होने के कगार पर
क्रासर....
पालिका ने ध्वस्त करने की मांगी अनुमति
बिखर रहा है पीलीभीत का अतीत, नष्ट होती जा रहीं ऐतिहासिक धरोहरें
अमर उजाला ब्यूरो
पीलीभीत। कभी पीलीभीत की सभ्यता का प्रतीक बनीं ऐतिहासिक धरोहरें उपेक्षा का दंश झेली रही हैं। इनमें अधिकांश तो जमींदोज हो चुकी हैं, वहीं कुछ जमींदोज होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। खास बात यह है कि इन धरोहरों की दुर्दशा जिले की नुमाइंदगी करने वाले जनप्रतिनिधियों की नजरों में नहीं चढ़ी। आलम यह है कि शहर के चार ऐतिहासिक दरवाजों में मात्र एक बचे कोतवाली दरवाजे की जर्जर हालत को देखते हुए संभावित हादसे की आशंका के चलते पालिका प्रशासन ने इसे ध्वस्त करने की अनुमति मांगी है।
यह हैं शहर की विरासतें
पेरियावंश ने संवत 1659 में पीलीभीत का विस्तार किया था। उसके बाद यहां तमाम राजा महाराजाओं ने राजपाट संभाला। राजपाट के दौरान कई इमारतों का निर्माण कराया, जो पीलीभीत की शान के रूप में जानी जाती हैं। इनमें जामा मस्जिद, बरेली दरवाजा समेत चार भव्य दरवाजे शामिल हैं। ब्रितानिया हुकूमत के दौरान बनवाया गया घंटाघर भी यहां की शान है। बुजुर्गों के मुताबिक यह घंटाघर कभी पूरे शहर को अल सुबह उठाया करता था। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चौधरी चरण सिंह, नारायण दत्त तिवारी, मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित डॉ संदीप पांडेय की सभाओं का गवाह बन चुका रामस्वरुप पार्क भी यहां की ऐतिहासिक धरोहरों में एक है।
00 वर्तमान में इन धरोहरों का यह है हाल
जिले की शान कहीं जाने वाली धरोहरों की काया आज न सिर्फ जर्जर हो चुकी है बल्कि इनमें कई जमींदोज होकर अपना अस्तित्व खो चुकी हैं। ऐतिहासिक चार दरवाजे कभी पीलीभीत को एक सूत्र में बांधे नजर आते थे लेकिन आज की तारीख में यह खंडहर के सिवा और कुछ नहीं। बरेली दरवाजा 19 सितंबर 1999 को जमींदोज हो गया। तहसील दरवाजा करीब साढ़े तीन दशक पहले भरभरा कर ढह चुका है। स्टेशन रोड दरवाजा भी अनदेखी के चलते अपनी काया को लंबे समय तक सहेज कर नहीं रख सका और ढेर हो गया। देश की राजनीति में अग्रिम पंक्ति के नेताओं के सभास्थल का गवाह बना रामस्वरुप पार्क आज सिर्फ जुआरियों का अड्डा बनकर रह गया है। इस ऐतिहासिक पार्क को इन दिनों लोग कूड़ाघर के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
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इकलौते दरवाजे को भी ध्वस्त करने की मांगी अनुमति
ऐतिहासिक चार दरवाजों में इकलौता बचा कोतवाली दरवाजा भी बेहद जर्जर हो चुका है। पालिका प्रशासन के मुताबिक यह दरवाजा भी कभी गिर सकता है। लिहाजा पालिका प्रशासन ने इस दरवाजे को ध्वस्त करने की अनुमति जिला प्रशासन से मांगी है।
00
महज घूमकर रह गई घंटाघर की सुईयां
गत बोर्ड के कार्यकाल के दौरान पूर्व चेयरमैन प्रभात जायसवाल ने वर्षों से ठप पड़े ऐतिहासिक घंटाघर को काफी प्रयासों के बाद दुरुस्त तो करा दिया लेकिन कुछ दिन में ही इसकी रफ्तार धीमी होती गई। तकनीकी कमी के चलते यह घंटाघर चल तो रहा है, लेकिन समय सही नहीं बता रहा है।
00
धरोहरों की दुर्दशा को हर कोई जिम्मेदार
31 पीबीटीपी 14
धरोहरों की दुर्दशा के जिम्मेदार जितने यहां के नेता हैं उतनी की कसूरवार यहां की जनता है। इन धरोहरों की रक्षा करना हम सभी का कर्तव्य बनता है। दुख होता है जब दुकान खोलने से पहले इन दरवाजों की जीर्णशीर्ण दशा देखता हूं। - महमूद बख्श शम्सी
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घंटाघर की आवाज से उठता था शहर
31 पीबीटीपी 15
पहले घंटाघर की आवाज पर शहर सोकर उठता था। इसके नीचे बनी चाय की दुकानों पर सभी संप्रदाय के लोग एक साथ लोग बैठकर चर्चा करते थे, लेकिन आज सब कुछ बदल चुका है। इन पुरानी इमारतों को सहेजकर रखा जाना चाहिए। - हीरा सिंह
00
वर्जन:
शहर की ऐतिहिासिक धरोहरों को सहेजकर रखने की जिम्मेदारी पर्यटन विभाग की है। पूर्व बोर्ड के कार्यकाल के दौरान कुछ इमारतों को संभालकर रखने के प्रयास भी किए गए। कोतवाली दरवाजा भी गिरताऊ हालत में है। अनहोनी की आशंका के चलते जिला प्रशासन से इसे ध्वस्त करने की अनुमति मांगी गई है। - विमला जायसवाल, अध्यक्ष नगर पालिका परिषद
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ऐतिहासिक कोतवाली दरवाजा भी जमींदोज होने के कगार पर
क्रासर....
