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कलियुग में भगवान रोज लेते हैं अवतार : विजय कौशल
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Wed, 06 Sep 2017 12:32 AM IST
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खतौली में श्रीराम कथा सुनाते विजय कौशल जी महाराज।
- फोटो : अमर उजाला
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खतौली में श्रीराम कथा में अमृत वर्षा करते हुए कथा व्यास विजय कौशल जी महाराज ने कहा कि रामकथा संशय से पैदा हुई। कलियुग में भगवान हर रोज अवतार लेते हैं, लेकिन उसे देखने के लिए हृदय की आंखों की आवश्यकता है। त्रेता युग में बारह अवतार नरसिंह अवतार, सतयुग में राम अवतार व द्वापर युग में कृष्ण अवतार और कलियुग में हर रोज अवतार हो रहे हैं।
मंगलवार को केके जैन एजूकेशन सभास्थल में आयोजित श्रीराम कथा के पांचवें दिन विजय कौशल महाराज जी ने गुरु महिमा का मार्मिक चित्रण किया। महाराज जी ने कहा समर्थ गुरु रामदास के शिष्य भिक्षा मांगने गए थे। वो शिष्य पंडित गंगधर भट्ट के यहां भिक्षा मांगने पहुंचा, तो भट्ट जी ने शिष्य की माथा के ललाट को पढ़कर बताया कि तुम्हारी तो आज सायंकाल चार बजे तक की आयु है। शिष्य गुरु जी के पास पहुंचा और बताया।
गुरु जी बोले समर्थ गुरु रामदास जी जो कहा कोई बात नहीं। गुरु जी शिष्य से बोले खाना खाओ, शिष्य ने खाना खाने से मना कर दिया। गुुरु जी ने उसको खाना खिलाया और खाना खाने के बाद गुरु जी आराम करने लगे। गुरु जी ने शिष्य से कहा बेटा जरा पैरों में दर्द हो रहा है। जरा पैर दबा दो। शिष्य पैर दबाने लगा और चार बज गए। काल आया और गुरु जी के पैरों की तरफ खड़ा हो गया और शिष्य पैर दबाता रहा। जब छह बज गए तो काल गुरु जी को प्रणाम करते हुए चल दिया।
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जब काल चल दिया तो गुरु जी ने पूछा कैसे आए थे। इस शिष्य के प्राण लेने आया था। लेकिन हमें आदेश है कि जब कोई गुरु सेवा में लगा हो, तो हम उसके प्राण नहीं ले सकते । इसलिए मैं जा रहा हूं। अगले दिन शिष्या गंगाधर भट्ट जी के समक्ष भिक्षा लेने पहुंचा। उसे देखकर भट्ट जी के हाथों से लोटा छूट गया। उसी दिन से गंगाधर भट्ट जी रामदास को समर्थ गुरु रामदास की उपाधि दी। महाराज जी ने नारद संवाद का चित्रण प्रस्तुत करते हुए कहा कि संत को कभी किसी की शादी में नहीं जाना चाहिए न किसी के यहां खाना खाना चाहिए।
नारद जी इसलिए अभिशाप बने क्योंकि वे शादी में गए। कथा में मुख्य रूप से समिति अध्यक्ष दीपक बंसल, सचिव ज्योति मोहन गोयल, कोषाध्यक्ष मदन छाबड़ा, सुधीर गोयल, प्रधानाचार्य संजीव शर्मा, प्रशांत अग्रवाल, मीनाक्षी बंसल, कमल लोचन, विशाल लोचन, धर्मेंद्र शर्मा, भाजपा नेता नरेंद्र सिंह गहलौत, सचिव शर्मा, सुधीर शर्मा, श्रीचंद शर्मा, डोली बंसल, अतुल अग्रवाल, पवन अग्रवाल, मनोज अग्रवाल, अमित बंसल, ठाकुर लक्ष्मण सिंह, विनीत ठाकुर, अक्षयजीत सहरावत, आलोक गोयल, अनिल धारीवाल, नरेश नागपाल आदि उपस्थित रहे।
भक्तों ने गंगा में स्नान कर पुण्य लाभ कमाया
श्राद्ध पूर्व पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान कर धर्मलाभ कमाया तथा पितरों के तर्पण के लिए गंगा घाट पर अनुष्ठान कराया। प्रसाद के रूप में खीर वितरित किया। इस अवसर पर शुकदेव आश्रम, दंडी आश्रम, हनुमत धाम, तिलकधारी आश्रम, मां पीतांबरा आश्रम, महेश्वराश्रम, महाशक्ति सिद्धपीठ आदि आश्रमों में श्रद्धालुओं ने पूजा अर्चना कर साधु और संतों का आशीर्वाद प्राप्त किया।
शुकतीर्थ स्थित गंगा घाट पर भारी संख्याओं में श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान किया। स्वामी विष्णुदत्त शर्मा ने बताया कि भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक 16 दिन श्राद्ध कर्म किया जाएगा। इस प्रकार भाद्रपद पूर्णिमा पर गंगा स्नान का बड़ा महत्व है। ज्योतिषाचार्य पंडित अयोध्या प्रसाद मिश्र ने कहा कि श्राद्ध को दोपहर में करने का विधान है व इसके लिए तीन मुहूर्त कुतुब, रोहिण व तीसरा अपराहन काल है। मनुष्य को पितरों के तर्पण के लिए अनुष्ठान व दान करना चाहिए तथा भाद्रपद की पूर्णिमा पर गंगा स्नान कर पूजन करने का विशेष महत्व है। गंगा घाट पर पहुंचे श्रद्धालुओं की भारी भीड़ ने पिंडदान किया। बच्चों का मुंडन कराया।
