{"_id":"599c7f214f1c1b8f248b45e8","slug":"mobile-calls-were-made-to-divorce","type":"story","status":"publish","title_hn":"मोबाइल कॉल कर दिए गए थे तलाक, चरथावल के दो गांवों में सामने आए थे मामले ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मोबाइल कॉल कर दिए गए थे तलाक, चरथावल के दो गांवों में सामने आए थे मामले
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
Updated Wed, 23 Aug 2017 12:29 AM IST
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एक साथ तीन तलाक पर शरई कानून में कोई जगह नहीं है, लेकिन इसके बाद भी मुस्लिम समाज में मोबाइल कॉल, व्हाट्सऐप पर तलाक देने के मामले अक्सर सामने आए हैं। चरथावल क्षेत्र के दो गांवों में मोबाइल कॉल कर तलाक देने के मामले हैं, जिनमें पति ने विदेश से ही फोन कर पत्नी से रिश्ता खत्म कर दिया था। हालांकि फिलहाल दोनों ही मामले कानून की दहलीज पर सिसक रहे हैं।
चरथावल के गांव कुटेरसा में दो सितंबर 2015 को फोन पर तलाक देने का मामला सामने आया था, जिसमें कुटेसरा के युवक ने पत्नी को बेटा नहीं होने के कारण उसे सऊदी के रियाद शहर से फोन कर तलाक तलाक तलाक कह दिया था। इतना ही नहीं युवक ने अपनी ससुराल सहारनपुर के बचीटी में फोन कर रिश्ता खत्म कर पत्नी को तलाक की बात कह दी थी। दूसरा मामला न्यामू गांव में हुआ था।
वर्ष 2015 में ही दो नवंबर को न्यामू के युवक ने सऊदी अरब से पत्नी को फोन कर 11 माह रिश्ते को तलाक शब्द कहकर खत्म कर दिया। इस मामले में भी वजह आपसी मतभेद सामने आया था। अब सवाल है कि फोन या व्हाट्सऐप पर तलाक देने को सामाजिक ऐतबार से कोई मान्यता नहीं है। मामलों पर उलेमा का तर्क है कि यदि तलाक देने के बाद लड़का इकरार करता है कि उसने फोन पर होश में तलाक कहा है तो दोनों के बीच तुरंत वैवाहिक संबंध खत्म हो जाएंगे।
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महिलाओं को हक से जीने की राह खुली
तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद महिलाओं ने खुशी जाहिर की है। आंखों से आंसू भी निकले, लेकिन महिलाओं ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर हक की लड़ाई में आधी जीत मिलने पर खुशी मनाई। दिनभर कचहरी में भी महिला अधिवक्ता और अन्य के बीच इस मुद्दे को लेकर चर्चा रही।
महिला अधिवक्ता बिलकिश चौधरी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च है। तीन तलाक पर फैसला दिया जाना सही है, लेकिन शरई कानून से जो छेड़छाड़ हो हो रही है, वह गलत है। केंद्र सरकार तीन तलाक को लेकर जो कानून बनाए, उसमें उलमा, मौलवियों और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अधिकारियों को साथ लेकर बनाया जाए।
अस्तित्व सामाजिक संगठन की फाउंडर रेहाना अदीब ने कहा कि तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत है। अब नया कानून बनने के बाद महिलाओं को जीने का हक तो मिलेगा। तीन तलाक को तीन जजों ने गैरकानूनी माना है। नए कानून का जो मसौदा तैयार किया जाए, उसमें कहीं भी राजनीतिक रंग नहीं होना चाहिए। यह जीत महिलाओं और पीड़िताओं की जीत होगी।
अधिवक्ता असद जमा ने कहा कि तीन तलाक का मामला कुरान हदीस का है, इसमें तब्दीली नहीं है। हालांकि नया कानून बनाए जाने से पहले इसमें शरई कानून में नाजायज रूप से कोई बदलाव नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो अल्पसंख्यक समाज इसे कतई स्वीकार नहीं करेगा। मुस्लिम समाज के लोगों को भी फैसले पर संयम बरतने की जरूरत है।
