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जिले में तालाबों के पट्टे निरस्त
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तालाबों की भूमि काटे गए 48 साल पहले तक के सभी पट्टे निरस्त
रणवीर सैनी
मुजफ्फरनगर। वर्ष 1972 से लेकर अब तक तालाबों की जमीन पर काटे गए आवासीय कृषि पट्टों को निरस्त कर दिया गया है। गांवों की भूमि प्रबंधक समिति द्वारा दिए गए इन पट्टों को निरस्त करने से पहले डीएम और एडीएम की कोर्ट से पट्टाधारकों को नोटिस जारी किए गए थे। निरस्त किए गए पट्टों की जद में आई जमीनों में इस समय हजारों मकान बने हुए हैं। इससे पूरे जिले में हड़कंप मच गया है।
जिले में चकबंदी की प्रक्रिया 1972 में पूरी हुई थी। इसके बाद से जिन तालाबों की जमीनें गांवों में कृषि पट्टे और मकान बनाने के लिए आवंटित की गई है। अब तक के ऐसे सभी मामलों में जिला प्रशासन ने इन पट्टों को निरस्त करने की कार्रवाई कर दी है। अधिकतम पट्टे निरस्त कर दिये गए हैं, जो बचे हैं उनको निरस्त करने की प्रक्रिया चल रही है। डीएम न्यायालय में अब तक पूरे जिले से 57 तालाबों के मामले आए थे,जिनमें छह में जिलाधिकारी न्यायालय में सुनवाई हुई, अन्य अपर जिलाधिकारी न्यायालय में भेज दिए गए थे। इन पर आवंटित पट्टों की जमीन पर सैकड़ों लोगों ने अपने मकान बना रखे हैं। आवंटन की प्रक्रिया भी गांव की भूमि प्रबंधक समिति के प्रस्ताव के बाद एसडीएम स्तर से ही हुई थी। जिले में एक जनवरी से तालाबों के पट्टों को निरस्त करने की प्रक्रिया चल रही है और उन सभी लोगों को नोटिस जारी किया गया, वर्तमान में इन जमीनों पर जिनके मकान हैं, या जो खेती कर रहे हैं। पट्टा आवंटियों ने नोटिस के जवाब में आवंटन की सरकारी प्रक्रिया का रिकार्ड भी लगाया है। बावजूद, इसके सभी पट्टे निरस्त किए जा रहे हैं। डीएम न्यायाल से छह तालाबों पर, एडीएम प्रशासन के न्यायालय से 19 तालाबों पर और अन्य तालाबों पर एडीएम वित्त के न्यायालय से कार्रवाई हुई है। संवाद
एनजीटी और हाईकोर्ट के आदेश पर की कार्रवाई: डीएम
डीएम सेल्वा कुमारी जे ने मकानों के पट्टे निरस्तीकरण की कार्रवाई को लेकर बताया कि इस संबंध में एनजीटी और हाईकोर्ट का आदेश है। तालाबों को उनके मूल रूप में ही रखा जाना है। 1359 फसली रिकार्ड के हिसाब से ही तालाबों को दर्ज करने की कार्रवाई चल रही है।
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तीसरी पीढियां रह रही आंवटित पट्टों पर बने मकानों में
तालाबों के जिन पट्टों के आवंटन को निरस्त किया गया है। ये पट्टे 48 साल तक पुराने हैं। इनमें बने मकानों में तीसरी पीढ़ियां रह रही हैं। एडीएम प्रशासन अमित सिंह के न्यायालय से जिन तालाबों के आवंटन निरस्त किए गए उनमें 19 तालाब शामिल हैं। इसमें गालिबपुर के एक तालाब की भूमि का आवंटन गांव की प्रबंधक समिति ने 27 मार्च 1983 को पांच लोगों को किया। इसी वर्ष दूसरे तालाबों की भूमि का आवंटन चार लोगों को अलग से हुआ। जंधेडी के एक तालाब की भूमि 1980 को चार लोगों को आवंटित हुई और 1981 में दो और लोगों को ओर दी गई। अब्दुल्लापुर सोंटा में 1976 को छह लोगों को, 1981 में पांच लोगों को तालाब की जमीन का आवंटन हुआ। खानपुर में 1976 में दो लोगों को, जावन में 1981 में पांच लोगों को, खरड़ गांव में 1990 में छह लोगों को, 1991 में 19 लोगों को और 1993 में 14 लोगों को भूमि का आवंटन किया गया। इस गांव में 1998 में 38 लोगों को मकान के लिए तालाब की जमीन आवंटित की गई। फहीमपुर कलां में 1976 में दो लोगों को, बडौदा में 1981 में 11 लोगों को, मथेडी में 1976 में चार
इन जमीनों का नहीं हो सकता आवंटन
मुजफ्फरनगर। एडीएम प्रशासन अमित सिंह का कहना है कि तालाब सार्वजनिक उपयोग की भूमि है। तालाब, खाद के गड्ढे, रास्ता और नाले की भूमि को किसी को आवंटित नहीं किया जा सकता है। 1972 में पहली चकबंदी की प्रक्रिया यहां पूरी हुई। इसके बाद से अब तक जो भी आवंटन हुआ है वह नियम विरुद्ध है। अधिकतम पट्टों के निरस्तीकरण की कार्रवाई पूरी हो चुकी है, जो बाकी है उन्हें निरस्त किया जा रहा है।
