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चबूतरों, चौपालों और घरों की शान था रेडियो

Mon, 14 Feb 2022 12:27 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Mon, 14 Feb 2022 12:27 AM IST
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Radio was the pride of platforms, chapels and houses
विश्व रेडियो दिवस पर रेडियो पर कार्यक्रम सुनता दुकानदार। - फोटो : MUZAFFARNAGAR
मुजफ्फरनगर। दौर बदल गया। टीवी से लेकर मोबाइल और इंटरनेट की क्रांति हुई। सूचनाओं के आदान-प्रदान के भले ही कितने भी माध्यम मिल गए हों, लेकिन रेडियो का जमाना कभी नहीं भूलता। चबूतरों पर लगने वाली चौपाल और रेडियो के कार्यक्रमों का इंतजार। पुराने लोगों को याद है कि सिंबल स्टेटस भी बना। जिनके घर रेडियो होते, वहां समाचारों और लोक संगीत के समय महफिल जमती थी। देश-विदेश में होने वाली घटनाओं की जानकारी लेने के लिए लोग समाचारों का इंतजार करते थे। दहेज में भी लंबे समय तक रेडियो दिया जाता रहा।
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सैदपुरा में लगती थी रेडियो वाली चौपाल
तितावी गांव सैदपुरा खुर्द निवासी पाल्ली सैनी बताते हैं कि लगभग 50 साल पहले रामू सैनी के यहां रेडियो था, जिसे सुनने के लिए शाम को गांव के सभी छोटे बडे़ लोग इकट्ठा होते थे। रेडियो को एक ऊंची मेज पर रखा जाता था। समाचारों को सभी ध्यान से सुनते थे और लोक संगीत जब शुरू होता था, तो लोग तालियां बजा बजा कर खूब आनंद उठाते थे। कुछ लोग कहा करते थे कि देख लेना ऐसी रेडियो भी आएगी कभी जब, चलते फिरते दिखाई दिया करेंगे।
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पापा के कहचरी जाते ही रेडियो पर बजते थे गाने
निराना निवासी मोहम्मद आफताब का कहना है कि टीवी क्रांति से पहले हमारे पास बिजली से चलने वाला रेडियो था, जिस पर हम सभी बीबीसी पर खबरें सुनते थे। पापा के कचहरी जाने के बाद हम गाने सुन कर मनोरंजन करते थे। हमारे गाने सुनने के शौक के चलते पापा ने हमारे लिए मरफी का रेडियो दिलवा दिया था, जिस पर स्कूल से आकर हम दोस्तों के साथ घर के बाहर या खेत में गाने सुनते थे।
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देश-विदेश की जानकारियों का खजाना
शाहपुर कस्बा निवासी रामशरण सैनी का कहना है कि आज से 25 से 30 वर्ष पूर्व रेडियो का काफी प्रचलन था। कस्बों व गांवों में लोग रेडियो पर अपने मनपसंद कार्यक्रम सुनते थे जो उनके मनोरंजन का एक बढ़िया साधन भी था। उस दौर में रेडियो के माध्यम से ही देश-विदेश में होने वाली प्रमुख घटनाओं की जानकारी मिलती थी। उन्होंने बताया कि वह रेडियो के माध्यम कृषि संबंधी कार्यक्रम व समाचार सुनते थे।
लोक संगीत सुनने की रहती थी बेताबी
छपार निवासी राजबीर शर्मा का कहना है कि अब से 30 से 40 वर्ष पूर्व रेडियो को लेकर उत्साह था। लोग चबूतरे पर बैठकर रेडियो में समाचार व हरियाणवी देहाती रागनियां बडे़ ही शौक से सुनते थे। युवा फिल्मी गाने सुनते थे। अब तो लोग मोबाइल में व्यस्त हो गए हैं। किसी इक्का दुक्का के पास रेडियो होगा।
आज भी रेडियो ही हमसफर
खतौली के बुआड़ा रोड निवासी 70 वर्षीय आनंद स्वरूप बताते हैं कि कई दशक पहले रेडियों ही ऐसा माध्यम था, जिसके द्वारा किसानों को उनकी फसल बोने, जवानों तक उनके बॉर्डर की सूचना पहुंचने और मनोरंजन करते थे। लेकिन आधुनिक युग में इसका प्रचलन कम हो गया है, उन्हें आज भी रेडियो पसंद है, वह रेडियो पर प्रतिदिन सायं सात बजे से साढे़ सात बजे तक किसानों के लिए खेती करने के तरीके के बारे में बताने का कार्यक्रम सुनते हैं।
चार दशक से कभी नहीं छूटा रेडियो का साथ
मिल मंसूरपुर निवासी अनिल जैन का मिल रोड पर जनरल स्टोर है। उनका कहना है कि वह लगभग 40 वर्षों से रेडियो सुन रहे हैं। रेडियो पर पुराने गाने, क्रिकेट की कमेंट्री के वह शौकीन रहे हैं। आज भी वह अपनी दुकान पर रेडियो सुनते रहते हैं। रेडियो में हर समय कार्यक्रम उपलब्ध हैं, बिजली का कोई झंझट नहीं है।

रेडियो पर सुनते थे धार्मिक कार्यक्रम
जानसठ निवासी विनय शर्मा का कहना है कि रेडियो पर सुबह सुप्रभात कार्यक्रम में रामचरित मानस की चौपाइयां और उसके कुछ समय बाद विविध भारती पर गीत, संगीत का कार्यक्रम मनचाहे गीत सुनने को मिलते थे। आज वह प्रसारण कहीं लुप्त हो चुका है। आज आधुनिकता के युग में टीवी पर लोग अपने मनचाहे कार्यक्रम देख रहे हैं।
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