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पहली कुश्ती जीतने पर दिव्या को मिले थे 30 रुपये
अमर उजाला/ब्यूरो, मुजफ्फरनगर
Updated Thu, 23 Aug 2018 12:37 AM IST
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दंगल में लड़के के साथ कुश्ती लड़ती दिव्या काकरान।
- फोटो : अमर उजाला
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अंतरराष्ट्रीय कुश्ती के फलक पर चमक रही पहलवान दिव्या काकरान ने दृढ़ संकल्प से यह मुकाम हासिल किया है। मुश्किल हालातों में भी उसने खुद के जुनून को जोश से भरे रखा। कभी पैसे के लिए दंगलों में लड़कों को पटखनी देती दिव्या महिला कुश्ती में भारत की नई सनसनी बन गई है। दिल्ली में पहली बार दंगल में कुश्ती जीतने पर उसे केवल 30 रुपये इनाम मिला था। बेटी को कुश्ती का सरताज बनाने में परिवार ने भी कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी।
पुरबालियान से जकार्ता एशियाड तक के सफर में दिव्या काकरान की बेमिसाल दास्तां बेटियों को नया उजाला दे रही है। पहले गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स और अब जकार्ता एशियाई खेलों में गांव की बेटी ने विक्ट्री स्टेंड पर राष्ट्रीय धुन सुनी और देश को लगातार दूसरा ब्रांज मेडल दिलाया। अखाड़े की मिट्टी में तपने के बाद वह अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में हीरा बन कर चमकी है। पहलवानी कर चुके पिता सूरजवीर बताते हैं कि दादा राजेंद्र और मां संयोगिता चाहते थे, बड़ा बेटा देव पहलवान बने। दिव्या को स्कूल में दाखिला करा दिया, मगर वह क्लास से पढ़ाई छोड़ घर आ जाती।
बोलती, नहीं पढूंगी बल्कि अखाडे़ में जाऊंगी। हमने सोचा अखाडे़ में मेहनत देख बेटी डर जाएगी और स्कूल जाने लगेगी। ऐसा नहीं हुआ, उसे अखाडे़ में दांव लगाने में खुशी मिलती। दिल्ली के गोकलपुर स्थित भीम दल व्यायामशाला में दिव्या को प्रशिक्षण का विरोध झेलना पड़ा। लड़कों के बीच अकेली दिव्या की मौजूदगी से दिक्कतें आई। जैसे-तैसे राह बनी और कोच राजकुमार गोस्वामी और उनके बेटे अशोक गोस्वामी ने अलग से उसके प्रशिक्षण की व्यवस्था की।
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उसकी प्रतिभा देख उसे प्रोत्साहन मिलने लगा। बाद में दिल्ली के शक्तिनगर प्रेमनाथ अखाडे़ में ओलंपियन विक्रम ने उसे गुर सिखाए। बेटी को अखाड़े में भेजने के फैसले पर दादा राजेंद्र पहलवान ने नाखुशी जाहिर की। हालांकि बाद में दिव्या के बढ़ते कदमों को देख परिवार ने मेरा साथ दिया। आमदनी का कोई जरिया नहीं था। दिव्या की मां संयोगिता सिलाई में निपुण थी। उसने रात-दिन मेहनत कर लंगोट सीये और उन्हें अखाड़ों के बाहर बेच कर गुजर बसर होने लगी।
नौ साल की उम्र में दिव्या ने पहला दंगल लड़ा और कुश्ती जीतने पर उसे मात्र 30 रुपये मिले। बकौल सूरजवीर, उसने दस रुपये का प्रसाद चढ़ा दिया। पांच-पांच रुपये भाईयों देव और दीपक को दिए। शेष दस रुपये मां को दिए। एक अखाडे में उसे आयोजक ने अपने बेटे से कुश्ती लड़ने पर 500 रुपये देने की शर्त रख दी। घर की दिक्कतों से वाकिफ बेटी ने यह कुश्ती जीती।
