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‘कल्याणदेव के दर्शन से प्रेरित थे सत्यमित्रानंद’
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‘कल्याणदेव के दर्शन से प्रेरित थे सत्यमित्रानंद’
मुजफ्फरनगर। हरिद्वार में भारत माता मंदिर के संस्थापक महामंडलेश्वर एवं निवृत्तमान शंकराचार्य स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि के महाप्रयाण से शुकतीर्थ के संत- महात्माओं में शोक की लहर है। शुकतीर्थ के जीर्णोद्धारक, वीतराग स्वामी कल्याणदेव के प्रति स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि का आत्मिक स्नेही भाव था। हरिद्वार में भारत माता मंदिर की स्थापना को लेकर संतद्वय के बीच मंत्रणा हुई थी। भागवत की धरा से भी ब्रह्मलीन गिरि की अनेक अमिट यादें जुड़ी हैं।
पद्मभूषण से अलंकृत स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि वीतराग संत स्वामी कल्याणदेव के विरक्त सेवाभाव जीवन दर्शन से बेहद प्रभावित थे। हरिद्वार के गीता भवन में भिक्षु गीतानंद के यहां शिक्षा ऋषि शुकतीर्थ से जाकर प्रवास करते थे। वहीं गिरि ने पहली बार संत विभूति के दर्शन किए। हरिद्वार में भारत माता मंदिर बनाने को लेकर पूर्व शंकराचार्य शुकदेव आश्रम में पधारे और स्वामी जी से भेंट की। शिक्षा ऋषि ने उन्हें राय दी कि हरिद्वार में संस्कृत यूनिवर्सिटी बनाए। भागवत पीठ शुकदेव आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद बताते हैं कि कई वर्ष तक योजना लंबित रही। वर्ष 1983 में पूज्य गिरि ने भारत माता मंदिर की स्थापना की। अनेक बार गुरुदेव को अपने धार्मिक कार्यक्रमों में बुलाया। तीन सदी के युगदृष्टा ग्रंथ में महामंडलेश्वर ने कर्मयोगी संत के प्रति अपने भाव को लिपिबद्ध किया है। वर्ष 2004 में निष्काम संत स्वामी कल्याण देव के ब्रह्मलीन होने पर उनकी षोडशी में स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि शुकदेव आश्रम पधारे थे। उन्होंने ही स्वामी ओमानंद का पट्टाभिषेक किया था। उन्हीं स्मृतियों को याद कर भावुक हुए स्वामी ओमानंद ने कहा कि पूज्य सत्यमित्रानंद गिरि जी भारत की सनातन संस्कृति की दिव्यात्मा थे। शुकतीर्थ और भागवत भक्तों को उनके अध्यात्म, ज्ञान और दर्शन का मार्गदर्शन मिला। शांतिकुंज हरिद्वार में डॉ प्रणव पंड्या और शैल दीदी ने वर्ष 1999 में देव संस्कृत विश्व विद्यालय के भूमि पूजन को शिक्षा ऋषि और पूज्य गिरि को बुलाया था। शुकतीर्थ में तीन वर्ष पूर्व अंतिम बार वह महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि की कथा के शुभारंभ को आए थे। उनके महाप्रयाण से शुकतीर्थ के संत- महात्माओं में शोक की लहर है। हनुमतधाम के महामंडलेश्वर स्वामी केशवानंद महाराज, दंडी आश्रम के संचालक स्वामी गुरुदत्त महाराज आदि ने कहा कि दिव्य संत गिरि का देहावसान राष्ट्र की अपूरणीय क्षति है। बताते चले कि केवल 26 वर्ष की आयु में स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि भानपूरा पीठ के शंकराचार्य बने थे, वर्ष 1969 में उन्होंने स्वयं ही यह दायित्व त्याग कर देश-विदेश में भारत की सनातन संस्कृति के संवर्धन को जीवन आहूत किया।
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मुजफ्फरनगर। हरिद्वार में भारत माता मंदिर के संस्थापक महामंडलेश्वर एवं निवृत्तमान शंकराचार्य स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि के महाप्रयाण से शुकतीर्थ के संत- महात्माओं में शोक की लहर है। शुकतीर्थ के जीर्णोद्धारक, वीतराग स्वामी कल्याणदेव के प्रति स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि का आत्मिक स्नेही भाव था। हरिद्वार में भारत माता मंदिर की स्थापना को लेकर संतद्वय के बीच मंत्रणा हुई थी। भागवत की धरा से भी ब्रह्मलीन गिरि की अनेक अमिट यादें जुड़ी हैं।
पद्मभूषण से अलंकृत स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि वीतराग संत स्वामी कल्याणदेव के विरक्त सेवाभाव जीवन दर्शन से बेहद प्रभावित थे। हरिद्वार के गीता भवन में भिक्षु गीतानंद के यहां शिक्षा ऋषि शुकतीर्थ से जाकर प्रवास करते थे। वहीं गिरि ने पहली बार संत विभूति के दर्शन किए। हरिद्वार में भारत माता मंदिर बनाने को लेकर पूर्व शंकराचार्य शुकदेव आश्रम में पधारे और स्वामी जी से भेंट की। शिक्षा ऋषि ने उन्हें राय दी कि हरिद्वार में संस्कृत यूनिवर्सिटी बनाए। भागवत पीठ शुकदेव आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद बताते हैं कि कई वर्ष तक योजना लंबित रही। वर्ष 1983 में पूज्य गिरि ने भारत माता मंदिर की स्थापना की। अनेक बार गुरुदेव को अपने धार्मिक कार्यक्रमों में बुलाया। तीन सदी के युगदृष्टा ग्रंथ में महामंडलेश्वर ने कर्मयोगी संत के प्रति अपने भाव को लिपिबद्ध किया है। वर्ष 2004 में निष्काम संत स्वामी कल्याण देव के ब्रह्मलीन होने पर उनकी षोडशी में स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि शुकदेव आश्रम पधारे थे। उन्होंने ही स्वामी ओमानंद का पट्टाभिषेक किया था। उन्हीं स्मृतियों को याद कर भावुक हुए स्वामी ओमानंद ने कहा कि पूज्य सत्यमित्रानंद गिरि जी भारत की सनातन संस्कृति की दिव्यात्मा थे। शुकतीर्थ और भागवत भक्तों को उनके अध्यात्म, ज्ञान और दर्शन का मार्गदर्शन मिला। शांतिकुंज हरिद्वार में डॉ प्रणव पंड्या और शैल दीदी ने वर्ष 1999 में देव संस्कृत विश्व विद्यालय के भूमि पूजन को शिक्षा ऋषि और पूज्य गिरि को बुलाया था। शुकतीर्थ में तीन वर्ष पूर्व अंतिम बार वह महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि की कथा के शुभारंभ को आए थे। उनके महाप्रयाण से शुकतीर्थ के संत- महात्माओं में शोक की लहर है। हनुमतधाम के महामंडलेश्वर स्वामी केशवानंद महाराज, दंडी आश्रम के संचालक स्वामी गुरुदत्त महाराज आदि ने कहा कि दिव्य संत गिरि का देहावसान राष्ट्र की अपूरणीय क्षति है। बताते चले कि केवल 26 वर्ष की आयु में स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि भानपूरा पीठ के शंकराचार्य बने थे, वर्ष 1969 में उन्होंने स्वयं ही यह दायित्व त्याग कर देश-विदेश में भारत की सनातन संस्कृति के संवर्धन को जीवन आहूत किया।
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