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जहरीला जाम पीने वालों को मुंह चिढ़ाता मिरगपुर गांव
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देवबंद (सहारनपुर)। जहां लोग जहरीला जाम पीकर अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं, वहीं देवबंद का अकेला मिरगपुर गांव ऐसा है जो नशामुक्त है और बाबा फकीरादास द्वारा दी गई प्रतिज्ञा पर अडिग है। इसलिए गांव के लोग बाबा को अपना भगवान मानकर उनकी पूजा करते हैं।
मिरगपुर के ग्रामीणों की माने तो करीब 450 वर्ष पूर्व जहांगीर के शासनकाल में बाबा फकीरादास पंजाब से मिरगपुर गांव में आए थे। उस समय एक झगड़े में गांव के करीब पांच लोग दिल्ली जेल में बंद थे। बाबा ने उक्त लोगों को जेल से इस शर्त पर रिहा कराया था कि गांव का कोई भी व्यक्ति कभी धूम्रपान नहीं करेगा। साथ ही मांसाहार से भी सदैव परहेज रखेगा। तब पूरे गांव ने श्रद्धापूर्वक बाबा की शर्त को आज्ञा के रूप में स्वीकार कर प्रतिज्ञा की थी। बाबा ने 52 तामसी वस्तुओं इनमें अंडा, प्याज, लहसुन, शलगम, सिरका, बीड़ी, सिगरेट, भांग, शराब, अफीम आदि से परहेज रखने की ग्रामीणों को शपथ दिलाई थी। महंत मनोहर दास ने बताया कि गुरु बाबा फकीरादास के बताए नियमों को अपना धर्म मानकर गांव के लोग पालन करते आ रहे हैं। मिरगपुर के लोग अपने प्राण त्याग सकते हैं परंतु बाबा के बताए नियमों को नहीं तोड़ सकते हैं। उन्होंने बताया कि बाबा की सिद्धकुटी पर प्रतिवर्ष मेला आयोजित किया जाता है। जिसमें यूपी ही नहीं उत्तराखंड से भी बड़ी संख्या में बाबा के भक्तजन पहुंचते हैं। मेले को ग्रामीण होली व दीपावली की तरह मनाते हैं।
ग्रामीण चौधरी ओमपाल सिंह ने बताया कि बाबा फकीरादास पंजाब के जिला संगरूर के गांव घरांचों से मिरगरपुर गांव में जहांगीर के शासनकाल में आए थे। बाबा को दूध पीने की इच्छा हुई तो एक बिना ब्याही कटड़ी को देखकर बोले इसका दूध निकालो। तब लोगों ने कहा कि यह दूध कैसे देगी। इस पर बाबा ने कहा दूध निकालना शुरू करो। तब बिन ब्याही कटड़ी ने दूध देना शुरू किया तो गांव के लोगों ने उसे बाबा का चमत्कार माना, लेकिन तब लोगों ने कहा कि हमारे पांच आदमी दिल्ली जेल में बंद हैं उन्हें छुड़ाकर दिखाओ तब ही हम चमत्कार मानेंगे। ऐसा ही हुआ। बाबा ने अपना शरीर मिरगपुर में छोड़ दिया और पांच लोगों को जेल से रिहा कराकर वापस शरीर में लौट आए। जिससे लोगों को बाबा के चमत्कार पर यकीन हो गया।
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सहकारी गन्ना समिति के पूर्व चेयरमैन चौधरी प्रविंदर सिंह ने बताया कि बाबा फकीदास की तपोस्थली पर प्रतिवर्ष भव्य आयोजित किया जाता है। इस दिन ग्रामीणों के सभी रिश्तेदार मेले में शरीक होते हैं।
ग्रामीण सुंदर सिंह ने बताया कि मिरगपुर के लोग मेले को त्योहार की तरह मनाते हैं। रिश्तेदार भी इस दिन गांव पहुंचकर सिद्धकुटी पर प्रसाद चढ़ाकर मेले का आनंद उठाते हैं। उन्होंने बताया कि जहां लोग जहरीली शराब पीकर अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं वहीं मिरगपुर उन गांवों के लिए आज भी मिसाल बना हुआ है।
ग्रामीण रफल सिंह कहते हैं प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास की पहली दशमी तिथि को प्राचीन गुरुद्वारा (सिद्धकुटी) पर मेला लगता है। वार्षिक मेले के दिन प्रत्येक घर में देशी घी का हलवा व पेडे़ का प्रसाद बांटा जाता है। सुबह के समय बाबा की समाधि स्थल पर हवन पूजन किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालुओं की प्रसाद चढ़ाने को भीड़ लग जाती है।
बन चुकी है डाक्युमेंट्री
गांव मिरगपुर को नशामुक्त घोषित किए जाने पर पुरस्कृत भी किया जा चुका है। साथ ही इस गांव की परंपरा और नशामुक्ति को लेकर प्रतिज्ञा का पालन करने को लेकर डाक्युमेंट्री भी बन चुकी है। जिसको नाम दिया गया था एक अजूबा। यह डाक्युमेंट्री 1990 में बनाई गई थी। इस डाक्युमेंट्री के निर्माता चौधरी विरेंद्र सिंह ने बताया कि डाक्युमेंट्री के डायरेक्टर बीबीसी के पूर्व पत्रकार थे।
