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श्रद्धालुओं ने सिद्धपीठ भैरव बाबा की पिंडी पर मत्था टेका 16-48-46
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श्रद्धालुओं ने भैरव बाबा की पिंडी पर मत्था टेका
चरथावल। आस्था और विश्वास की प्रतीक सिद्धपीठ बटुक भैरव बाबा की पावन पिंडी पर कस्बे के श्रद्धालुओं ने मत्था टेका। सिंदूर और सरसों के तेल से बाबा की पिंडी का श्रृंगार किया गया। आषाढ़ महीने के अंतिम शनिवार को भैरव मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी।
बुजुर्गों के मुताबिक काशी के बाद चरथावल में बाबा बटुक भैरव की स्वत: उत्पत्ति वाली पिंडी की मान्यता है। कस्बे के अलावा आसपास गांवों से काफी संख्या में श्रद्धालुओं ने मंदिर में मत्था टेका। पुजारी फूल सिंह ने विधिवत पूजा-अर्चना कराई। मंदिर प्रांगण में बनी मजार सौहार्द की प्रतीक है। मजार पर लोगों ने चादर और प्रसाद चढ़ाई और मन्नत मांगी। इस मौके पर अनुज गर्ग, श्रीराम गुप्ता, पप्पू कंसल का सहयोग रहा।
दूसरी ओर, कस्बे के बाहरी छोर पर खुसरोपुर मार्ग स्थित ग्राम देवता के रूप में विख्यात भूमिया खेड़ा पर परंपरागत पूजा अर्चना की गई। दिन निकलते ही यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लग गई। श्रद्धालुओं में खासकर महिलाओं ने शाम तक ग्राम देवता पर पीली चादर, दूध और प्रसाद चढ़ाया। हर साल आषाढ़ मास के अंतिम शनिवार को भूमियाखेड़ा पर पूजन की पुरातन परंपरा है। मान्यता है कि परिवार की उन्नति और गांव की रक्षा एवं खुशहाली के लिए साल भर में आषाढ़ महीने के दो शिनवार को भूमियाखेड़ा पर श्रद्धालुओं का मेला लगता है। इसी परिसर में ब्रह्माजी का स्थान भी है। पंडित सुभाष चंद शर्मा बताते हैं कि पुष्कर के बाद चरथावल मे ब्रह्माजी का वास है। इस मौके पर आदेश शर्मा, सुभाष चंद आदि का सहयोग रहा।
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चरथावल। आस्था और विश्वास की प्रतीक सिद्धपीठ बटुक भैरव बाबा की पावन पिंडी पर कस्बे के श्रद्धालुओं ने मत्था टेका। सिंदूर और सरसों के तेल से बाबा की पिंडी का श्रृंगार किया गया। आषाढ़ महीने के अंतिम शनिवार को भैरव मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी।
बुजुर्गों के मुताबिक काशी के बाद चरथावल में बाबा बटुक भैरव की स्वत: उत्पत्ति वाली पिंडी की मान्यता है। कस्बे के अलावा आसपास गांवों से काफी संख्या में श्रद्धालुओं ने मंदिर में मत्था टेका। पुजारी फूल सिंह ने विधिवत पूजा-अर्चना कराई। मंदिर प्रांगण में बनी मजार सौहार्द की प्रतीक है। मजार पर लोगों ने चादर और प्रसाद चढ़ाई और मन्नत मांगी। इस मौके पर अनुज गर्ग, श्रीराम गुप्ता, पप्पू कंसल का सहयोग रहा।
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दूसरी ओर, कस्बे के बाहरी छोर पर खुसरोपुर मार्ग स्थित ग्राम देवता के रूप में विख्यात भूमिया खेड़ा पर परंपरागत पूजा अर्चना की गई। दिन निकलते ही यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लग गई। श्रद्धालुओं में खासकर महिलाओं ने शाम तक ग्राम देवता पर पीली चादर, दूध और प्रसाद चढ़ाया। हर साल आषाढ़ मास के अंतिम शनिवार को भूमियाखेड़ा पर पूजन की पुरातन परंपरा है। मान्यता है कि परिवार की उन्नति और गांव की रक्षा एवं खुशहाली के लिए साल भर में आषाढ़ महीने के दो शिनवार को भूमियाखेड़ा पर श्रद्धालुओं का मेला लगता है। इसी परिसर में ब्रह्माजी का स्थान भी है। पंडित सुभाष चंद शर्मा बताते हैं कि पुष्कर के बाद चरथावल मे ब्रह्माजी का वास है। इस मौके पर आदेश शर्मा, सुभाष चंद आदि का सहयोग रहा।
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