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छाज बनाने वाले परिवारों के सामने संकट
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भोपा के गांव मोरना में छाज बनाते डेव जाति के लोग।
- फोटो : MUZAFFARNAGAR
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भोपा। मोरना में झुग्गी-झोपड़ियां डालकर रह रहे डेव जाति के लोगों के सामने लॉकडाउन के चलते भारी समस्याएं खड़ी हो गई हैं। लगभग 10 परिवार छाज बनाने का कार्य करते हैं। गेहूं कटाई के सीजन गांव-गांव फेरी कर बिक्री करते थे लेकिन लॉकडाउन में उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
भोपा क्षेत्र के गांव मोरना में शुकतीर्थ मार्ग पर पिछले 25 वर्षों से भी अधिक समय से डेव जाति के लगभग 10 परिवार रहते हैं। उनका कार्य छाज (अनाज फटकने का सींकों आदि से बना एक उपकरण) बनाकर उन्हें गांव-गांव जाकर बेचना है। मुकेश, बबलू, श्रीचंद, सुधा, देवी, अजय आदि का कहना है कि उनका कार्य जंगलों से लकड़ी (सींक) लाकर प्लास्टिक की डोरी व बांस आदि के माध्यम से उन्हें तैयार कर बेचना है। उसी से उनका परिवार चलता है। गेहूं कटाई के समय छाज का प्रयोग अधिक किया जाता है, इसलिए उन्हें इस सीजन में काफी उम्मीद रहती है लेकिन लॉकडाउन के चलते वे गांव में फेरी आदि नहीं लगा पा रहे। उनके सामने रोजी-रोटी का संकट है। उनके पास आवास नहीं है, शौचालय भी खुले में जाना पड़ता है। परिवार के दो लोग मिलकर दो दिन में लगभग पांच-छह छाज तैयार कर देते हैं। एक छाज की कीमत 80 से 100 रुपये तक मिल जाती है। लॉकडाउन के चलते छाज बनाने के लिए उन्हें बांस व प्लास्टिक की डोरी भी नहीं मिल पा रही है। इससे भी उन्हें काफी दिक्कत उठानी पड़ रही है।
एडीओ सीपी सिंह शर्मा का कहना है कि उनके पास अपनी कोई भूमि नहीं होने से उन्हें आवास नहीं मिल सकते, न ही शौचालय बनाए जा सकते हैं। ग्राम पंचायतों में सार्वजनिक शौचालय का प्रस्ताव भेजा गया है। ग्राम पंचायत स्तर पर जो मदद संभव है वह दी जा रही है। प्रधान पति शहजाद अंसारी का कहना है कि राशन की दुकान से परिवारों को राशन वितरण किया जाता है। ग्राम पंचायत स्तर पर भी हर संभव मदद की जाती है।
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भोपा क्षेत्र के गांव मोरना में शुकतीर्थ मार्ग पर पिछले 25 वर्षों से भी अधिक समय से डेव जाति के लगभग 10 परिवार रहते हैं। उनका कार्य छाज (अनाज फटकने का सींकों आदि से बना एक उपकरण) बनाकर उन्हें गांव-गांव जाकर बेचना है। मुकेश, बबलू, श्रीचंद, सुधा, देवी, अजय आदि का कहना है कि उनका कार्य जंगलों से लकड़ी (सींक) लाकर प्लास्टिक की डोरी व बांस आदि के माध्यम से उन्हें तैयार कर बेचना है। उसी से उनका परिवार चलता है। गेहूं कटाई के समय छाज का प्रयोग अधिक किया जाता है, इसलिए उन्हें इस सीजन में काफी उम्मीद रहती है लेकिन लॉकडाउन के चलते वे गांव में फेरी आदि नहीं लगा पा रहे। उनके सामने रोजी-रोटी का संकट है। उनके पास आवास नहीं है, शौचालय भी खुले में जाना पड़ता है। परिवार के दो लोग मिलकर दो दिन में लगभग पांच-छह छाज तैयार कर देते हैं। एक छाज की कीमत 80 से 100 रुपये तक मिल जाती है। लॉकडाउन के चलते छाज बनाने के लिए उन्हें बांस व प्लास्टिक की डोरी भी नहीं मिल पा रही है। इससे भी उन्हें काफी दिक्कत उठानी पड़ रही है।
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एडीओ सीपी सिंह शर्मा का कहना है कि उनके पास अपनी कोई भूमि नहीं होने से उन्हें आवास नहीं मिल सकते, न ही शौचालय बनाए जा सकते हैं। ग्राम पंचायतों में सार्वजनिक शौचालय का प्रस्ताव भेजा गया है। ग्राम पंचायत स्तर पर जो मदद संभव है वह दी जा रही है। प्रधान पति शहजाद अंसारी का कहना है कि राशन की दुकान से परिवारों को राशन वितरण किया जाता है। ग्राम पंचायत स्तर पर भी हर संभव मदद की जाती है।
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