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Muzaffarnagar News: बदलाव की बयार में विलुप्त हो गए होली के लोकगीत
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स्वांग और लोकगीतों की वजह से सिसौली की होली थी प्रसिद्ध
संवाद न्यूज एजेंसी
भौराकलां। बदलाव की बयार में होली के लोकगीत अब बीते जमाने की बात हो गए हैं। सिसौली में प्रसिद्घ कलाकारों की ओर से स्वांग का प्रदर्शन भी अब नहीं होता। यहां की होली कभी प्रसिद्ध होती थी। वसंत में गाए जाने वाले होली गीतों की मस्ती का खुमार महिलाओं पर 15 दिन पहले चढ़ जाता था।
सिसौली की होली एक जमाने में दूरस्थ शहरों तक विख्यात थी। होली की तैयारियां वसंत पंचमी से शुरू हो जाती थी। स्वांग, होली गीत और कव्वाली का आयोजन होता था। स्वांग सिसौली की होली का मुख्य आकर्षण होता था। होली से करीब 15 दिन पहले पहले स्वांग के कलाकार सिसौली पहुंच जाते थे। स्वांग देखने के लिए कस्बे सहित आसपास के गांव माजरा, हड़ौली, भौराकलां और भौरा खुर्द आदि गांवों से भारी तादात में ग्रामीण पहुंचते थे।
परंतु, वर्तमान में यह परंपरा विलुप्त हो गई है।
भौरा कलां के मांगे राम, देवेंद्र सिंह और महक सिंह बताते हैं कि 80 के दशक में स्वांग कलाकार चंद्र बादी और बुल्ली का चौक देखने के लिए लोग दूर-दूर से सिसौली पहुंचते थे। दर्जनों पार्टियां अनोखी कला प्रस्तुत कर ग्रामीणों को लुभाती थी। मगर, अब स्वांग का चौक नहीं होने के कारण उन्हें मायूसी मिलती है।
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देश भक्ति का जोश भरते थे कलाकार
सिसौली के वयोवृद्ध ओमप्रकाश और दरयाव सिंह बताते हैं कि पुराने समय में देहात में मनोरंजन के सीमित साधन थे। स्वांग कलाकार कला के माध्यम से दर्शकों में देश भक्ति का जज्बा भर देते थे। धार्मिक और अतीत के संस्मरण और ऐतिहासिक मुद्दों पर स्वांग होता था। इससे गौरवशाली इतिहास की जानकारी मिलती थी। कलाकार मनोरंजन के साथ समाज को एक सूत्र में पिरोने का काम करते थे।
सिसौली की होली आज भी मशहूर : टिकैत
भाकियू अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत का कहना है कि होली पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों ने सिसौली की होली को देशभर में पहचान दिलाई है। आज भी यहां एक जगह ही होलिका दहन होता है। दुल्हैंडी पर झांकियां निकालने की परंपरा कायम है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
भौराकलां। बदलाव की बयार में होली के लोकगीत अब बीते जमाने की बात हो गए हैं। सिसौली में प्रसिद्घ कलाकारों की ओर से स्वांग का प्रदर्शन भी अब नहीं होता। यहां की होली कभी प्रसिद्ध होती थी। वसंत में गाए जाने वाले होली गीतों की मस्ती का खुमार महिलाओं पर 15 दिन पहले चढ़ जाता था।
सिसौली की होली एक जमाने में दूरस्थ शहरों तक विख्यात थी। होली की तैयारियां वसंत पंचमी से शुरू हो जाती थी। स्वांग, होली गीत और कव्वाली का आयोजन होता था। स्वांग सिसौली की होली का मुख्य आकर्षण होता था। होली से करीब 15 दिन पहले पहले स्वांग के कलाकार सिसौली पहुंच जाते थे। स्वांग देखने के लिए कस्बे सहित आसपास के गांव माजरा, हड़ौली, भौराकलां और भौरा खुर्द आदि गांवों से भारी तादात में ग्रामीण पहुंचते थे।
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परंतु, वर्तमान में यह परंपरा विलुप्त हो गई है।
भौरा कलां के मांगे राम, देवेंद्र सिंह और महक सिंह बताते हैं कि 80 के दशक में स्वांग कलाकार चंद्र बादी और बुल्ली का चौक देखने के लिए लोग दूर-दूर से सिसौली पहुंचते थे। दर्जनों पार्टियां अनोखी कला प्रस्तुत कर ग्रामीणों को लुभाती थी। मगर, अब स्वांग का चौक नहीं होने के कारण उन्हें मायूसी मिलती है।
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देश भक्ति का जोश भरते थे कलाकार
सिसौली के वयोवृद्ध ओमप्रकाश और दरयाव सिंह बताते हैं कि पुराने समय में देहात में मनोरंजन के सीमित साधन थे। स्वांग कलाकार कला के माध्यम से दर्शकों में देश भक्ति का जज्बा भर देते थे। धार्मिक और अतीत के संस्मरण और ऐतिहासिक मुद्दों पर स्वांग होता था। इससे गौरवशाली इतिहास की जानकारी मिलती थी। कलाकार मनोरंजन के साथ समाज को एक सूत्र में पिरोने का काम करते थे।
सिसौली की होली आज भी मशहूर : टिकैत
भाकियू अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत का कहना है कि होली पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों ने सिसौली की होली को देशभर में पहचान दिलाई है। आज भी यहां एक जगह ही होलिका दहन होता है। दुल्हैंडी पर झांकियां निकालने की परंपरा कायम है।