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मुजफ्फरनगर दंगे के चार साल : अाज तक नहीं मिट पाई दिलों की दूरियां        

Thu, 07 Sep 2017 12:43 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर
अमर उजाला ब्यूरो/ मुजफ्फरनगर Updated Thu, 07 Sep 2017 12:43 AM IST
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Four years of Muzaffarnagar riots
सात सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर जिले के नंगला मंदौड़ महापंचायत में आपबीती सुनाता युवक। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
सात सितंबर 2013। यह वही मनहूस तारीख है, जिसे मुजफ्फरनगर के लोग कभी नहीं भूल पाएंगे। इसी दिन जिलेभर में सांप्रदायिक हिंसा का ऐसा नंगा नाच हुआ कि लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। किसी के बुढ़ापे की लाठी छिनी, किसी की मांग का सिंदूर उजड़ा।
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कइयों के घरों के चिराग बुझे तो कुछ के सिर से पिता का साया उठ गया। सांप्रदायिक हिंसा में 65 बेगुनाहों की जानें गईं। इस भयावह मंजर को बीते चार साल गुजर चुके हैं, लेकिन आज भी दिलों की दूरियां नहीं मिट पाई हैं। दोनों ही समुदायों के बीच नफरत की लकीर है।  
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हर कोई इस सच से वाकिफ है कि दंगे की आंच में दोनों समुदायों के लोगों को नुकसान उठाना पड़ता है। सात सितंबर 2013 में नफरत का जो उन्माद गांव और गलियों में देखा, वह पहले यहां के इतिहास में नहीं मिलता। शुरुआत 27 अगस्त को कवाल गांव से शुरू हुई। शाहनवाज की हत्या के बाद भीड़ ने मलिकपुरा गांव के ममेरे भाइयों सचिन और गौरव की हत्या कर डाली थी। तिहरे हत्याकांड को लेकर सियासत ऐसी गरमाई कि जिलेभर का अमन-चैन खतरे में पड़ गया।
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29 अगस्त को खालापार और 31 अगस्त को नंगला मंदौड़ की पंचायतों में जहरीले भाषण दिए गए। एकाएक माहौल गर्माता गया और नफरत दिलों में घर करती गई। इसी कड़ी में बहू-बेटी बचाओ सम्मान के नाम से सात सितंबर को नंगला मंदौड़ मैदान में महापंचायत बुलाई गई। जिले में धारा 144 लागू होने और तमाम प्रतिबंधों के बावजूद हजारों की भीड़ खेतों के रास्ते महापंचायत में पहुंच गई। ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से महापंचायत में जाते लोगों पर बसी कलां गांव में मारपीट और पथराव हुआ। इन्हीं लोगों ने पंचायत में जाकर आपबीती सुनाई तो गुस्सा और भड़क गया। दिन ढलते ही सांप्रदायिक हिंसा का दौर शुरू हो गया। 

पंचायत से लौटती भीड़ पर मीरापुर के मुझेड़ा, पुरबालियान और जौली गंगनहर पर हमले हुए। इन हमलों में 12 लोगों की जान गई और कई लापता हो गए। बाद में इनकी लाशें नहर और रजवाहों से बरामद हुई। घटना के प्रतिशोध में भौराकलां, शाहपुर, तितावी, बुढ़ाना, फुगाना और भोपा थाना क्षेत्रों में जमकर हिंसा हुई।

65 से अधिक लोग दंगे में मारे गए, जबकि 50 हजार लोगों को राहत शिविरों में पहुंचकर जान बचानी पड़ी। तत्कालीन सूबे की सपा सरकार ने पीड़ितों के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोल दिया। लोगों को जैसे-तैसे कर शिविरों से वापस भेजा गया। जिन गांवों में ज्यादा हिंसा हुई, वहां एक भी परिवार वापस नहीं लौटा। सरकारी इमदाद पाने के लोगों ने अपने मकान अपनी बहुलता वाले गांवों में बना लिए। 

अब हालात ऐसे हैं कि ज्यादातर लोग अपने घर और जमीन औने-पौने दामों में बेचकर दूसरी जगहों पर बस गए हैं। कई गांवों के धार्मिक स्थल सूने पड़े हैं। दंगा क्यों हुआ, किसने कराया, कौन गुनहगार है, इन सब बातों का सच अदालत के फैसले के बाद ही सामने आएगा। अभी तक कुछ मामलों में अदालत का फैसला आया भी है, जबकि अधिकांश केस अभी लंबित हैं।  

उस दिन को अब भूलना ही बेहतर 
मुजफ्फरनगर। दंगे को चार साल गुजर गए हैं। जिंदगी पटरी पर दौड़ने लगी है। हिंसा में मारे गए लोगों को तत्कालीन सपा सरकार ने सरकारी नौकरियां दी थीं। नौकरी तो मिल गईं अपनों को खोने का दर्द कम नहीं हो रहा। अलग-अलग विभागों में नौकरी पाए दंगा पीड़ितों का कहना है कि अब उस दिन को भूलना ही बेहतर है। जिंदगी जैसे-तैसे कर चल रही है। कलक्ट्रेट में कार्यरत अर्जुन, कैलाश, सतीश, सारांश, याकूब आदि वह कर्मचारी हैं, जिन्होंने अपने परिवार के किसी न किसी शख्स को खोया है। वह कहते हैं कि दंगे से किसी को कुछ हासिल नहीं होता, जिनके घर उजड़ते हैं, वहीं इसके दर्द को समझ सकते हैं।  