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मिरगपुर के ग्रामीणों की माने तो करीब 450 वर्ष पूर्व जहांगीर के शासनकाल में बाबा फकीरादास पंजाब से मिरगपुर गांव में आए थे। उस समय एक झगड़े में गांव के करीब पांच लोग दिल्ली जेल में बंद थे। बाबा ने उक्त लोगों को जेल से इस शर्त पर रिहा कराया था कि गांव का कोई भी व्यक्ति कभी धूम्रपान नहीं करेगा। साथ ही मांसाहार से भी सदैव परहेज रखेगा। तब पूरे गांव ने श्रद्धापूर्वक बाबा की शर्त को आज्ञा के रूप में स्वीकार कर प्रतिज्ञा की थी। बाबा ने 52 तामसी वस्तुओं इनमें अंडा, प्याज, लहसुन, शलगम, सिरका, बीड़ी, सिगरेट, भांग, शराब, अफीम आदि से परहेज रखने की ग्रामीणों को शपथ दिलाई थी। महंत मनोहर दास ने बताया कि गुरु बाबा फकीरादास के बताए नियमों को अपना धर्म मानकर गांव के लोग पालन करते आ रहे हैं। मिरगपुर के लोग अपने प्राण त्याग सकते हैं परंतु बाबा के बताए नियमों को नहीं तोड़ सकते हैं। उन्होंने बताया कि बाबा की सिद्धकुटी पर प्रतिवर्ष मेला आयोजित किया जाता है। जिसमें यूपी ही नहीं उत्तराखंड से भी बड़ी संख्या में बाबा के भक्तजन पहुंचते हैं। मेले को ग्रामीण होली व दीपावली की तरह मनाते हैं।
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ग्रामीण चौधरी ओमपाल सिंह ने बताया कि बाबा फकीरादास पंजाब के जिला संगरूर के गांव घरांचों से मिरगरपुर गांव में जहांगीर के शासनकाल में आए थे। बाबा को दूध पीने की इच्छा हुई तो एक बिना ब्याही कटड़ी को देखकर बोले इसका दूध निकालो। तब लोगों ने कहा कि यह दूध कैसे देगी। इस पर बाबा ने कहा दूध निकालना शुरू करो। तब बिन ब्याही कटड़ी ने दूध देना शुरू किया तो गांव के लोगों ने उसे बाबा का चमत्कार माना, लेकिन तब लोगों ने कहा कि हमारे पांच आदमी दिल्ली जेल में बंद हैं उन्हें छुड़ाकर दिखाओ तब ही हम चमत्कार मानेंगे। ऐसा ही हुआ। बाबा ने अपना शरीर मिरगपुर में छोड़ दिया और पांच लोगों को जेल से रिहा कराकर वापस शरीर में लौट आए। जिससे लोगों को बाबा के चमत्कार पर यकीन हो गया।
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सहकारी गन्ना समिति के पूर्व चेयरमैन चौधरी प्रविंदर सिंह ने बताया कि बाबा फकीदास की तपोस्थली पर प्रतिवर्ष भव्य आयोजित किया जाता है। इस दिन ग्रामीणों के सभी रिश्तेदार मेले में शरीक होते हैं।
ग्रामीण सुंदर सिंह ने बताया कि मिरगपुर के लोग मेले को त्योहार की तरह मनाते हैं। रिश्तेदार भी इस दिन गांव पहुंचकर सिद्धकुटी पर प्रसाद चढ़ाकर मेले का आनंद उठाते हैं। उन्होंने बताया कि जहां लोग जहरीली शराब पीकर अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं वहीं मिरगपुर उन गांवों के लिए आज भी मिसाल बना हुआ है।
ग्रामीण रफल सिंह कहते हैं प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास की पहली दशमी तिथि को प्राचीन गुरुद्वारा (सिद्धकुटी) पर मेला लगता है। वार्षिक मेले के दिन प्रत्येक घर में देशी घी का हलवा व पेडे़ का प्रसाद बांटा जाता है। सुबह के समय बाबा की समाधि स्थल पर हवन पूजन किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालुओं की प्रसाद चढ़ाने को भीड़ लग जाती है।
बन चुकी है डाक्युमेंट्री
गांव मिरगपुर को नशामुक्त घोषित किए जाने पर पुरस्कृत भी किया जा चुका है। साथ ही इस गांव की परंपरा और नशामुक्ति को लेकर प्रतिज्ञा का पालन करने को लेकर डाक्युमेंट्री भी बन चुकी है। जिसको नाम दिया गया था एक अजूबा। यह डाक्युमेंट्री 1990 में बनाई गई थी। इस डाक्युमेंट्री के निर्माता चौधरी विरेंद्र सिंह ने बताया कि डाक्युमेंट्री के डायरेक्टर बीबीसी के पूर्व पत्रकार थे।