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नाम मेरा अशोक साहिल है, मैं गजल को लहू पिलाता हूं
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प्रसिद्घ शायर अशोक साहिल, मुशायरे में अपना कलाम पेश करते हुए।। फाइल फोटो।
- फोटो : MUZAFFARNAGAR
नाम मेरा अशोक साहिल है, मैं गजल को लहू पिलाता हूं
मुजफ्फरनगर। नस्ले आदम हो या कोई मखलूक, हर दुखी को गले लगाता हूं। खिदमते खल्क मेरा मजहब है, मैं मोहब्बत के गीत गाता हूं।। दुश्मनों पर भी हो मुसीबत तो, हर अदावत को भूल जाता हूं। नाम मेरा अशोक साहिल है, मैं ग़जल को लहू पिलाता हूं।। अपनी शायरी में मानवीय संवेदनाओं को सबसे ऊपर रखने वाले अशोक साहिल की ये पंक्तियां उनकी शायरी की एक झलक है। गरीबी को देखा ही नहीं, गरीबी को जी कर आगे बढ़ने वाले साहिल के साहित्य में आम आदमी की तड़प अलग ही दिखाई देती है।
जिंदगी भर उसूलों पर कायम रहने वाले अशोक साहिल किन्हीं भी परिस्थितियों में जीये, लेकिन कभी भी जमीर को नहीं गिरने दिया। वह खुद अपनी ही लाइनों में कहते हैं--गैरते मुझपे तंज करती हैं मेरे जमीर तुझे मार दूं कि मर जाऊं। जिंदगी क्या है एक रेंगती नागिन, लम्हा-लम्हा सरकती जाती है। सोचता हूं रुके तो प्यार करूं, जब भी रुकती है काट खाती है। जीवन को बहुत गहराई से जीने वाले अशोक साहिल देश में भाईचारे पर जोर देते हैं। मजहब से ज्यादा जोर इंसानियत पर है। वह खुद कहते हैं-- मैं तुम्हें अपने उसूलों की कसम देता हूँ, मुझको मजहब के तराजू में न तोला जाए. मैने इंसान ही रहने की कसम खाई हैं, मुझको इंसान की नजरों से ही देखा जाए। अपनी शायरी के माध्यम से अशोक साहिल समाज को संदेश भी देते हैं, वह कहते हैं कि- एक कतरा ही सही, मुझे ऐसी नीयत दे मोला, किसी को प्यासा जो देखूं, तो दरिया हो जाऊं। समाज के हालातों को वह अपनी नजर से देखते हैं और कहते हैं- अगर मौजें डूबो देती तो कुछ तस्कीन हो जाती। किनारों ने डुबोया है मुझे इस बात का गम है। उनकी शायरी में श्रृंगार रस भी झलकता है और उसे वह बेहद खूबसूरती से पेश करते हैं। शायर अशोक साहिल के शेर संसद में जन प्रतिनिधियों की जुबान पर कई बार गूंज चुके हैं। वह भले ही इस संसार से चले गए, लेकिन उनकी शायरी लोगों के दिलों में हमेशा के लिए अमर हो गई है। मुजफ्फरनगर के वह अकेले ऐसे शायर थे, जिन्होंने हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया के बड़े मुशायरों में शिरकत कर अपनी शायरी का लोहा मनवाया। अशोक साहिल के जीवन की खास बात यह रही कि वह मुशायरों के साथ कवि सम्मेलनों की शान भी रहे।
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मुजफ्फरनगर। नस्ले आदम हो या कोई मखलूक, हर दुखी को गले लगाता हूं। खिदमते खल्क मेरा मजहब है, मैं मोहब्बत के गीत गाता हूं।। दुश्मनों पर भी हो मुसीबत तो, हर अदावत को भूल जाता हूं। नाम मेरा अशोक साहिल है, मैं ग़जल को लहू पिलाता हूं।। अपनी शायरी में मानवीय संवेदनाओं को सबसे ऊपर रखने वाले अशोक साहिल की ये पंक्तियां उनकी शायरी की एक झलक है। गरीबी को देखा ही नहीं, गरीबी को जी कर आगे बढ़ने वाले साहिल के साहित्य में आम आदमी की तड़प अलग ही दिखाई देती है।
जिंदगी भर उसूलों पर कायम रहने वाले अशोक साहिल किन्हीं भी परिस्थितियों में जीये, लेकिन कभी भी जमीर को नहीं गिरने दिया। वह खुद अपनी ही लाइनों में कहते हैं--गैरते मुझपे तंज करती हैं मेरे जमीर तुझे मार दूं कि मर जाऊं। जिंदगी क्या है एक रेंगती नागिन, लम्हा-लम्हा सरकती जाती है। सोचता हूं रुके तो प्यार करूं, जब भी रुकती है काट खाती है। जीवन को बहुत गहराई से जीने वाले अशोक साहिल देश में भाईचारे पर जोर देते हैं। मजहब से ज्यादा जोर इंसानियत पर है। वह खुद कहते हैं-- मैं तुम्हें अपने उसूलों की कसम देता हूँ, मुझको मजहब के तराजू में न तोला जाए. मैने इंसान ही रहने की कसम खाई हैं, मुझको इंसान की नजरों से ही देखा जाए। अपनी शायरी के माध्यम से अशोक साहिल समाज को संदेश भी देते हैं, वह कहते हैं कि- एक कतरा ही सही, मुझे ऐसी नीयत दे मोला, किसी को प्यासा जो देखूं, तो दरिया हो जाऊं। समाज के हालातों को वह अपनी नजर से देखते हैं और कहते हैं- अगर मौजें डूबो देती तो कुछ तस्कीन हो जाती। किनारों ने डुबोया है मुझे इस बात का गम है। उनकी शायरी में श्रृंगार रस भी झलकता है और उसे वह बेहद खूबसूरती से पेश करते हैं। शायर अशोक साहिल के शेर संसद में जन प्रतिनिधियों की जुबान पर कई बार गूंज चुके हैं। वह भले ही इस संसार से चले गए, लेकिन उनकी शायरी लोगों के दिलों में हमेशा के लिए अमर हो गई है। मुजफ्फरनगर के वह अकेले ऐसे शायर थे, जिन्होंने हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया के बड़े मुशायरों में शिरकत कर अपनी शायरी का लोहा मनवाया। अशोक साहिल के जीवन की खास बात यह रही कि वह मुशायरों के साथ कवि सम्मेलनों की शान भी रहे।
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