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शक्ति का संग्रह करो आप सुखी हो जाओगो-महाराज
Updated Fri, 11 May 2018 12:16 AM IST
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शक्ति का संग्रह करो आप सुखी हो जाओगो : स्वामी
मोरना। शुक्रताल हनुमतधाम में चल रही साप्ताहिक भागवत कथा के तीसरे दिन कथावाचक स्वामी किरीट भाई महाराज ने कहा कि मृत्यु के भय को भागवत दूर करती है। वंदन जो मांगता है, वह वैष्णव नहीं है। वंदन जो देता है, वही वैष्णव है। ज्ञान से शांति मिलती है। जहां धर्म वहां धरती सब कुछ देती है। जहां धर्म नहीं वहां धरती मां सबकुछ निगल जाती है। कथाओं के सुनने के बाद भी जो पाप करेगा, उसको बहुत सजा होगी। तप करने से शक्ति बढ़ती है। शक्ति का संग्रह करो आप सुखी हो जाओगे।
कथावाचक ने कहा कि विचार कर्म की जननी है। जीव को ऐसे विचार नहीं आने चाहिए जो क्रियान्वयन न हो सके। जिसका मन पवित्र होगा उसके विचार भी पवित्र होंगे। मन पवित्र सत्संग से होता है। जब पाप बढ़ता है तो स्याना भी मूर्ख बन जाता है। मानव कल्याण के लिए साधक भजन कीर्तन को बढ़ाए। जीव को रोटी, लंगोटी की चिंता रहती है, परमात्मा ने इसकी व्यवस्था कर रखी है। अधिकारी शिष्य को गुरु अपने आप मिलते है। विवाह के बिना वासना का विनाश नहीं हो सकता है। तीर्थ में पहुंचकर दंडवत प्रणाम कर प्रवेश करें। विवाद से बचे, जिनकी संगति में आने से परमात्मा की याद आए उनकी संगति अवश्य लें। निंदा, निंद्रा मानव की भक्ति में बाधक है। तृष्णा जीव को बार-बार सताती है। तीव्र तृष्णा ही वासना है। वासना से जीव का जन्म होता है और भागवत कथा से सुनने से मानव का मरण सुधरता है। जगत मिथ्या है, यह बोलना सरल है। किंतु जगत मिथ्या है यह समझना कठिन है। संसार का सुख मानव को जब तक मीठा लगता है, तब तक शरीर से भिन्न आत्मा का दर्शन नहीं होता है। कथा को सुनने के लिए महाराष्ट्र बिहार, राजस्थान हरियाणा, दिल्ली, पंजाब आदि जगहों से श्रद्धालु धर्म लाभ उठा रहे हैं।
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मोरना। शुक्रताल हनुमतधाम में चल रही साप्ताहिक भागवत कथा के तीसरे दिन कथावाचक स्वामी किरीट भाई महाराज ने कहा कि मृत्यु के भय को भागवत दूर करती है। वंदन जो मांगता है, वह वैष्णव नहीं है। वंदन जो देता है, वही वैष्णव है। ज्ञान से शांति मिलती है। जहां धर्म वहां धरती सब कुछ देती है। जहां धर्म नहीं वहां धरती मां सबकुछ निगल जाती है। कथाओं के सुनने के बाद भी जो पाप करेगा, उसको बहुत सजा होगी। तप करने से शक्ति बढ़ती है। शक्ति का संग्रह करो आप सुखी हो जाओगे।
कथावाचक ने कहा कि विचार कर्म की जननी है। जीव को ऐसे विचार नहीं आने चाहिए जो क्रियान्वयन न हो सके। जिसका मन पवित्र होगा उसके विचार भी पवित्र होंगे। मन पवित्र सत्संग से होता है। जब पाप बढ़ता है तो स्याना भी मूर्ख बन जाता है। मानव कल्याण के लिए साधक भजन कीर्तन को बढ़ाए। जीव को रोटी, लंगोटी की चिंता रहती है, परमात्मा ने इसकी व्यवस्था कर रखी है। अधिकारी शिष्य को गुरु अपने आप मिलते है। विवाह के बिना वासना का विनाश नहीं हो सकता है। तीर्थ में पहुंचकर दंडवत प्रणाम कर प्रवेश करें। विवाद से बचे, जिनकी संगति में आने से परमात्मा की याद आए उनकी संगति अवश्य लें। निंदा, निंद्रा मानव की भक्ति में बाधक है। तृष्णा जीव को बार-बार सताती है। तीव्र तृष्णा ही वासना है। वासना से जीव का जन्म होता है और भागवत कथा से सुनने से मानव का मरण सुधरता है। जगत मिथ्या है, यह बोलना सरल है। किंतु जगत मिथ्या है यह समझना कठिन है। संसार का सुख मानव को जब तक मीठा लगता है, तब तक शरीर से भिन्न आत्मा का दर्शन नहीं होता है। कथा को सुनने के लिए महाराष्ट्र बिहार, राजस्थान हरियाणा, दिल्ली, पंजाब आदि जगहों से श्रद्धालु धर्म लाभ उठा रहे हैं।
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