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Muzaffarnagar News: कान्हा के जहां पड़े थे कदम, आज भी खड़े हैं कदंब
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एसपी मलिक
बुढ़ाना। ऐतिहासिक खरड़ गांव का अतीत महाभारतकाल से जुड़ा है। मान्यता है यहां जूड़ (वन क्षेत्र) में पांडवों के साथ भगवान श्रीकृष्ण भी आए थे। जहां-जहां भगवान श्रीकृष्ण के पग पड़े, वहीं कदंब के पेड़ उगे हैं। आज भी कदंब के पेड़ों से गांव की पहचान है।
गठवाला खाप का गांव खरड़ आस्था और विश्वास का केंद्र है। यहां शिव मंदिर परिसर में खड़े कदंब के पेड़ भगवान कृष्ण की याद दिलाते हैं। इनके बारे में धारणा है कि ये महाभारत काल के हैं। भगवान श्रीकृष्ण के पैर जहां-जहां पड़े, वहां-वहां कदंब के पौधे उग आए। जो आज विराट वृक्ष के रूप में विराजमान हैं।
प्राचीन शिव मंदिर में प्राचीन लिपि में लिखा पत्थर स्थापित है
प्राचीन शिव मंदिर में मन में मुराद लेकर हर वर्ष दूर दराज से श्रद्धालु आते हैं। मान्यता है भगवान शंकर श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी करते हैं। इस प्राचीन शिव मंदिर को भी महाभारतकालीन कहा जाता है। ग्राम प्रधान पूनम और उनके पति विकास मलिक ने बताया कि करीब 800 बीघा में फैले वन क्षेत्र में शिव मंदिर और कदंब के वृक्ष भी स्थित हैं।
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पांडवों ने बिताया था अज्ञातवास
ग्राम प्रधान पूनम मलिक बतातीं है कि बरनावा में लाक्षागृह से बचने के बाद अज्ञातवास के दौरान पांडव इस क्षेत्र आकर रुके थे। भगवान शिव की अराधना के लिए पांडवों ने मंदिर का निर्माण कर पंचमुखी शिवलिंग स्थापित किया था। पांडवों से मिलने के लिए भगवान श्रीकृष्ण और विदुर के दूत यहां आए थे। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के कदम पड़ने से ही यहां कदंब के वृक्ष उग आए।
दीवारों पर चित्रकारी बता रही इतिहास
ग्रामीण अमित मलिक कहते हैं मंदिर की दीवारों पर हाथ से चित्रकारी बनी है। मंदिर परिसर में प्राचीन लिपि में लिख एक पत्थर भी है। ज्येष्ठ माह में पड़ने वाले दशहरे पर यहां प्रति वर्ष मेले का आयोजन होता है। गांव का शीतला माता व शाकंभरी देवी माता का मंदिर भी उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। मंदिर क्षेत्र में मेले का आयोजन होता है।
जन्माष्टमी पर होती है कदंब के पेड़ों की पूजा
रजनीश मलिक बताते हैं श्रद्धालु कदंब के पेड़ों को भगवान कान्हा के रूप में मानकर पूजा-अर्चना करते है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु कदंब के पेड़ के दर्शन करने के लिए गांव में आते हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है, जो वृक्ष की शाखाओं पर कलावा बांधते हैं।
तीन सौ साल पुराना माता का मंदिर
खरड़ में माता शीतला देवी के मंदिर पर हर साल मेला लगता है। ग्रामीण प्रवीण कुमार कहते हैं कि कई राज्यों के लोग मेले में यहां आते हैं।
गांव में शहर की तर्ज पर बोर्ड
खरड़ गांव बुढ़ाना विकास खंड का मुख्य गांव माना जाता है। यह एक तरफ पानीपत खटीमा मार्ग और दूसरी तरफ मेरठ करनाल हाईवे को जोड़ता है। ग्राम पंचायत की तरफ से शहरों की तर्ज पर गलियों के किनारों पर बोर्ड लगाए गए हैं। ग्राम पंचायत ने सुंदर और स्वच्छता के माध्यम से यहां के धार्मिक महत्व को बरकरार रखने का प्रयास किया गया है।