पांच सौ रुपये के साथ उसे कुल तीन हजार रुपये मिल गए। तीस रुपये से तीन हजार देख कर दिव्या फूली नहीं समाई। कई साल से बेटी दंगल में विजेता बन कमाती और मैं अखाड़ों के बाहर कॉस्टयूम बेच कर दो पैसे कमाता। जब यह सुनता कि लंगोट वाले की बेटी दंगल जीत गई है तो खुशी में आंसु निकल आते। कठिन परिस्थितियों में हौसला मजबूत होता गया। दिव्या ने मेरे सपने को साकार कर दिया है।
गिफ्ट में दी अंगुठी
मुजफ्फरनगर। दिव्या की खातिर मां संयोगिता ने न केवल सिलाई की, बल्कि एक बार अपना मंगलसूत्र भी गिरवी रख दिया। मां बताती है कि कुश्ती जीतने के बाद मिले इनाम से उसने न केवल मंगलसूत्र छुड़वाया, बल्कि सोने की कई अंगुठी गिफ्ट में दे दी। वह अपनी दादी प्रेमवती से ज्यादा प्रेम करती है। रात भर दोनों बातें करती रहती हैं।
कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले उसने पिता से कहा, यदि मैने मेडल जीता तो मेरी एक बात पूरी करनी होगी। दादा राजेंद्र और दादी प्रेमवती को एक बार हवाई जहाज में सफर कराना होगा। गोल्ड कोस्ट में दिव्या ने कांस्य पदक जीता और पिता को उसकी मांग पूरी करनी पड़ी। संयोगिता ने बताया कि दिव्या के करियर के लिए बड़े भाई देव को पढ़ाई छोडऩी पड़ी। ट्रेनिंग के दौरान वो ही उसके साथ रहता है।
शाकाहारी डाइट लेती है दिव्या
मुजफ्फरनगर। दिव्या की डाइट का जिम्मा उसके पिता और दोस्त नीना निभाते हैं। एक बार मां ने दाल में लाल मिर्च डाल दी, तो उसने खाने से इंकार कर दिया, तब से उसकी डाइट का चार्ट पिता ही देखते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि कुश्ती के लिए क्या भोजन जरूरी है। दिव्या शाकाहारी है। जकार्ता एशियाई खेलों में भी भारतीय खिलाड़ियों के लिए शाकाहारी भोजन की व्यवस्था अलग से रही। हालांकि अभी भी उसे गाय-भैंस का दूध पीने को नहीं मिलता। दिल्ली में पैकेट का दूध पीती है। पिता कहते है कि हम खुद किराये पर रहते है, कैसे पशु पाले।
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पुरबालियान से जकार्ता एशियाड तक के सफर में दिव्या काकरान की बेमिसाल दास्तां बेटियों को नया उजाला दे रही है। पहले गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स और अब जकार्ता एशियाई खेलों में गांव की बेटी ने विक्ट्री स्टेंड पर राष्ट्रीय धुन सुनी और देश को लगातार दूसरा ब्रांज मेडल दिलाया। अखाड़े की मिट्टी में तपने के बाद वह अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में हीरा बन कर चमकी है। पहलवानी कर चुके पिता सूरजवीर बताते हैं कि दादा राजेंद्र और मां संयोगिता चाहते थे, बड़ा बेटा देव पहलवान बने। दिव्या को स्कूल में दाखिला करा दिया, मगर वह क्लास से पढ़ाई छोड़ घर आ जाती।
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बोलती, नहीं पढूंगी बल्कि अखाडे़ में जाऊंगी। हमने सोचा अखाडे़ में मेहनत देख बेटी डर जाएगी और स्कूल जाने लगेगी। ऐसा नहीं हुआ, उसे अखाडे़ में दांव लगाने में खुशी मिलती। दिल्ली के गोकलपुर स्थित भीम दल व्यायामशाला में दिव्या को प्रशिक्षण का विरोध झेलना पड़ा। लड़कों के बीच अकेली दिव्या की मौजूदगी से दिक्कतें आई। जैसे-तैसे राह बनी और कोच राजकुमार गोस्वामी और उनके बेटे अशोक गोस्वामी ने अलग से उसके प्रशिक्षण की व्यवस्था की।
