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भक्ति स्वयं प्रमाण रुप है-महाराज
Updated Sat, 07 Jul 2018 12:13 AM IST
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मोरना। शुक्रताल के दंडी आश्रम में ब्रह्मलीन स्वामी गोविंदाश्रम महाराज की पुण्यतिथि पर आयोजित भागवत कथा में प्रयाग से पधारे कथा व्यास सर्वेशप्रापन्नाचार्य महाराज ने कहा कि भक्ति स्वयं प्रमाणरुप है, इसके लिए अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है।
उन्होंने कहा कि कुछ लोग तो ईश्वर को मानते ही नहीं, जिसकी जैसी बुद्धि है, ये संसार उसके लिए वैसा ही है। जब तक भक्ति में सिद्धि न मिले, तब तक लोक व्यवहार का त्याग नहीं करना चाहिए। फल त्याग कर निष्काम भाव से उस भक्ति का साधन करना चाहिए। आकाश अमृत बरसाता है। प्रेमा भक्ति की प्राप्ति के लिए भक्ति शास्त्र को मनन करते रहना चाहिए और ऐसे कर्म करते रहने चाहिए, जिनमें भक्ति की वृद्धि हो। भक्ति का साधन ज्ञान है, भक्ति और ज्ञान परस्पर एक दूसरे के आश्रित हैं। संसार के बंधन से मुक्त होने की इच्छा रखने वालों को भक्ति को ग्रहण करने से मानव जीवन से मुक्ति मिलती है। इस मौके पर ब्रह्मचारी स्वामी गुरुदत्त महाराज ने कथा का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलित कर किया। कथा के आयोजन में अवस्थी महाराज, मनोहर शर्मा, गोपाल, रामफल मलिक, विनोद शर्मा चेयरमैन आदि व्यवस्था बनाने में लगे हुए हैं।
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उन्होंने कहा कि कुछ लोग तो ईश्वर को मानते ही नहीं, जिसकी जैसी बुद्धि है, ये संसार उसके लिए वैसा ही है। जब तक भक्ति में सिद्धि न मिले, तब तक लोक व्यवहार का त्याग नहीं करना चाहिए। फल त्याग कर निष्काम भाव से उस भक्ति का साधन करना चाहिए। आकाश अमृत बरसाता है। प्रेमा भक्ति की प्राप्ति के लिए भक्ति शास्त्र को मनन करते रहना चाहिए और ऐसे कर्म करते रहने चाहिए, जिनमें भक्ति की वृद्धि हो। भक्ति का साधन ज्ञान है, भक्ति और ज्ञान परस्पर एक दूसरे के आश्रित हैं। संसार के बंधन से मुक्त होने की इच्छा रखने वालों को भक्ति को ग्रहण करने से मानव जीवन से मुक्ति मिलती है। इस मौके पर ब्रह्मचारी स्वामी गुरुदत्त महाराज ने कथा का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलित कर किया। कथा के आयोजन में अवस्थी महाराज, मनोहर शर्मा, गोपाल, रामफल मलिक, विनोद शर्मा चेयरमैन आदि व्यवस्था बनाने में लगे हुए हैं।
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