इस प्रकार से फैसला आने पर कुछ हद तक तीन तलाक की आड़ में महिलाओं का उत्पीड़ऩ रुकेगा। पूर्व दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री शवाब जैदी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक है। यह स्वागत योग्य है। तीन तलाक की आड़ में महिलाओं के उत्पीड़न और शोषण पर रोक लगी है। देश में आजादी के बाद मुस्लिम महिलाओं के लिए गौरवपूर्ण फैसला है।
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चरथावल के गांव कुटेरसा में दो सितंबर 2015 को फोन पर तलाक देने का मामला सामने आया था, जिसमें कुटेसरा के युवक ने पत्नी को बेटा नहीं होने के कारण उसे सऊदी के रियाद शहर से फोन कर तलाक तलाक तलाक कह दिया था। इतना ही नहीं युवक ने अपनी ससुराल सहारनपुर के बचीटी में फोन कर रिश्ता खत्म कर पत्नी को तलाक की बात कह दी थी। दूसरा मामला न्यामू गांव में हुआ था।
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वर्ष 2015 में ही दो नवंबर को न्यामू के युवक ने सऊदी अरब से पत्नी को फोन कर 11 माह रिश्ते को तलाक शब्द कहकर खत्म कर दिया। इस मामले में भी वजह आपसी मतभेद सामने आया था। अब सवाल है कि फोन या व्हाट्सऐप पर तलाक देने को सामाजिक ऐतबार से कोई मान्यता नहीं है। मामलों पर उलेमा का तर्क है कि यदि तलाक देने के बाद लड़का इकरार करता है कि उसने फोन पर होश में तलाक कहा है तो दोनों के बीच तुरंत वैवाहिक संबंध खत्म हो जाएंगे।
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महिलाओं को हक से जीने की राह खुली
तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद महिलाओं ने खुशी जाहिर की है। आंखों से आंसू भी निकले, लेकिन महिलाओं ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर हक की लड़ाई में आधी जीत मिलने पर खुशी मनाई। दिनभर कचहरी में भी महिला अधिवक्ता और अन्य के बीच इस मुद्दे को लेकर चर्चा रही।
महिला अधिवक्ता बिलकिश चौधरी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च है। तीन तलाक पर फैसला दिया जाना सही है, लेकिन शरई कानून से जो छेड़छाड़ हो हो रही है, वह गलत है। केंद्र सरकार तीन तलाक को लेकर जो कानून बनाए, उसमें उलमा, मौलवियों और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अधिकारियों को साथ लेकर बनाया जाए।
अस्तित्व सामाजिक संगठन की फाउंडर रेहाना अदीब ने कहा कि तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत है। अब नया कानून बनने के बाद महिलाओं को जीने का हक तो मिलेगा। तीन तलाक को तीन जजों ने गैरकानूनी माना है। नए कानून का जो मसौदा तैयार किया जाए, उसमें कहीं भी राजनीतिक रंग नहीं होना चाहिए। यह जीत महिलाओं और पीड़िताओं की जीत होगी।
अधिवक्ता असद जमा ने कहा कि तीन तलाक का मामला कुरान हदीस का है, इसमें तब्दीली नहीं है। हालांकि नया कानून बनाए जाने से पहले इसमें शरई कानून में नाजायज रूप से कोई बदलाव नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो अल्पसंख्यक समाज इसे कतई स्वीकार नहीं करेगा। मुस्लिम समाज के लोगों को भी फैसले पर संयम बरतने की जरूरत है।
इस प्रकार से फैसला आने पर कुछ हद तक तीन तलाक की आड़ में महिलाओं का उत्पीड़ऩ रुकेगा। पूर्व दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री शवाब जैदी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक है। यह स्वागत योग्य है। तीन तलाक की आड़ में महिलाओं के उत्पीड़न और शोषण पर रोक लगी है। देश में आजादी के बाद मुस्लिम महिलाओं के लिए गौरवपूर्ण फैसला है।