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फतवा फैक्टरी बनकर रह गया है दारुल उलूम : फरहा फैज
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देवबंद (सहारनपुर)। सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता व तीन तलाक की मुख्य याचिकाकर्ता फरहा फैज ने फतवों को लेकर एक बार फिर से दारुल उलूम पर निशाना साधा है। फराह फैज ने कहा कि दारुल उलूम फतवा फैक्टरी बनकर रह गया है। जिसका काम केवल औरतों की जिंदगी को दुश्वार करने के लिए फतवे जारी करना रह गया है।
दारुल उलूम से जारी होने वाले फतवों को लेकर बृहस्पतिवार को फरहा फैज ने कहा कि दारुल उलूम मुस्लिम औरतों की जिंदगी को लेकर, तीन तलाक, महिलाओं के खानपान, वेशभूषा और कभी उनकी पढ़ाई को लेकर फतवा जारी करता है। हद तो यह हो गई कि उन्होंने अपना काम छोड़कर मुसलमान औरतों की जिंदगी को कैसा दुश्वार बनाया जा सके इसके लिए रोजाना फतवा जारी किया जा रहा है, जिससे इनका रौब कायम रह सके। फरहा फैज ने कहा कि दारुल उलूम की बुनियाद इस्लाम मजहब और मुसलमानों की तरक्की के लिए रखी गई थी, लेकिन आज दारुल उलूम मुसलमानों की जिंदगी को तबाह करने के अलावा कोई काम नहीं कर रहा है। इसके साथ ही फरहा फैज ने केंद्र व राज्य सरकार पर भी निशाना साधते हुए कहा कि यह वो सरकारें हैं जो महिला सशक्तिकरण की बात करती हैं, लेकिन मुस्लिम महिला सशक्तिकरण की तरफ देखने को तैयार नहीं हैं। मुस्लिम महिला किस तरह जी रही है, तीन तलाक के नाम पर वह क्या क्या झेल रही है, कैसे वह इन कट्टरपंथियों का सामना कर रही हैं और कैसे वो कोर्ट कचहरी के धक्के खा रही हैं। इसके लिए उन्होंने बार बार मिलने की कोशिश की, लेकिन इस सरकार के पास, मुख्यमंत्री के पास और अधिकारियों के पास हम लोगों से मिलने का वक्त ही नहीं है।
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दारुल उलूम से जारी होने वाले फतवों को लेकर बृहस्पतिवार को फरहा फैज ने कहा कि दारुल उलूम मुस्लिम औरतों की जिंदगी को लेकर, तीन तलाक, महिलाओं के खानपान, वेशभूषा और कभी उनकी पढ़ाई को लेकर फतवा जारी करता है। हद तो यह हो गई कि उन्होंने अपना काम छोड़कर मुसलमान औरतों की जिंदगी को कैसा दुश्वार बनाया जा सके इसके लिए रोजाना फतवा जारी किया जा रहा है, जिससे इनका रौब कायम रह सके। फरहा फैज ने कहा कि दारुल उलूम की बुनियाद इस्लाम मजहब और मुसलमानों की तरक्की के लिए रखी गई थी, लेकिन आज दारुल उलूम मुसलमानों की जिंदगी को तबाह करने के अलावा कोई काम नहीं कर रहा है। इसके साथ ही फरहा फैज ने केंद्र व राज्य सरकार पर भी निशाना साधते हुए कहा कि यह वो सरकारें हैं जो महिला सशक्तिकरण की बात करती हैं, लेकिन मुस्लिम महिला सशक्तिकरण की तरफ देखने को तैयार नहीं हैं। मुस्लिम महिला किस तरह जी रही है, तीन तलाक के नाम पर वह क्या क्या झेल रही है, कैसे वह इन कट्टरपंथियों का सामना कर रही हैं और कैसे वो कोर्ट कचहरी के धक्के खा रही हैं। इसके लिए उन्होंने बार बार मिलने की कोशिश की, लेकिन इस सरकार के पास, मुख्यमंत्री के पास और अधिकारियों के पास हम लोगों से मिलने का वक्त ही नहीं है।
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