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मंगलवार को केके जैन एजूकेशन सभास्थल में आयोजित श्रीराम कथा के पांचवें दिन विजय कौशल महाराज जी ने गुरु महिमा का मार्मिक चित्रण किया। महाराज जी ने कहा समर्थ गुरु रामदास के शिष्य भिक्षा मांगने गए थे। वो शिष्य पंडित गंगधर भट्ट के यहां भिक्षा मांगने पहुंचा, तो भट्ट जी ने शिष्य की माथा के ललाट को पढ़कर बताया कि तुम्हारी तो आज सायंकाल चार बजे तक की आयु है। शिष्य गुरु जी के पास पहुंचा और बताया।
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गुरु जी बोले समर्थ गुरु रामदास जी जो कहा कोई बात नहीं। गुरु जी शिष्य से बोले खाना खाओ, शिष्य ने खाना खाने से मना कर दिया। गुुरु जी ने उसको खाना खिलाया और खाना खाने के बाद गुरु जी आराम करने लगे। गुरु जी ने शिष्य से कहा बेटा जरा पैरों में दर्द हो रहा है। जरा पैर दबा दो। शिष्य पैर दबाने लगा और चार बज गए। काल आया और गुरु जी के पैरों की तरफ खड़ा हो गया और शिष्य पैर दबाता रहा। जब छह बज गए तो काल गुरु जी को प्रणाम करते हुए चल दिया।
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जब काल चल दिया तो गुरु जी ने पूछा कैसे आए थे। इस शिष्य के प्राण लेने आया था। लेकिन हमें आदेश है कि जब कोई गुरु सेवा में लगा हो, तो हम उसके प्राण नहीं ले सकते । इसलिए मैं जा रहा हूं। अगले दिन शिष्या गंगाधर भट्ट जी के समक्ष भिक्षा लेने पहुंचा। उसे देखकर भट्ट जी के हाथों से लोटा छूट गया। उसी दिन से गंगाधर भट्ट जी रामदास को समर्थ गुरु रामदास की उपाधि दी। महाराज जी ने नारद संवाद का चित्रण प्रस्तुत करते हुए कहा कि संत को कभी किसी की शादी में नहीं जाना चाहिए न किसी के यहां खाना खाना चाहिए।
नारद जी इसलिए अभिशाप बने क्योंकि वे शादी में गए। कथा में मुख्य रूप से समिति अध्यक्ष दीपक बंसल, सचिव ज्योति मोहन गोयल, कोषाध्यक्ष मदन छाबड़ा, सुधीर गोयल, प्रधानाचार्य संजीव शर्मा, प्रशांत अग्रवाल, मीनाक्षी बंसल, कमल लोचन, विशाल लोचन, धर्मेंद्र शर्मा, भाजपा नेता नरेंद्र सिंह गहलौत, सचिव शर्मा, सुधीर शर्मा, श्रीचंद शर्मा, डोली बंसल, अतुल अग्रवाल, पवन अग्रवाल, मनोज अग्रवाल, अमित बंसल, ठाकुर लक्ष्मण सिंह, विनीत ठाकुर, अक्षयजीत सहरावत, आलोक गोयल, अनिल धारीवाल, नरेश नागपाल आदि उपस्थित रहे।
भक्तों ने गंगा में स्नान कर पुण्य लाभ कमाया
श्राद्ध पूर्व पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान कर धर्मलाभ कमाया तथा पितरों के तर्पण के लिए गंगा घाट पर अनुष्ठान कराया। प्रसाद के रूप में खीर वितरित किया। इस अवसर पर शुकदेव आश्रम, दंडी आश्रम, हनुमत धाम, तिलकधारी आश्रम, मां पीतांबरा आश्रम, महेश्वराश्रम, महाशक्ति सिद्धपीठ आदि आश्रमों में श्रद्धालुओं ने पूजा अर्चना कर साधु और संतों का आशीर्वाद प्राप्त किया।
शुकतीर्थ स्थित गंगा घाट पर भारी संख्याओं में श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान किया। स्वामी विष्णुदत्त शर्मा ने बताया कि भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक 16 दिन श्राद्ध कर्म किया जाएगा। इस प्रकार भाद्रपद पूर्णिमा पर गंगा स्नान का बड़ा महत्व है। ज्योतिषाचार्य पंडित अयोध्या प्रसाद मिश्र ने कहा कि श्राद्ध को दोपहर में करने का विधान है व इसके लिए तीन मुहूर्त कुतुब, रोहिण व तीसरा अपराहन काल है। मनुष्य को पितरों के तर्पण के लिए अनुष्ठान व दान करना चाहिए तथा भाद्रपद की पूर्णिमा पर गंगा स्नान कर पूजन करने का विशेष महत्व है। गंगा घाट पर पहुंचे श्रद्धालुओं की भारी भीड़ ने पिंडदान किया। बच्चों का मुंडन कराया।