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तकरार ने फेर दिया ‘नेताजी’ का मन
मुजफ्फरनगर/ ब्यूरो/ अमर उजाला
Updated Sun, 01 Nov 2015 12:52 AM IST
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मुजफ्फरनगर। नए मंत्रिमंडल में सियासी दिग्गजों की किस्मत नहीं खुल पाई। एमएलसी वीरेंद्र सिंह और कैराना विधायक नाहिद हसन की पंचायत चुनाव में हुई तकरार ने नेताजी का मन फेर दिया।
अखिलेश सरकार में मुजफ्फरनगर और शामली से किसी को लालबत्ती नहीं दिए जाने से सियासी हलकों में इसकी वजह तलाशी जा रही हैं। मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री स्व. चितरंजन स्वरूप की जगह कोई नहीं ले पाया।
पंचायत चुनावों में शामली जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर एमएलसी वीरेंद्र सिंह और विधायक नाहिद हसन में ठन गई। वीरेंद्र के बेटे मनीष चौहान मौजूदा जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। जिस वार्ड 14 से मनीष प्रत्याशी हैं, उसी से नाहिद हसन ने बहन इकरा को चुनाव मैदान में उतार दिया।
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तल्खी इतनी बढ़ती गई कि दोनों में से किसी ने भी परचा वापस नहीं लिया। सपा के दूसरे नेता भी पसोपेश में रहे कि आखिर कैसे विवाद को टाला जाए। कैराना उपचुनाव में सपा को मिली जीत में नाहिद को पूर्व कैबिनेट मंत्री वीरेंद्र का पूरा सहयोग मिला था।
दूसरी सियासी पार्टियों के दिग्गजों ने भी सपा में बिगड़ते समीकरण को अंदरूनी तौर पर हवा देने का खेल खेल दिया। पूरा मामला सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के दरबार तक पहुंच गया। दोनों ही फरीकों ने अपनी सफाई तो दी, लेकिन चुनाव मैदान में डटे रहे।
कांधला देहात में एक ही मतदान केंद्र पर नाहिद और वीरेंद्र समर्थकों में टकराव हो गया। पार्टी सूत्रों की मानें तो नेताजी के मन में स्थानीय स्तर पर सपा राजनीति में हावी मनमर्जी के रवैये से कड़वाहट पैदा हो गई।
मंत्रिमंडल विस्तार में वेस्ट से गुर्जर समाज से वीरेंद्र को लिए जाने की संभावनाएं जगी थीं। जैसे ही यह भनक नाहिद खेमे को लगी तो वह भी मंत्रिमंडल में दावेदारी पर अड़ गए।
सपा सुप्रीमो और शिवपाल सिंह यादव ने हर पैरवी को दरकिनार करते हुए दोनों जिलों में कोई लालबत्ती नहीं देने का फैसला कर लिया। इस खींचतान में सहारनपुर के एमएलसी साहब सिंह सैनी को कैबिनेट मंत्री का तोहफा मिल गया। सैनी का ओबीसी होना भी काम आया।
वर्ष 2017 के चुनाव में नेताजी मुसलिम और ओबीसी जातियों पर फोकस किए हुए हैं। बुढ़ाना से सपा विधायक एवं पूर्व सांसद अमीर आलम के बेटे नवाजिश आलम ने खुद ही लखनऊ से किनारा किए रखा।
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अखिलेश सरकार में मुजफ्फरनगर और शामली से किसी को लालबत्ती नहीं दिए जाने से सियासी हलकों में इसकी वजह तलाशी जा रही हैं। मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री स्व. चितरंजन स्वरूप की जगह कोई नहीं ले पाया।
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पंचायत चुनावों में शामली जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर एमएलसी वीरेंद्र सिंह और विधायक नाहिद हसन में ठन गई। वीरेंद्र के बेटे मनीष चौहान मौजूदा जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। जिस वार्ड 14 से मनीष प्रत्याशी हैं, उसी से नाहिद हसन ने बहन इकरा को चुनाव मैदान में उतार दिया।
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तल्खी इतनी बढ़ती गई कि दोनों में से किसी ने भी परचा वापस नहीं लिया। सपा के दूसरे नेता भी पसोपेश में रहे कि आखिर कैसे विवाद को टाला जाए। कैराना उपचुनाव में सपा को मिली जीत में नाहिद को पूर्व कैबिनेट मंत्री वीरेंद्र का पूरा सहयोग मिला था।
दूसरी सियासी पार्टियों के दिग्गजों ने भी सपा में बिगड़ते समीकरण को अंदरूनी तौर पर हवा देने का खेल खेल दिया। पूरा मामला सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के दरबार तक पहुंच गया। दोनों ही फरीकों ने अपनी सफाई तो दी, लेकिन चुनाव मैदान में डटे रहे।
कांधला देहात में एक ही मतदान केंद्र पर नाहिद और वीरेंद्र समर्थकों में टकराव हो गया। पार्टी सूत्रों की मानें तो नेताजी के मन में स्थानीय स्तर पर सपा राजनीति में हावी मनमर्जी के रवैये से कड़वाहट पैदा हो गई।
मंत्रिमंडल विस्तार में वेस्ट से गुर्जर समाज से वीरेंद्र को लिए जाने की संभावनाएं जगी थीं। जैसे ही यह भनक नाहिद खेमे को लगी तो वह भी मंत्रिमंडल में दावेदारी पर अड़ गए।
सपा सुप्रीमो और शिवपाल सिंह यादव ने हर पैरवी को दरकिनार करते हुए दोनों जिलों में कोई लालबत्ती नहीं देने का फैसला कर लिया। इस खींचतान में सहारनपुर के एमएलसी साहब सिंह सैनी को कैबिनेट मंत्री का तोहफा मिल गया। सैनी का ओबीसी होना भी काम आया।
वर्ष 2017 के चुनाव में नेताजी मुसलिम और ओबीसी जातियों पर फोकस किए हुए हैं। बुढ़ाना से सपा विधायक एवं पूर्व सांसद अमीर आलम के बेटे नवाजिश आलम ने खुद ही लखनऊ से किनारा किए रखा।