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सपा-रालोद की चतुराई से खुला खाता
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सपा-रालोद की चतुराई से खुला खाता
मुजफ्फरनगर। जिले में ब्लाक प्रमुखी के चुनाव में सपा और रालोद का एक साथ आ जाना बुढ़ाना में खाता खुलवा गया। सपा जिलाध्यक्ष प्रमोद त्यागी ने रालोद से समझौता किया था कि जानसठ में वह रालोद प्रत्याशी को समर्थन कर रहे हैं, बुढ़ाना में रालोद सपा प्रत्याशी का समर्थन करेगी। यही नीति जीत का आधार बनी। जानसठ में तो रालोद के मेजर सिंह संघर्षपूर्ण मुकाबले में हार गए, लेकिन बुढ़ाना में सपा की पाल्लो देवी जीत गईं।
भाजपा के खिलाफ सपा और रालोद की जुगलबंदी बुढ़ाना में जीत का आधार बनी। बुढ़ाना में अजीत सिंह बबलू के अचानक सपा छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद सपा ने पाल्लो देवी को प्रत्याशी घोषित किया था। सपा जिलाध्यक्ष ने पाल्लो की जीत निश्चित करने के लिए रालोद से समझौता किया था कि वह बुढ़ाना में समर्थन दे तो जानसठ में सपा प्रत्याशी चुनाव नहीं लड़ेगा। यह समझौता हुआ और दोनो ब्लाकों में संघर्षपूर्ण मुकाबला हुआ। जानसठ में रालोद के मेजर सिंह मात्र पांच मतों से हार गए। बुढ़ाना में पाल्लो देवी 11 मतों से जीत गईं। बुढ़ाना ब्लाक में जीत में रालोद के पूर्व विधायक राजपाल और प्रमोद त्यागी के भाई सुबोध त्यागी ने अहम भूमिका निभाई। यहां विपक्ष की एकजुटता के चलते प्रशासन भी ऐसा कुछ नहीं कर सका, जिससे सपा को नुकसान पहुंचता। पुरकाजी में चुनावी घमासान होने का सबसे बड़ा कारण भाजपा का दो खेमों में बंटा होना रहा। भाजपा संगठन के कई नेता अंत तक विपक्ष के प्रत्याशी को सपोर्ट करते रहे। यही कारण रहा कि यहां भाजपा को जीत के लिए संघर्ष करना पड़ा।
दो परिवारों का वर्चस्व नहीं तोड़ पाई भाजपा
मुजफ्फरनगर। जिले में ब्लाक प्रमुखी की राजनीति में दो परिवार तीन दशक से काबिज हैं। भाजपा भी इनका कब्जा नहीं तोड़ पाई। मोरना से विजयी अनिल राठी का परिवार यहां 25 साल से काबिज है। इस बार वह भाजपा से चुनाव लड़ गए और अपनी कुर्सी को बरकरार रखा। इसी तरह तीन दशक से खतौली में पूर्व प्रमुख धर्मवीर के परिवार का कब्जा है। भाजपा यहां चाहकर पर उनका कब्जा नहीं हटा पाई। भाजपा ने यहां प्रत्याशी घोषित नहीं किया था। इसी परिवार की संजो गुर्जर लगातार दूूसरी बार चुनाव जीत गई। जिले में ये दोनों परिवार ऐसे हैं, जिनका ब्लाक प्रमुखी पर निरंतर कब्जा बना है।
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मुजफ्फरनगर। जिले में ब्लाक प्रमुखी के चुनाव में सपा और रालोद का एक साथ आ जाना बुढ़ाना में खाता खुलवा गया। सपा जिलाध्यक्ष प्रमोद त्यागी ने रालोद से समझौता किया था कि जानसठ में वह रालोद प्रत्याशी को समर्थन कर रहे हैं, बुढ़ाना में रालोद सपा प्रत्याशी का समर्थन करेगी। यही नीति जीत का आधार बनी। जानसठ में तो रालोद के मेजर सिंह संघर्षपूर्ण मुकाबले में हार गए, लेकिन बुढ़ाना में सपा की पाल्लो देवी जीत गईं।
भाजपा के खिलाफ सपा और रालोद की जुगलबंदी बुढ़ाना में जीत का आधार बनी। बुढ़ाना में अजीत सिंह बबलू के अचानक सपा छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद सपा ने पाल्लो देवी को प्रत्याशी घोषित किया था। सपा जिलाध्यक्ष ने पाल्लो की जीत निश्चित करने के लिए रालोद से समझौता किया था कि वह बुढ़ाना में समर्थन दे तो जानसठ में सपा प्रत्याशी चुनाव नहीं लड़ेगा। यह समझौता हुआ और दोनो ब्लाकों में संघर्षपूर्ण मुकाबला हुआ। जानसठ में रालोद के मेजर सिंह मात्र पांच मतों से हार गए। बुढ़ाना में पाल्लो देवी 11 मतों से जीत गईं। बुढ़ाना ब्लाक में जीत में रालोद के पूर्व विधायक राजपाल और प्रमोद त्यागी के भाई सुबोध त्यागी ने अहम भूमिका निभाई। यहां विपक्ष की एकजुटता के चलते प्रशासन भी ऐसा कुछ नहीं कर सका, जिससे सपा को नुकसान पहुंचता। पुरकाजी में चुनावी घमासान होने का सबसे बड़ा कारण भाजपा का दो खेमों में बंटा होना रहा। भाजपा संगठन के कई नेता अंत तक विपक्ष के प्रत्याशी को सपोर्ट करते रहे। यही कारण रहा कि यहां भाजपा को जीत के लिए संघर्ष करना पड़ा।
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दो परिवारों का वर्चस्व नहीं तोड़ पाई भाजपा
मुजफ्फरनगर। जिले में ब्लाक प्रमुखी की राजनीति में दो परिवार तीन दशक से काबिज हैं। भाजपा भी इनका कब्जा नहीं तोड़ पाई। मोरना से विजयी अनिल राठी का परिवार यहां 25 साल से काबिज है। इस बार वह भाजपा से चुनाव लड़ गए और अपनी कुर्सी को बरकरार रखा। इसी तरह तीन दशक से खतौली में पूर्व प्रमुख धर्मवीर के परिवार का कब्जा है। भाजपा यहां चाहकर पर उनका कब्जा नहीं हटा पाई। भाजपा ने यहां प्रत्याशी घोषित नहीं किया था। इसी परिवार की संजो गुर्जर लगातार दूूसरी बार चुनाव जीत गई। जिले में ये दोनों परिवार ऐसे हैं, जिनका ब्लाक प्रमुखी पर निरंतर कब्जा बना है।
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