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उसकी प्रतिभा देख उसे प्रोत्साहन मिलने लगा। बाद में दिल्ली के शक्तिनगर प्रेमनाथ अखाडे़ में ओलंपियन विक्रम ने उसे गुर सिखाए। बेटी को अखाड़े में भेजने के फैसले पर दादा राजेंद्र पहलवान ने नाखुशी जाहिर की। हालांकि बाद में दिव्या के बढ़ते कदमों को देख परिवार ने मेरा साथ दिया। आमदनी का कोई जरिया नहीं था। दिव्या की मां संयोगिता सिलाई में निपुण थी। उसने रात-दिन मेहनत कर लंगोट सीये और उन्हें अखाड़ों के बाहर बेच कर गुजर बसर होने लगी।
नौ साल की उम्र में दिव्या ने पहला दंगल लड़ा और कुश्ती जीतने पर उसे मात्र 30 रुपये मिले। बकौल सूरजवीर, उसने दस रुपये का प्रसाद चढ़ा दिया। पांच-पांच रुपये भाईयों देव और दीपक को दिए। शेष दस रुपये मां को दिए। एक अखाडे में उसे आयोजक ने अपने बेटे से कुश्ती लड़ने पर 500 रुपये देने की शर्त रख दी। घर की दिक्कतों से वाकिफ बेटी ने यह कुश्ती जीती।
पांच सौ रुपये के साथ उसे कुल तीन हजार रुपये मिल गए। तीस रुपये से तीन हजार देख कर दिव्या फूली नहीं समाई। कई साल से बेटी दंगल में विजेता बन कमाती और मैं अखाड़ों के बाहर कॉस्टयूम बेच कर दो पैसे कमाता। जब यह सुनता कि लंगोट वाले की बेटी दंगल जीत गई है तो खुशी में आंसु निकल आते। कठिन परिस्थितियों में हौसला मजबूत होता गया। दिव्या ने मेरे सपने को साकार कर दिया है।
गिफ्ट में दी अंगुठी
मुजफ्फरनगर। दिव्या की खातिर मां संयोगिता ने न केवल सिलाई की, बल्कि एक बार अपना मंगलसूत्र भी गिरवी रख दिया। मां बताती है कि कुश्ती जीतने के बाद मिले इनाम से उसने न केवल मंगलसूत्र छुड़वाया, बल्कि सोने की कई अंगुठी गिफ्ट में दे दी। वह अपनी दादी प्रेमवती से ज्यादा प्रेम करती है। रात भर दोनों बातें करती रहती हैं।
कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले उसने पिता से कहा, यदि मैने मेडल जीता तो मेरी एक बात पूरी करनी होगी। दादा राजेंद्र और दादी प्रेमवती को एक बार हवाई जहाज में सफर कराना होगा। गोल्ड कोस्ट में दिव्या ने कांस्य पदक जीता और पिता को उसकी मांग पूरी करनी पड़ी। संयोगिता ने बताया कि दिव्या के करियर के लिए बड़े भाई देव को पढ़ाई छोडऩी पड़ी। ट्रेनिंग के दौरान वो ही उसके साथ रहता है।
शाकाहारी डाइट लेती है दिव्या
मुजफ्फरनगर। दिव्या की डाइट का जिम्मा उसके पिता और दोस्त नीना निभाते हैं। एक बार मां ने दाल में लाल मिर्च डाल दी, तो उसने खाने से इंकार कर दिया, तब से उसकी डाइट का चार्ट पिता ही देखते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि कुश्ती के लिए क्या भोजन जरूरी है। दिव्या शाकाहारी है। जकार्ता एशियाई खेलों में भी भारतीय खिलाड़ियों के लिए शाकाहारी भोजन की व्यवस्था अलग से रही। हालांकि अभी भी उसे गाय-भैंस का दूध पीने को नहीं मिलता। दिल्ली में पैकेट का दूध पीती है। पिता कहते है कि हम खुद किराये पर रहते है, कैसे पशु पाले।