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बुढ़ाना। ऐतिहासिक खरड़ गांव का अतीत महाभारतकाल से जुड़ा है। मान्यता है यहां जूड़ (वन क्षेत्र) में पांडवों के साथ भगवान श्रीकृष्ण भी आए थे। जहां-जहां भगवान श्रीकृष्ण के पग पड़े, वहीं कदंब के पेड़ उगे हैं। आज भी कदंब के पेड़ों से गांव की पहचान है।
गठवाला खाप का गांव खरड़ आस्था और विश्वास का केंद्र है। यहां शिव मंदिर परिसर में खड़े कदंब के पेड़ भगवान कृष्ण की याद दिलाते हैं। इनके बारे में धारणा है कि ये महाभारत काल के हैं। भगवान श्रीकृष्ण के पैर जहां-जहां पड़े, वहां-वहां कदंब के पौधे उग आए। जो आज विराट वृक्ष के रूप में विराजमान हैं।
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प्राचीन शिव मंदिर में प्राचीन लिपि में लिखा पत्थर स्थापित है
प्राचीन शिव मंदिर में मन में मुराद लेकर हर वर्ष दूर दराज से श्रद्धालु आते हैं। मान्यता है भगवान शंकर श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी करते हैं। इस प्राचीन शिव मंदिर को भी महाभारतकालीन कहा जाता है। ग्राम प्रधान पूनम और उनके पति विकास मलिक ने बताया कि करीब 800 बीघा में फैले वन क्षेत्र में शिव मंदिर और कदंब के वृक्ष भी स्थित हैं।
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पांडवों ने बिताया था अज्ञातवास
ग्राम प्रधान पूनम मलिक बतातीं है कि बरनावा में लाक्षागृह से बचने के बाद अज्ञातवास के दौरान पांडव इस क्षेत्र आकर रुके थे। भगवान शिव की अराधना के लिए पांडवों ने मंदिर का निर्माण कर पंचमुखी शिवलिंग स्थापित किया था। पांडवों से मिलने के लिए भगवान श्रीकृष्ण और विदुर के दूत यहां आए थे। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के कदम पड़ने से ही यहां कदंब के वृक्ष उग आए।
दीवारों पर चित्रकारी बता रही इतिहास
ग्रामीण अमित मलिक कहते हैं मंदिर की दीवारों पर हाथ से चित्रकारी बनी है। मंदिर परिसर में प्राचीन लिपि में लिख एक पत्थर भी है। ज्येष्ठ माह में पड़ने वाले दशहरे पर यहां प्रति वर्ष मेले का आयोजन होता है। गांव का शीतला माता व शाकंभरी देवी माता का मंदिर भी उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। मंदिर क्षेत्र में मेले का आयोजन होता है।
जन्माष्टमी पर होती है कदंब के पेड़ों की पूजा
रजनीश मलिक बताते हैं श्रद्धालु कदंब के पेड़ों को भगवान कान्हा के रूप में मानकर पूजा-अर्चना करते है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु कदंब के पेड़ के दर्शन करने के लिए गांव में आते हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है, जो वृक्ष की शाखाओं पर कलावा बांधते हैं।
तीन सौ साल पुराना माता का मंदिर
खरड़ में माता शीतला देवी के मंदिर पर हर साल मेला लगता है। ग्रामीण प्रवीण कुमार कहते हैं कि कई राज्यों के लोग मेले में यहां आते हैं।
गांव में शहर की तर्ज पर बोर्ड
खरड़ गांव बुढ़ाना विकास खंड का मुख्य गांव माना जाता है। यह एक तरफ पानीपत खटीमा मार्ग और दूसरी तरफ मेरठ करनाल हाईवे को जोड़ता है। ग्राम पंचायत की तरफ से शहरों की तर्ज पर गलियों के किनारों पर बोर्ड लगाए गए हैं। ग्राम पंचायत ने सुंदर और स्वच्छता के माध्यम से यहां के धार्मिक महत्व को बरकरार रखने का प्रयास किया गया है।