पालिका ने ध्वस्त करने की मांगी अनुमति
बिखर रहा है पीलीभीत का अतीत, नष्ट होती जा रहीं ऐतिहासिक धरोहरें
अमर उजाला ब्यूरो
पीलीभीत। कभी पीलीभीत की सभ्यता का प्रतीक बनीं ऐतिहासिक धरोहरें उपेक्षा का दंश झेली रही हैं। इनमें अधिकांश तो जमींदोज हो चुकी हैं, वहीं कुछ जमींदोज होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। खास बात यह है कि इन धरोहरों की दुर्दशा जिले की नुमाइंदगी करने वाले जनप्रतिनिधियों की नजरों में नहीं चढ़ी। आलम यह है कि शहर के चार ऐतिहासिक दरवाजों में मात्र एक बचे कोतवाली दरवाजे की जर्जर हालत को देखते हुए संभावित हादसे की आशंका के चलते पालिका प्रशासन ने इसे ध्वस्त करने की अनुमति मांगी है।
यह हैं शहर की विरासतें
पेरियावंश ने संवत 1659 में पीलीभीत का विस्तार किया था। उसके बाद यहां तमाम राजा महाराजाओं ने राजपाट संभाला। राजपाट के दौरान कई इमारतों का निर्माण कराया, जो पीलीभीत की शान के रूप में जानी जाती हैं। इनमें जामा मस्जिद, बरेली दरवाजा समेत चार भव्य दरवाजे शामिल हैं। ब्रितानिया हुकूमत के दौरान बनवाया गया घंटाघर भी यहां की शान है। बुजुर्गों के मुताबिक यह घंटाघर कभी पूरे शहर को अल सुबह उठाया करता था। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चौधरी चरण सिंह, नारायण दत्त तिवारी, मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित डॉ संदीप पांडेय की सभाओं का गवाह बन चुका रामस्वरुप पार्क भी यहां की ऐतिहासिक धरोहरों में एक है।
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00 वर्तमान में इन धरोहरों का यह है हाल
जिले की शान कहीं जाने वाली धरोहरों की काया आज न सिर्फ जर्जर हो चुकी है बल्कि इनमें कई जमींदोज होकर अपना अस्तित्व खो चुकी हैं। ऐतिहासिक चार दरवाजे कभी पीलीभीत को एक सूत्र में बांधे नजर आते थे लेकिन आज की तारीख में यह खंडहर के सिवा और कुछ नहीं। बरेली दरवाजा 19 सितंबर 1999 को जमींदोज हो गया। तहसील दरवाजा करीब साढ़े तीन दशक पहले भरभरा कर ढह चुका है। स्टेशन रोड दरवाजा भी अनदेखी के चलते अपनी काया को लंबे समय तक सहेज कर नहीं रख सका और ढेर हो गया। देश की राजनीति में अग्रिम पंक्ति के नेताओं के सभास्थल का गवाह बना रामस्वरुप पार्क आज सिर्फ जुआरियों का अड्डा बनकर रह गया है। इस ऐतिहासिक पार्क को इन दिनों लोग कूड़ाघर के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
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इकलौते दरवाजे को भी ध्वस्त करने की मांगी अनुमति
ऐतिहासिक चार दरवाजों में इकलौता बचा कोतवाली दरवाजा भी बेहद जर्जर हो चुका है। पालिका प्रशासन के मुताबिक यह दरवाजा भी कभी गिर सकता है। लिहाजा पालिका प्रशासन ने इस दरवाजे को ध्वस्त करने की अनुमति जिला प्रशासन से मांगी है।
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महज घूमकर रह गई घंटाघर की सुईयां
गत बोर्ड के कार्यकाल के दौरान पूर्व चेयरमैन प्रभात जायसवाल ने वर्षों से ठप पड़े ऐतिहासिक घंटाघर को काफी प्रयासों के बाद दुरुस्त तो करा दिया लेकिन कुछ दिन में ही इसकी रफ्तार धीमी होती गई। तकनीकी कमी के चलते यह घंटाघर चल तो रहा है, लेकिन समय सही नहीं बता रहा है।
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धरोहरों की दुर्दशा को हर कोई जिम्मेदार
31 पीबीटीपी 14
धरोहरों की दुर्दशा के जिम्मेदार जितने यहां के नेता हैं उतनी की कसूरवार यहां की जनता है। इन धरोहरों की रक्षा करना हम सभी का कर्तव्य बनता है। दुख होता है जब दुकान खोलने से पहले इन दरवाजों की जीर्णशीर्ण दशा देखता हूं। - महमूद बख्श शम्सी
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घंटाघर की आवाज से उठता था शहर
31 पीबीटीपी 15
पहले घंटाघर की आवाज पर शहर सोकर उठता था। इसके नीचे बनी चाय की दुकानों पर सभी संप्रदाय के लोग एक साथ लोग बैठकर चर्चा करते थे, लेकिन आज सब कुछ बदल चुका है। इन पुरानी इमारतों को सहेजकर रखा जाना चाहिए। - हीरा सिंह
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वर्जन:
शहर की ऐतिहिासिक धरोहरों को सहेजकर रखने की जिम्मेदारी पर्यटन विभाग की है। पूर्व बोर्ड के कार्यकाल के दौरान कुछ इमारतों को संभालकर रखने के प्रयास भी किए गए। कोतवाली दरवाजा भी गिरताऊ हालत में है। अनहोनी की आशंका के चलते जिला प्रशासन से इसे ध्वस्त करने की अनुमति मांगी गई है। - विमला जायसवाल, अध्यक्ष नगर पालिका परिषद
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