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न मंदिरों में मृदंग बजते, न मस्जिदों में अजान होती
Updated Mon, 11 Jun 2018 12:19 AM IST
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न मंदिरों में मृदंग बजते, न मस्जिदों में अजान होती...
मुजफ्फरनगर। जिला कृषि एवं औद्योगिक प्रदर्शनी में कवि सम्मेलन में रचनाकारों ने अपने भावों को रचना में पेश किया। सामाजिक कुरीतियों पर जहां जमकर प्रहार हुआ, वहीं ज्वलंत समस्याओं को कवियों ने अपनी दृष्टि से देखा।
प्रदर्शनी पंडाल में कवि सम्मेलन का शुभारंभ एडीएम प्रशासन हरीशचंद्र, डीएसओ सुनील कुमार पुष्कर, एलपीजी के जिले के नोडल अधिकारी अभिषेक कुमार ने दीप प्रज्वलित कर किया। संचालन हास्य और करुणा के कवि नेमपाल प्रजापति ने किया। माटी की घटती उर्वरा शक्ति पर कवि अरुण अकेला ने रचना पढ़ी कि माटी को निर्जीव न समझो माटी जीवित सोना है, जिसको पाना समझ रहे हो वो तो केवल खोना है। सुशीला शर्मा ने कहा-धुंध के उस पार एक दिया सा जला है, चीरकर अंधेरे मन गगन उड़ चला है। युवा कवि अमित धर्म सिंह ने श्रृंगार रस की रचना पढ़ी- अपने प्रेम की देखो, इतनी सी कहानी है। मैं भी कुछ दिवाना हूं, वो भी कुछ दिवानी है। एडीएम प्रशासन हरीशचंद ने भी काव्य पाठ किया। उन्होंने कवि भारत भूषण की प्रसिद्ध रचना गीत (पाप) गाकर सुनाया-न जन्म लेता अगर कहीं मै धरा बनी ये मसान होती। न मंदिरों में मृदंग बजते, न मस्जिदों में अजान होती। नेमपाल प्रजापति ने कहा- हाजमा ठीक हो तो पेट के आगे गोदाम भी छोटा पड़ जाता है। ओंकार गुलशन ने पढा- वो देखने तक मुझे आया नहीं। कैसे कह दूं कि पराया नहीं। दिव्या श्रीवास्तव ने बेटियों पर काव्य पाठ किया, रूपा चौधरी ने पद्मावती पर रचना पढ़ी। सुनील उत्सव ने राजनीति पर कटाक्ष किया। रामकुमार रागी ने हास्य व्यंग्य की रचनाएं पढ़ी। वीरेंद्र मुधुर ने पढ़ा- मुड़के देखते है वो मुझको, मेरे खत का जवाब हो जैसे। अंकित दीप, प्रतिभा त्रिपाठी ने भी काव्य पाठ किया।
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मुजफ्फरनगर। जिला कृषि एवं औद्योगिक प्रदर्शनी में कवि सम्मेलन में रचनाकारों ने अपने भावों को रचना में पेश किया। सामाजिक कुरीतियों पर जहां जमकर प्रहार हुआ, वहीं ज्वलंत समस्याओं को कवियों ने अपनी दृष्टि से देखा।
प्रदर्शनी पंडाल में कवि सम्मेलन का शुभारंभ एडीएम प्रशासन हरीशचंद्र, डीएसओ सुनील कुमार पुष्कर, एलपीजी के जिले के नोडल अधिकारी अभिषेक कुमार ने दीप प्रज्वलित कर किया। संचालन हास्य और करुणा के कवि नेमपाल प्रजापति ने किया। माटी की घटती उर्वरा शक्ति पर कवि अरुण अकेला ने रचना पढ़ी कि माटी को निर्जीव न समझो माटी जीवित सोना है, जिसको पाना समझ रहे हो वो तो केवल खोना है। सुशीला शर्मा ने कहा-धुंध के उस पार एक दिया सा जला है, चीरकर अंधेरे मन गगन उड़ चला है। युवा कवि अमित धर्म सिंह ने श्रृंगार रस की रचना पढ़ी- अपने प्रेम की देखो, इतनी सी कहानी है। मैं भी कुछ दिवाना हूं, वो भी कुछ दिवानी है। एडीएम प्रशासन हरीशचंद ने भी काव्य पाठ किया। उन्होंने कवि भारत भूषण की प्रसिद्ध रचना गीत (पाप) गाकर सुनाया-न जन्म लेता अगर कहीं मै धरा बनी ये मसान होती। न मंदिरों में मृदंग बजते, न मस्जिदों में अजान होती। नेमपाल प्रजापति ने कहा- हाजमा ठीक हो तो पेट के आगे गोदाम भी छोटा पड़ जाता है। ओंकार गुलशन ने पढा- वो देखने तक मुझे आया नहीं। कैसे कह दूं कि पराया नहीं। दिव्या श्रीवास्तव ने बेटियों पर काव्य पाठ किया, रूपा चौधरी ने पद्मावती पर रचना पढ़ी। सुनील उत्सव ने राजनीति पर कटाक्ष किया। रामकुमार रागी ने हास्य व्यंग्य की रचनाएं पढ़ी। वीरेंद्र मुधुर ने पढ़ा- मुड़के देखते है वो मुझको, मेरे खत का जवाब हो जैसे। अंकित दीप, प्रतिभा त्रिपाठी ने भी काव्य पाठ किया।
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