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रणवीर सैनी
मुजफ्फरनगर। वर्ष 1972 से लेकर अब तक तालाबों की जमीन पर काटे गए आवासीय कृषि पट्टों को निरस्त कर दिया गया है। गांवों की भूमि प्रबंधक समिति द्वारा दिए गए इन पट्टों को निरस्त करने से पहले डीएम और एडीएम की कोर्ट से पट्टाधारकों को नोटिस जारी किए गए थे। निरस्त किए गए पट्टों की जद में आई जमीनों में इस समय हजारों मकान बने हुए हैं। इससे पूरे जिले में हड़कंप मच गया है।
जिले में चकबंदी की प्रक्रिया 1972 में पूरी हुई थी। इसके बाद से जिन तालाबों की जमीनें गांवों में कृषि पट्टे और मकान बनाने के लिए आवंटित की गई है। अब तक के ऐसे सभी मामलों में जिला प्रशासन ने इन पट्टों को निरस्त करने की कार्रवाई कर दी है। अधिकतम पट्टे निरस्त कर दिये गए हैं, जो बचे हैं उनको निरस्त करने की प्रक्रिया चल रही है। डीएम न्यायालय में अब तक पूरे जिले से 57 तालाबों के मामले आए थे,जिनमें छह में जिलाधिकारी न्यायालय में सुनवाई हुई, अन्य अपर जिलाधिकारी न्यायालय में भेज दिए गए थे। इन पर आवंटित पट्टों की जमीन पर सैकड़ों लोगों ने अपने मकान बना रखे हैं। आवंटन की प्रक्रिया भी गांव की भूमि प्रबंधक समिति के प्रस्ताव के बाद एसडीएम स्तर से ही हुई थी। जिले में एक जनवरी से तालाबों के पट्टों को निरस्त करने की प्रक्रिया चल रही है और उन सभी लोगों को नोटिस जारी किया गया, वर्तमान में इन जमीनों पर जिनके मकान हैं, या जो खेती कर रहे हैं। पट्टा आवंटियों ने नोटिस के जवाब में आवंटन की सरकारी प्रक्रिया का रिकार्ड भी लगाया है। बावजूद, इसके सभी पट्टे निरस्त किए जा रहे हैं। डीएम न्यायाल से छह तालाबों पर, एडीएम प्रशासन के न्यायालय से 19 तालाबों पर और अन्य तालाबों पर एडीएम वित्त के न्यायालय से कार्रवाई हुई है। संवाद
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एनजीटी और हाईकोर्ट के आदेश पर की कार्रवाई: डीएम
डीएम सेल्वा कुमारी जे ने मकानों के पट्टे निरस्तीकरण की कार्रवाई को लेकर बताया कि इस संबंध में एनजीटी और हाईकोर्ट का आदेश है। तालाबों को उनके मूल रूप में ही रखा जाना है। 1359 फसली रिकार्ड के हिसाब से ही तालाबों को दर्ज करने की कार्रवाई चल रही है।
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तीसरी पीढियां रह रही आंवटित पट्टों पर बने मकानों में
तालाबों के जिन पट्टों के आवंटन को निरस्त किया गया है। ये पट्टे 48 साल तक पुराने हैं। इनमें बने मकानों में तीसरी पीढ़ियां रह रही हैं। एडीएम प्रशासन अमित सिंह के न्यायालय से जिन तालाबों के आवंटन निरस्त किए गए उनमें 19 तालाब शामिल हैं। इसमें गालिबपुर के एक तालाब की भूमि का आवंटन गांव की प्रबंधक समिति ने 27 मार्च 1983 को पांच लोगों को किया। इसी वर्ष दूसरे तालाबों की भूमि का आवंटन चार लोगों को अलग से हुआ। जंधेडी के एक तालाब की भूमि 1980 को चार लोगों को आवंटित हुई और 1981 में दो और लोगों को ओर दी गई। अब्दुल्लापुर सोंटा में 1976 को छह लोगों को, 1981 में पांच लोगों को तालाब की जमीन का आवंटन हुआ। खानपुर में 1976 में दो लोगों को, जावन में 1981 में पांच लोगों को, खरड़ गांव में 1990 में छह लोगों को, 1991 में 19 लोगों को और 1993 में 14 लोगों को भूमि का आवंटन किया गया। इस गांव में 1998 में 38 लोगों को मकान के लिए तालाब की जमीन आवंटित की गई। फहीमपुर कलां में 1976 में दो लोगों को, बडौदा में 1981 में 11 लोगों को, मथेडी में 1976 में चार
इन जमीनों का नहीं हो सकता आवंटन
मुजफ्फरनगर। एडीएम प्रशासन अमित सिंह का कहना है कि तालाब सार्वजनिक उपयोग की भूमि है। तालाब, खाद के गड्ढे, रास्ता और नाले की भूमि को किसी को आवंटित नहीं किया जा सकता है। 1972 में पहली चकबंदी की प्रक्रिया यहां पूरी हुई। इसके बाद से अब तक जो भी आवंटन हुआ है वह नियम विरुद्ध है। अधिकतम पट्टों के निरस्तीकरण की कार्रवाई पूरी हो चुकी है, जो बाकी है उन्हें निरस्त किया जा रहा है।