{"_id":"607730db8ebc3ec44553069b","slug":"a-person-who-does-not-stop-from-evils-will-not-be-fasted-ulama-devband-news-mrt534491218","type":"story","status":"publish","title_hn":"रमजान माह पर विशेष... बुराइयों से न रूकने वाले का रोजा रोजा नहीं , फाका होगा : उलमा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
रमजान माह पर विशेष... बुराइयों से न रूकने वाले का रोजा रोजा नहीं , फाका होगा : उलमा
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देवबंद(सहारनपुर)। रोजा क्या है, रोजेदार को किन बातों का ख्याल रखना चाहिए और रोजेदार को किन चीजों का ख्याल रखना चाहिए। दारुल उलूम फारुकिया के मोहतमिम मौलाना नूरुलहुदा कासमी ने इस पर प्रकाश डालते हुए कहा कि रमजान का महीना मुसलमानों के लिए बेहद खास होता है। इसमें अल्लाह ताआला अपने बंदों पर रहमतें और बरकतें नाजिल फरमाता है।
मौलाना नूरुलहुदा कासमी ने कहा कि रमजान मुबारक महीना है और अल्लाह ने रमजान के रोजे फर्ज किए हैं। जिनका बहुत सवाब है। नमाज, हज, जकात के साथ रोजा भी अहम फर्ज है। इस माह की बहुत बरकतें हैं जो अल्लाह अपने बंदों को अता करता है। उन्होंने कहा कि रोजा नाम है, सुबह से शाम तक खाने पीने से परहेज करने, भूख प्यास बर्दाश्त करने, झूठ न बोलने, धोखा न देने, गाली न देने, गुस्सा और बेईमानी न करने आदि का। जो आदमी सुबह से शाम तक भूखा रहे, लेकिन झूठ बोलना न छोड़े, और वो बुरे काम करता रहे, नमाज न पढ़े तो उसका रोजा रोजा नहीं बल्कि फाका है जो अल्लाह को पसंद नहीं है।
मौलाना नूरुलहुदा ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसी मजबूरी की वजह से रोजा नहीं रख पा रहा है, इसकी इजाजत शरीयत में दी हुई है तो ऐसे आदमी को चाहिए कि वह खुलेआम खाना पीना न करें, रोजेदारों का अहतराम (इज्जत) करें। जो आदमी जानबूझकर रोजा नहीं रखता वो बड़ा गुनाहगार है। उसको या तो लगातार 60 रोजे रखने होंगे या फिर 60 आदमियों को खाना खिलाना होगा। साथ ही कहा कि यदि कोई मजबूरी में रोजा छोड़ता है तो रमजान के बाद उसे छोड़े हुए रोजे रखने होंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन
मौलाना नूरुलहुदा कासमी ने कहा कि रमजान मुबारक महीना है और अल्लाह ने रमजान के रोजे फर्ज किए हैं। जिनका बहुत सवाब है। नमाज, हज, जकात के साथ रोजा भी अहम फर्ज है। इस माह की बहुत बरकतें हैं जो अल्लाह अपने बंदों को अता करता है। उन्होंने कहा कि रोजा नाम है, सुबह से शाम तक खाने पीने से परहेज करने, भूख प्यास बर्दाश्त करने, झूठ न बोलने, धोखा न देने, गाली न देने, गुस्सा और बेईमानी न करने आदि का। जो आदमी सुबह से शाम तक भूखा रहे, लेकिन झूठ बोलना न छोड़े, और वो बुरे काम करता रहे, नमाज न पढ़े तो उसका रोजा रोजा नहीं बल्कि फाका है जो अल्लाह को पसंद नहीं है।
विज्ञापन
मौलाना नूरुलहुदा ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी ऐसी मजबूरी की वजह से रोजा नहीं रख पा रहा है, इसकी इजाजत शरीयत में दी हुई है तो ऐसे आदमी को चाहिए कि वह खुलेआम खाना पीना न करें, रोजेदारों का अहतराम (इज्जत) करें। जो आदमी जानबूझकर रोजा नहीं रखता वो बड़ा गुनाहगार है। उसको या तो लगातार 60 रोजे रखने होंगे या फिर 60 आदमियों को खाना खिलाना होगा। साथ ही कहा कि यदि कोई मजबूरी में रोजा छोड़ता है तो रमजान के बाद उसे छोड़े हुए रोजे रखने होंगे।
विज्ञापन