फेसबुक मुख्यालय  ने नहीं दिया डाटा  
मुजफ्फरनगर। दंगे की मुख्य वजह बताई गई कवाल कांड की कथित क्लिपिंग की हकीकत आज तक सामने नहीं आ पाई है। चार साल बाद भी पुलिस की जांच का नतीजा सिफर है। थक-हार कर पुलिस आरोपी विधायक संगीत सोम को मामले में क्लीनचिट दे दी है। कवाल कांड का कथित वीडियो को ही पुलिस प्रशासन ने दंगा भड़काने का जिम्मेदार माना था। इस वीडियो को सरधना विधायक संगीत सोम के फेसबुक एकाउंट से शेयर की गई थी।

शासन के आदेश पर पुलिस ने संगीत सोम के खिलाफ शहर कोतवाली में मुकदमा अपराध संख्या 1118-13 पर धारा 153ए, 420, 120बी आईपीसी और 66ए आईटी एक्ट में मुकदमा पंजीकृत किया था। इस मामले में विधायक को गिरफ्तार कर रासुका में भी निरुद्ध किया गया था। इस मामले की पहले पुलिस और बाद में एसआईटी ने भी तफ्तीश की।

एसआईटी इंटरपोल की मदद से फेसबुक मुख्यालय से संपर्क किया, लेकिन फेसबुक ने पुराना डाटा नहीं होने की बात कहकर टरका दिया। यही वजह है कि चार साल बाद भी इस मामले की हकीकत सामने नहीं आ पाई। कोई सबूत नहीं पाए जाने पर एसआईटी ने विधायक संगीत सोम को भी क्लीनचिट दे दी है।  

मुजफ्फरनगर दंगा: दर्द भरी दास्तां
27 अगस्त 2013: जानसठ के कवाल गांव में शाहनवाज, सचिन और गौरव की हत्या। गांव में आगजनी से बिगड़ा माहौल। डीएम, एसएसपी और एसपी सिटी हटाए गए।  
-28 अगस्त: सचिन-गौरव का अंतिम संस्कार कर लौट रहे ग्रामीणों ने कवाल में तोड़फोड़ की, हंगामा।  
-29 अगस्त: नंगला मंदौड़ इंटर कॉलेज के मैदान में सचिन-गौरव की शोकसभा की घोषणा, तनाव फैला।  
-30 अगस्त: शोकसभा के विरोध में उतरा मुस्लिम समुदाय। मीनाक्षी चौक पर डीएम-एसएसपी को ज्ञापन सौंपा।  -31 अगस्त: नंगला मंदौड़ के कॉलेज के मैदान में शोकसभा। वाहनों को आग लगाई गई। यहीं से जनपदभर में तनाव फैला।  
01 सितंबर: सीआरपीएफ, पीएसी के जवानों ने बड़ी संख्या में जनपद और आसपास के क्षेत्र में डेरा डाला। इसी दौरान बस, ट्रेनों में लोगों के साथ मारपीट की घटनाएं।  

-02 सितंबर: शहर से लेकर देहात तक अफवाहों ने डाला आग में घी। जगह-जगह पंचायतों से बिगड़ा माहौल। -05 सितंबर: भाजपा के आह्वान पर शहर और देहात बंद। सन्नाटा पसरा।  -06 सितंबर: महापंचायत की रणनीति पर डीजीपी पहुंचे। प्रशासन पूरी तरह से फेल साबित हुआ।  
-07 सितंबर: महापंचायत में हजारों लोग पहुंचे। पंचायत से लौटते समय ग्रामीणों पर जानलेवा हमला, आगजनी में कई लोग मरे। शहरभर में कर्फ्यू लगाया गया।  
-08 सितंबर: शहर से लेकर देहात तक हिंसा का दौर शुरू। फौज ने मोर्चा संभाला।  
-09 सितंबर: जनपद में हालात बेकाबू, 30 से अधिक लोगों की गई जान। इसी दिन एसएसपी सुभाष दुबे हटाए गए, प्रवीण कुमार को कप्तान का चार्ज मिला था।  
-10 सितंबर: शहर में हालात काबू में आए, लेकिन गांवों में छिटपुट हिंसा की घटनाएं।  
-11 सितंबर: शहर में लगे कर्फ्यू में पांच घंटे की ढील दी गई।  
-12 सितंबर: शहर और आसपास में फौज का गश्त, माहौल पर रखी गई कड़ी निगाहें।  
-13 सितंबर: शहर में लगा कर्फ्यू हटाया गया। माहौल सामान्य करने की कोशिश।  
-15 सितंबर: मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जनपद में पहुंचे। एसएसपी सुभाष दूबे सस्पेंड। मृतकों के परिजनों को मुआवजे की घोषणा।  
-15 सितंबर: सीएम अखिलेश यादव ने दंगे की जांच के लिए एसआईटी का किया गठन।  
-17 सितंबर: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी व राहुल गांधी पहुंचे। राजनेताओं का जनपद में लगा तांता। दंगे पर राजनीति गरमाया।  
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